• [WRITTEN BY : Editorial Team] PUBLISH DATE: ; 04 September, 2019 07:10 AM | Total Read Count 139
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गहराता जलवायु का खतरा

जलवायु परिवर्तन की हालत लगातार गंभीर होती जा रही है। हर आने वाली रिपोर्ट इसकी पुष्टि करती है। महासागरों और पृथ्वी की बर्फीली जमीन के बारे में इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की अगली रिपोर्ट का मसौदा भी यही कहता है। ये मसौदा समाचार एजेंसी एएफपी को मिला है। इसमें कहा गया है कि 2015 और उसके पीछे के एक दशक में ग्रीनलैंड और अंटार्कटिक में बर्फ की चादर करीब हर साल 400 अरब टन कम हुई है। नतीजतन महासागरों का तल हर साल करीब 1.2 मिलीमीटर बढ़ा है। इसी दौर में पहाड़ों के ग्लेशियर ने भी हर साल करीब 280 अरब टन बर्फ खोई है। यह समुद्र तल हर साल 0.77 मिलीमीटर बढ़ने के लिए जिम्मेदार है। विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले 100 सालों में दुनिया के समुद्र तल में 35 फीसदी इजाफा ग्लेशियरों के पिघलने की वजह से हुआ है।

भविष्य में ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र तल का बढ़ना 30-50 सेंटीमीटर तक सीमित रहेगा, क्योंकि अब इन ग्लेशियरों के पास कम ही बर्फ बची है। इसकी तुलना अगर ग्रीनलैंड और अंटार्कटिक की बर्फ की चादर से करें, तो इनके पिघलने से समुद्र का तल कई दर्जन मीटर तक बढ़ सकता है। पृथ्वी पर करीब 200,000 ग्लेशियर हैं। यह प्राचीन काल से पृथ्वी पर बर्फ का एक विशाल भंडार हैं। ध्रुवीय इलाके के बर्फ के चादर की तुलना में छोटा होने के कारण उन पर तापमान के बढ़ने का ज्यादा असर होता है। ग्लेशियरों के पिघलने से जमीन पर रहने वाले दुनिया के उन लोगों पर असर पड़ेगा, जिनके लिए ग्लेशियर ही पानी का प्रमुख स्रोत हैं। हिमालय के ग्लेशियर आस पास की घाटियों में रहने वाले 25 करोड़ लोगों और उन नदियों को पानी देते हैं, जो आगे जा कर करीब 1.65 अरब लोगों के लिए भोजन, ऊर्जा और कमाई का जरिया बनती हैं। आईपीसीसी की रिपोर्ट में एक रिसर्च के हवाले से चेतावनी दी गई है कि एशिया के ऊंचे पर्वतों के ग्लेशियर अपनी एक तिहाई बर्फ को खो सकते हैं। यह हालत तब  होगी जब इंसान ग्रीन हाउस ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने में कामयाब हो जाए और दुनिया के तापमान में इजाफे को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर सीमित कर दिया जाए। आने वाले दशकों में सामान्य रूप से कामकाज से चलता रहा तो ग्लेशियरों का दो तिहाई हिस्सा खत्म हो जाएगा। डोनल्ड ट्रंप के दौर में ये खबर ज्यादा चिंताजनक है, क्योंकि इस वक्त जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए युद्ध स्तर पर कदम उठाए जाने की संभावना कम ही है। 

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