• [EDITED BY : Edit Team] PUBLISH DATE: ; 05 July, 2019 05:59 AM | Total Read Count 118
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चुनाव सुधार पर टकराव

लोक सभा चुनाव के बाद पहली विपक्षी गोलबंदी चुनाव सुधार के मुद्दे पर हुई है। राज्य सभा में बुधवार को चुनाव सुधार को लेकर बहस शुरू हुई। इसको लेकर 14 विपक्षी पार्टियों की ओर से नोटिस दिया गया था। संसद के मौजूदा सत्र के दौरान विपक्षी दलों की ओर से यह ऐसा पहला प्रयास है, जहां सभी मुख्य विपक्षी पार्टियां किसी मुद्दे को लेकर एकमत हुईं। इस अल्पकालिक बहस के लिए नोटिस कांग्रेस, टीएमसी, आरजेडी, एसपी, बीएसपी, आम आदमी पार्टी, सीपीआई, सीपीएम, डीएमके, केरल कांग्रेस(एम), आईयूएमएल और एनसीपी की ओर से दिया गया। दूसरी तरफ भाजपा सांसद एमके सिन्हा ने भी नोटिस दिया। भाजपा की राय में चुनाव सुधार का सबसे प्रमुख मुद्दा वन नेशन वन इलेक्शन है। यानी सत्ताधारी दल जहां ‘एक देश एक चुनाव’ पर बल दे रहा है, वहीं विपक्ष ईवीएम की विसंगतियों पर बहस करना चाहता है। साफ है, चुनाव सुधार के मुद्दे पर पक्ष और विपक्ष के अलग-अलग एजेंडे हैं। गौरतलब है कि बीते बुधवार को मुख्य विपक्षी दलों ने राज्य सभा में नेता विपक्ष गुलाम नबी आजाद की अध्यक्षता में बैठक की थी। 

मीडिया रिपोर्टों के मुताबाकि तभी ईवीएम के मुद्दे को भी इस बहस में उठाने पर सहमति बनी। राय बनी कि बहस के दौरान बैलेट पेपर से चुनाव कराने की बात पर जोर दिया जाएगा। इसके पहले बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती अपने भाषणों में अकसर ईवीएम की आलोचना करती रही हैं। वे बीते लोकसभा चुनावों में भी ईवीएम के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप लगा चुकी हैं। इससे पहले भी विपक्षी दल ईवीएम के मुद्दे पर अपने विचार रखते रहे हैं। बीते लोकसभा चुनावों में विपक्षी दलों ने 50 फीसदी वीवीपैट मिलान की बात कही थी, जिसे पहले चुनाव आयोग बाद में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। तब विपक्ष ने मांग की थी कि मतगणना के आरंभ में ही पांच वीवीपैट मशीनों का ईवीएम से मिलान कर लिया जाए। चुनाव आयोग ने ये प्रस्ताव भी अस्वीकार कर दिया था। इसके अलावा चुनाव खर्च का राज्य द्वारा वहन करने का मुद्दा भी चुनाव सुधार की चर्चा में खास रहा है। इस बारे में गठित इंद्रजीत गुप्ता समिति ने 1998 में अपनी रिपोर्ट पेश की थी। इसके अलावा चुनावों में सोशल मीडिया के दुरुपयोग का मुद्दा भी चर्चित रहा है। बहरहाल, इस बार की चर्चा के संदर्भ में अहम यह है कि विपक्ष और सत्ता पक्ष की राय बंटी हुई है। यह देश में मौजूद वैचारिक ध्रुवीकरण की एक और मिसाल है।  

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