• [EDITED BY : Edit Team] PUBLISH DATE: ; 07 July, 2019 11:39 PM | Total Read Count 194
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सरकार के इरादे पर सवाल

संसद में पेश 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण में डेटा को आधुनिक धन बताया गया। इसकी तुलना कच्चे तेल से की गई। इस बात से आज कोई इनकार भी नहीं करेगा। लेकिन चूंकि डेटा मूल्यवान धन बन गया है, तो उसकी सुरक्षा एवं उसके उपयोग का अहम सवाल भी खड़ा हो गया है। आर्थिक सर्वे में कुछ ऐसी बातें कही गई हैं, जिससे ये अंदेशा पैदा हुआ है कि सरकार लोगों के डेटा को निजी कंपनियों के दे या बेच सकती है। इस अंदेशे पर चिंता होना लाजिमी है। ऐसी ही चिंता आर्थिक सर्वे पेश होने के कुछ घंटों के अंदर ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की नेता सुप्रिया सुले ने लोकसभा में जताया। उन्होंने आर्थिक सर्वेक्षण के एक हिस्से का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि सरकार आम लोगों को डेटा निजी कंपनियों को बेचने की तैयारी कर रही है। चार जुलाई को वित्त मंत्री निर्माण सीतारमण ने आर्थिक सर्वेक्षण संसद में पेश किया था। 

सुले ने यह बात आधार संशोधन बिल पर चर्चा के दौरान कही। उन्होंने आर्थिक सर्वेक्षण के उस हिस्से की ओर ध्यान दिलाया कि जिसमें कहा गया था निजी कंपनियों को कारोबारी इस्तेमाल के लिए लोगों का डेटा इस्तेमाल करने की मंजूरी दी जा सकती है। चूंकि आर्थिक सर्वेक्षण के इस हिस्से में यह भी लिखा था कि डेटा बेचने से सरकार पर पड़ने वाले आर्थिक दबाव को भी कम किया जा सकेगा, इसलिए सुले ने उचित ही यह सवाल पूछा कि क्या सरकार अपने आर्थिक फायदे के लिए लोगों का डेटा बेचने जा रही है? आर्थिक सर्वे के इस हिस्से में यह भी लिखा है कि डेटा को डेटा विश्लेषण करने वाली उन कंपनियों को बेचा जा सकता है, जो इनके आधार पर महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकालती हैं। इन निष्कर्षों के आधार पर कॉरपोरेट कंपनियां बाजार में मांग का स्तर पता लगाती हैं। 

सवाल यह उठा है कि अगर ऐसा है तो इसका मतलब होगा कि सरकार ने जो डेटा इकट्ठा किया, उसे वह कॉरपोरेट कंपनियां को बेच देगी, जबकि डेटा भारत के नागरिकों लोगों का है। लोगों ने परस्पर विश्वास के नाते सरकार को अपनी ये सूचनाएं दी हैं। इस सिलसिले में केंद्रीय सूचना तकनीक मंत्री रविशंकर प्रसाद का यह दावा दिलचस्प है कि कि लोगों ने अपनी मर्जी से अपने बच्चों का नर्सरी में प्रवेश करने के लिए आधार नंबर दिया। जबकि हकीकत यह है कि आज अगर कोई बच्चा कहीं घूमने-फिरने भी जाता है, तो उसका स्कूल उससे आधार कार्ड मांगता है। इस मजबूरी को स्वेच्छा बताना मजाक ही है।

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