• [EDITED BY : Edit Team] PUBLISH DATE: ; 31 July, 2019 05:47 AM | Total Read Count 211
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हित रक्षा की चुनौती

ये एक ऐसा संभावित समझौता है जिससे भारत के उद्योग एवं कृषि जगत फिक्रमंद हैं। आशंका यह है कि अगर समझौता हुआ तो भारतीय बाजार विदेशी उत्पादों से पट जाएंगे। हालांकि इससे दूसरे देशों के बाजार भी भारतीय उत्पादों के लिए खुलेंगे, लेकिन सवाल यह उठाया गया है कि आखिर भारत के पास उन देशों को भेजने के लिए है क्या? जिन चीजों का भारत निर्यात करता है कि उनका बाजार उन देशों में सीमित है। जो चीजें वहां से आएंगी, उन मामलों में भारतीय उत्पाद महंगे पड़ते हैं। ऐसे में भारतीय उत्पादों का उनकी प्रतिस्पर्धा में टिक पाना कठिन हो सकता है। इस बीच चीन और ऑस्ट्रेलिया ने समझौते को जल्द से जल्द संपन्न करने के लिए भारत पर दबाव बढ़ा दिया है। भारत में ऑस्ट्रेलिया की उच्चायुक्त हरिंदर सिद्धू ने कहा है कि क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) की सफलता के लिए भारत सरकार में भारतीय उद्योग को राजी करने की राजनीतिक इच्छा होना जरूरी है। चीन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और आसियान समूह के देशों की अगुआई में 16 देशों के बीच क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) समझौते पर बातचीत चल रही है। ये समझौता इन देशों के बीच मुक्त व्यापार के रास्ते खोलेगा। अगर ये समझौता हो जाता है तो ये विश्व की आधी आबादी और एक तिहाई जीडीपी का प्रतिनिधित्व करेगा। माना जा रहा है कि अमेरिका से व्यापार युद्ध छिड़ने के बाद चीन इस समझौते को तेजी से बढ़ाने में जुट गया है। इसमें उसे उस नुकसान की भरपाई का विकल्प दिख रहा है, जो अमेरिका से तनाव बढ़ने के कारण उसे हो रहा है।

ऑस्ट्रेलिया को चिंता यह है कि भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच मुक्त व्यापार समझौते के लिए 2011 से बातचीत चल रही है। लेकिन अब तक कोई सकारात्मक परिणाम देखने को नहीं मिला है। भारत में ऑस्ट्रेलियाई उच्चायुक्त से एक इंटरव्यू में पूछा गया कि आरसीईपी जैसे प्रस्तावित बहुपक्षीय समझौते में भारत और ऑस्ट्रेलिया दोनों देश शामिल हैं। क्या इसमें कुछ प्रगति देखने हो रही है? इस पर उन्होंने कहा कि मेलबोर्न में हुई पिछली बैठक के बाद से हमें इस साल के अंत तक इसके पूरे होने की उम्मीद है। उस बैठक में ऑस्ट्रेलिया और भारत दोनों देशों की ओर से सकारात्मक चीजें देखने को मिली थीं। अब अगले हफ्ते चीन में संबंधित देशों के मंत्रियों की बैठक है। उसके पहले भारत पर दबाव बढ़ाया गया। अब देखना है कि भारत सरकार अपने उद्योग और कृषि जगत के हितों की रक्षा कैसे करती है? 

 

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