• [EDITED BY : Edit Team] PUBLISH DATE: ; 09 August, 2019 06:08 AM | Total Read Count 204
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नज़र बाकी विशेष प्रावधानों पर

अनुच्छेद 370 अब निष्प्रभावी हो चुका है। इस धारा में जम्मू कश्मीर के लिए विशेष प्रावधान किए गए थे। लेकिन यह गौरतलब है कि अनुच्छेद 370 के अलावा अनुच्छेद 371 में भी कई राज्यों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। दरअसल, संविधान के भाग 21 में बनाए गए अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधानों में अनुच्छेद 371 भी शामिल है। इसमें शामिल 371, 371 ए, 371 बी, 371 सी, 371 डी, 371 ई, 371 एफ, 371 जी, 371 एच, 371 आई और 371 जे शामिल हैं। इनमें शामिल सभी राज्यों के लिए कुछ विशेष प्रावधान शामिल हैं। इन सभी प्रावधानों के पीछे ऐतिहासिक वजहें रही हैं। अनुच्छेद 371 के अलावा 371 ए से 371 जे तक आजादी के बाद संविधान में जोड़े गए। अनुच्छेद 371- संविधान का अनुच्छेद 371 महाराष्ट्र और गुजरात राज्य के लिए है। इसके मुताबिक इन राज्यों के राज्यपाल की यह जिम्मेदारी है कि महाराष्ट्र में विदर्भ, मराठवाडा और शेष महाराष्ट्र और गुजरात में सौराष्ट्र और कच्छ के इलाके के लिए अलग विकास बोर्ड बनाएं। इन बोर्डों का काम इन इलाकों के विकास के लिए समान राजस्व का वितरण होगा। अनुच्छेद 371 ए- अनुच्छेद 371 ए को संविधान में 13वें संशोधन के बाद 1962 में जोड़ा गया था। ये अनुच्छेद नगालैंड के लिए है। इसके मुताबिक संसद बिना नगालैंड की विधानसभा की मंजूरी के नागा धर्म से जुड़ी हुई सामाजिक परंपराओं, पारंपरिक नियमों, कानूनों, नगा परंपराओं द्वारा किए जाने वाले न्यायों और नागाओं की जमीन के मामलों में कानून नहीं बना सकती है।

यह अनुच्छेद नगाओं और केंद्र सरकार के बीच हुए 16 सूत्री समझौते के बाद अस्तित्व में आया था। इसी अनुच्छेद के तहत नगालैंड के तुएनसांग जिले को भी विशेष दर्जा मिला है। नगालैंड सरकार में तुएनसांग जिले के लिए एक अलग मंत्री भी बनाया जाता है। साथ ही इस जिले के लिए एक 35 सदस्यों वाली स्थानीय काउंसिल बनाई जाती है। अनुच्छेद 371 बी- अनुच्छेद 371 बी को 1969 में 22वें संशोधन के बाद संविधान में जोड़ा गया था। यह अनुच्छेद असम के लिए है। इसके मुताबिक भारत के राष्ट्रपति राज्य विधानसभा की समितियों के गठन और कार्यों के लिए राज्य के जनजातीय क्षेत्रों से चुने गए सदस्यों को शामिल कर सकते हैं। ऐसे ही प्रावधान कई दूसरे राज्यों के लिए हैं। सवाल है कि क्या अब इन सभी प्रावधानों पर पुनर्विचार नहीं होना चाहिए? क्या वो तर्क इनके मामले में लागू नहीं होते, जो धारा 370 के मामले में होते थे। 

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