• [EDITED BY : संपादकीय डेस्क] PUBLISH DATE: ; 11 April, 2019 07:06 AM | Total Read Count 208
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पीछे छूटता एक और लक्ष्य

भारतीय जनता पार्टी ने अपना नया चुनाव घोषणापत्र जारी किया। लेकिन इसमें उसने यह बताने का कष्ट नहीं उठाया कि 2014 के मेनिफेस्टो में किए गए कितने वादे उसने पिछले पांच साल में पूरे किए। जबकि उसकी अनेक प्रिय योजनाओं का बुरा हाल है। अब मिले आंकड़ों के मुताबिक नरेंद्र मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना भी अपने लक्ष्य से चूक रही है। ग्रामीण इलाकों में गरीबों के लिए एक करोड़ घर बनवाने का मोदी सरकार का लक्ष्य शायद वित्त 2018-19 में पूरा न हो सके। इस वित्त वर्ष के अंत तक ग्रामीण इलाकों में गरीबों के लिए एक करोड़ घर बनवाने का लक्ष्य था। अब सरकार उम्मीद जता रही है कि वह बाकी के 13 लाख घरों को इस साल के जून तक बनवा लेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवंबर 2015 में प्रधानमंत्री आवास योजना- ग्रामीण (पीएमएवाई-जी) के तहत वित्त वर्ष 2019 के अंत तक एक करोड़ घरों के निर्माण का लक्ष्य रखा था। हालांकि सरकार ने वित्त वर्ष 2019 के अंत तक इस योजना के तहत सिर्फ 96 लाख घरों को मंजूरी दी। यानी खुद उसने चार लाख घरों के निर्माण को मंजूरी नहीं दी है। सरकारी अधिकारियों ने बताया कि जमीन को खरीदने से जुड़ी दिक्कतों और लाभार्थियों की पहचान से जुड़े दूसरे कारणों के चलते सरकार ने भूमिहीन गरीबों के लिए करीब 4,20,000 घरों को अभी तक मंजूरी नहीं दी है। कुछ राज्यों में आसानी से जमीन उपलब्ध नहीं है। उपजाऊ इलाकों को घर बनाने के लिए आवंटित नहीं किया जा सकता। वन भूमि को घर बनाने के लिए आवंटित नहीं किया जा सकता है।

ऐसे में सरकार को जमीन खरीदना पड़ रहा है। कुछ मामलों में राज्य सरकारें कानूनी रुकावटों के चलते भूमिहीनों को अपने मौजूदा आवासीय इलाकों में जमीन आवंटित नहीं कर सकतीं। कई मामलों में लाभार्थियों ने दूसरे जगहों पर आवास लेने से मना कर दिया। सरकारी अधिकारी ने बताया कि पंजाब, हरियाणा, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे कुछ राज्यों के पास अपने राज्य के लिए ग्रामीण आवास के निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने के लिए पर्याप्त लाभार्थी नहीं हैं। ये राज्य अब सरकार के आवास सॉफ्ट आइडेंटिफिकेशन सिस्टम के तहत लाभार्थियों की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं। ग्रामीण आवास योजना के तहत सरकार ग्रामीण इलाकों में घरों के निर्माण के लिए 1.2-1.3 लाख रुपये देती है। लेकिन सच यह है कि इस योजना का भी ज्यादातर प्रचार ही हुआ है। असल सफलता कम है।

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