• [EDITED BY : Edit Team] PUBLISH DATE: ; 04 July, 2019 07:11 AM | Total Read Count 152
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योगी की जाति राजनीति

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने अन्य पिछड़े वर्ग की 17 जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का फैसला किया। इसे एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक बताया गया है। इसके साथ ही जाति की राजनीति एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। बीजेपी सरकार का ये फैसला मुमकिन है कि चुनावी लिहाज से उसे फायदा पहुंचाए। लेकिन इससे गंभीर राजनीतिक और कुछ संवैधानिक सवाल भी उठे हैं। बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने उचित ही इस पर कई सवाल उठाए हैं। मायावती का कहना है कि इन जातियों को आरक्षण देने के प्रावधान का अधिकार सिर्फ संसद को है। इसलिए योगी सरकार ने ऐसा करके न सिर्फ कानून का उल्लंघन किया है, बल्कि इन 17 जातियों के साथ छल भी किया है। इन जातियों को अब राज्य सरकार अन्य पिछड़ी जाति यानी ओबीसी मानेगी नहीं और अनुसूचित जाति का दर्जा भी इन्हें नहीं मिलेगा। मायावती का कहना है कि सरकार इन्हें एससी कोटे में डालने को लेकर वास्तव में गंभीर है, तो पहले उसे इस कोटे में बढ़ोत्तरी करनी होगी। वैसे इस मामले में मौजूदा सरकार ने पिछली सपा सरकार के जैसा ही काम किया है। मायावती का आरोप है कि बीजेपी सरकार ने आनन-फानन में इस कदम को आने वाले दिनों में 12 सीटों पर होने वाले विधान सभा उपचुनाव को देखते हुए उठाया। दरअसल सामाजिक संरचना में लगभग दलितों वाली स्थिति में रहने वाली 17 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की मांग दशकों से चल रही थी।

माना जाता है कि इन 17 अति पिछड़ी जातियों की आबादी कुल आबादी की लगभग 14 फीसदी है। पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने 17 अन्य पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल कर दिया। अब इन जातियों को अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र दिया जाएगा। जिलाधिकारियों को इन जातियों के परिवारों को जाति प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश दिया गया है। ये पिछड़ी जातियां निषाद, बिंद, मल्लाह, केवट, कश्यप, भर, धीवर, बाथम, मछुआरा, प्रजापति, राजभर, कहार, कुम्हार, मांझी, तुरहा, गौड़ इत्यादि हैं। इससे पहले समाजवादी पार्टी की सरकार ने भी ये फैसला किया था, लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस पर स्टे लगा दिया था। कुछ दिन पहले स्टे तो हटा लिया गया, लेकिन मामला अभी भी कोर्ट में लंबित है, जिसका फैसला आना बाकी है। इस बीच योगी सरकार ने ये कदम उठा दिया है, तो इसे सियासी दांव ही कहा जाएगा।

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