• [EDITED BY : Edit Team] PUBLISH DATE: ; 12 July, 2019 12:54 PM | Total Read Count 219
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कब बनेंगी मानवाधिकार अदालतें?

सुप्रीम कोर्ट ने मानवाधिकारों के लिहाज से महत्त्वपूर्ण एक याचिका पर गौर किया है। हालांकि इससे सूरत बहुत बदलेगी, इसकी उम्मीद का फिलहाल कोई आधार तो नहीं है, फिर भी यह स्वागतयोग्य घटनाक्रम है। याचिका के मुताबिक देश के 29 राज्यों और सात संघ-शासित प्रदेशों के सभी 725 जिलों में मानवाधिकार हनन के मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रेक विशेष अदालतों के गठन किया जाना चाहिए था। लेकिन यह अब तक नहीं हुआ है। याचिका के मुताबिक एक व्यक्ति के बुनियादी अधिकारों के संरक्षण और हिफाजत का दायित्व राज्य का है। लेकिन उसने ये जिम्मेदारी नहीं निभाई है। नतीजतन, मानवाधिकारों का उल्लंघन बढ़ा है। याचिका में पिछले दिनों अमेरिकी विदेश मंत्रालय के मानवाधिकार से जुड़े ब्यूरो की ओर से जारी रिपोर्ट  का हवाला भी दिया गया है। अमेरिकी रिपोर्ट में भारत में मानवाधिकारों की स्थिति को चिंताजनक बताया गया है। इसमें पुलिस क्रूरता, हिरासत में मौत, फर्जी मुठभेड़, जेलों की दुर्दशा, मनमानी गिरफ्तारियां, अवैध हिरासत, झूठे आरोप, मुकदमा लड़ने में रुकावटें आदि जैसी स्थितियों के आरोप लगाए गए हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल हो या ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्टों में भारत की ऐसी ही छवि उकेरी गई है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना मानवाधिकार सुरक्षा अधिनियम के तहत की गई थी। 1993 में गठित इस आयोग ने अब तक कई मामलों में अपना रुख साहस के साथ रखा। लेकिन उससे पीड़ितों को पूरा न्याय मिला, यह कहना मुश्किल है। आयोग की कोशिशें अब तक नाकाफी ही रही हैं। वैसे ताजा याचिका में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के एक पुराने आंकड़े के हवाले से हालात की गंभीरता की ओर अदालत का ध्यान दिलाने की कोशिश की गई है। आयोग की विभिन्न रिपोर्टों के मुताबिक 2001 से 2010 के बीच पुलिस और न्यायिक हिरासत में 14,231 लोगों की मौत हुई थी। 1504 मौतें पुलिस हिरासत में और 12,727 मौतें न्यायिक हिरासत में हुई थीं। पाया गया कि ज्यादातर मौतें यातना की वजह से हुई। हिरासत में मारपीट और बलात्कार के आंकड़े अलग हैं। मानवाधिकार सुरक्षा अधिनियम 1993 के मुताबिक सभी राज्यों के प्रत्येक जिले में फास्ट ट्रैक मानवाधिकार अदालत का गठन किया जाना था। ये अदालतें उन राज्यों के हाई कोर्टों की देखरेख और दिशानिर्देश में काम करेंगी। लेकिन दो दशक बीत जाने के बाद भी ये काम लंबित पड़ा है। मानवाधिकार उल्लंघन संबंधी मामलों में कई अदालतों में सरकारी वकीलों की नियुक्तियां भी लंबित है। 
इसलिए सुप्रीम कोर्ट का याचिका को गंभीरता से लेना एक सकारात्मक बात है। 

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