• [WRITTEN BY : Edit Team] PUBLISH DATE: ; 27 August, 2019 09:09 AM | Total Read Count 227
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पूर्वोत्तर में गहराती आंशका

खबरों के मुताबिक नगा समस्या पर बातचीत अंतिम दौर में है। इन खबरों के साथ ही नगालैंड के पड़ोसी राज्यों की चिंताएं बढ़ गई हैं। इसकी वजह यह है कि एनएससीएन (आई-एम) शुरू से ही असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के नगा-बहुल इलाकों को मिला कर नगालिम यानी ग्रेटर नगालैंड के गठन की मांग करता रहा है। एनएससीएन (आई-एम) की संचालन समिति के संयोजक आरएच रेजिंग के एक बयान से आशंकाएं और बढ़ी हैं। उन्होंने कहा था कि केंद्र ने समझौते के प्रारूप में यह बात कबूल कर ली है कि नगा बहुल क्षेत्रों का एकीकरण नगाओं का वैध अधिकार है। नगा संगठन का कहना है कि अगर क्षेत्रीय एकीकरण नहीं हुआ, तो पूरी बातचीत पर पानी फिर जाएगा। असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर सरकारें पहले से ही इस मुद्दे का भारी विरोध करती रही हैं। असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने कहा है कि सरकार किसी भी कीमत पर राज्य का नक्शा नहीं बदलने देगी। नगालैंड में शांति प्रक्रिया बीते 22 वर्षों से अब तक खिंच रही है। इस समस्या की राह में कुछ रोड़े तो ऐसे हैं, जिनसे पार पाना न तो केंद्र के लिए आसान है और न ही शांति प्रक्रिया में शामिल चरमपंथी गुटों के लिए। सबसे बड़ा मुद्दा पूर्वोत्तर के नगा बहुल इलाकों के एकीकरण का है। दरअसल अपना वजूद बचाने के लिए जूझ रहे नगा संगठनों के लिए यही सबसे बड़ा मुद्दा है। गौरतलब है कि  इस मुद्दे पर इलाके में काफी हिंसा हो चुकी है। देश की आजादी के बाद से ही यह राज्य उग्रवाद की चपेट में रहा है। राज्य की जनजातियों ने कभी भारत में विलय को मंजूर ही नहीं किया।

नगालैंड के अलगाववादी खुद को भारत का हिस्सा नहीं मानते। उनकी दलील है कि ब्रिटिश कब्जे से पहले यह एक स्वाधीन इलाका था। अंग्रेजों की वापसी के बाद इस राज्य ने खुद को स्वाधीन घोषित कर केंद्र के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया था। एक दिसंबर 1963 को भारत का 16वां राज्य बना। अब मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने कहा है कि नगा मुद्दे पर होने वाले किसी समझौते से अगर मणिपुर के हितों को नुकसान पहुंचा, तो उसे कीसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जाएगा। अरुणाचल प्रदेश सरकार ने भी साफ कर दिया है कि उसे ऐसा कोई समझौता मंजूर नहीं होगा जिससे राज्य की सीमाएं प्रभावित हों। 

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