• [WRITTEN BY : Edit Team] PUBLISH DATE: ; 09 September, 2019 06:41 AM | Total Read Count 131
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फिर से विवादित बोल

जजों की तरफ से बढ़-चढ़ कर विवादास्पद बातें करने का चलन बढ़ता जा रहा है। कुछ समय पहले एक हाई कोर्ट के जज ने भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग की थी। अब एक राज्य मानवाधिकार आयोग के दो सदस्यों ने कहा है कि लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाओं को गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकारों की बलि देनी पड़ती है। ये तर्क देते हुए राजस्थान मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकार से लिव-इन रिलेशनशिप के खिलाफ कानून बनाने की मांग कर दी है। आयोग का कहना है कि कानून के जरिए समाज में गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार महिलाओं के लिए सुरक्षित हो सकेगा। रिटायर्ड जस्टिस महेश शर्मा राजस्थान के ह्यूमन राइट्स कमीशन के प्रमुख हैं। आयोग के एक और सदस्य जस्टिस प्रकाश तांतिया के साथ मिलकर शर्मा ने राज्य के मुख्य सचिव और अतिरिक्त सचिव को पत्र लिखकर कानून बनाने की मांग की है। खत की प्रतिलिपि केंद्र सरकार को भी भेजी गई है। उससे भी मांग की गई है कि वह इस दिशा में कदम बढ़ाए। आयोग का कहना है कि शादी के बिना किसी पुरुष के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला अपने मूलभूत अधिकारों को पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर सकती।

ऐसे में राज्य सरकार और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है कि वे शादी के दायरे के बाहर ऐसे सहजीवन के प्रति जागरुकता अभियान चलाएं। आयोग का कहना है कि राज्य और केंद्र सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वे तुरंत कदम उठाएं और एक कानून बनाकर लिव-इन रिलेशनशिप पर प्रतिबंध लगाएं। भारत में लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनन और अप्रत्यक्ष रूप से संविधान के मौलिक अधिकारों के तहत मान्यता है। सुप्रीम कोर्ट भी कई फैसलों में कह चुका है कि वयस्क जोड़े लिव-इन रिलेशनशिप में रह सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय लिव-इन रिलेशनशिप को घरेलू हिंसा के कानून के दायरे में भी ला चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में भी महिलाओं को घरेलू हिंसा एक्ट 2005 के तहत सुरक्षा मिलती है। यह पहला मौका नहीं है जब जस्टिस शर्मा विवादों में आए हैं। तीन साल पहले भी राजस्थान हाई कोर्ट से रिटायर होते समय शर्मा ने कहा था कि मोरनी मोर का आंसू निगलकर गर्भ धारण करती है। अब उन्होंने विवादास्पद बयान की परपंरा को आगे बढ़ाया है। लेकिन यह बेहद अवांछित है। ताजा बयान संविधान से मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के खिलाफ है। जज ऐसे बयान देने से बचें, यही बेहतर होगा। 

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