• [EDITED BY : Editorial Team] PUBLISH DATE: ; 01 August, 2019 07:00 AM | Total Read Count 181
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स्वच्छता नहीं है प्राथमिकता?

अदालतों में स्वच्छता के प्रश्न पर गंभीर सवाल उठे हैं। जब पिछले पांच साल से सारे देश में स्वच्छता अभियान का शोर है, तब ऐसा लगता है कि अदालत प्रशासन ने इस बात की फिक्र नहीं की है। इसके बावजूद कि भारत सरकार की प्रमुख योजना स्वच्छ भारत अभियान के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले साल नवंबर में अदालती परिसरों, विशेषकर जिला न्यायालयों में शौचालयों के नवीनीकरण और मरम्मत के लिए स्वच्छ न्यायालय परियोजना लॉन्च की थी। इस परियोजना को देश के सभी 16,000 अदालत परिसरों में स्थित शौचालयों को छह महीने के अंदर बेहतर स्थिति में लाने का काम सौंपा गया था। लेकिन एक ताजा सर्वेक्षण से पता चला है कि अदालत परिसरों में स्थित शौचालय अब भी दयनीय स्थिति में हैं। ये सर्वे न्यायिक सुधारों के लिए शोध करने वाले एक स्वायत्त थिंक टैंक 'विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी' ने किया। इस सर्वेक्षण में अदालत परिसरों में स्थित शौचालयों की स्थिति पर नजर डाली गई। 'बिल्डिंग बेटर कोर्ट्स' पर अदालती ढांचों की कमियों को प्रस्तुत करने और उनका विश्लेषण करना इस सर्वे का मकसद था। इस सर्वे रिपोर्ट में कहा गया कि 15 प्रतिशत अदालत परिसरों में महिलाओं के लिए शौचालय ही नहीं हैं। आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, जम्मू एवं कश्मीर, झारखंड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, मणिपुर, नगालैंड, ओडिशा, पंजाब, पुडुचेरी, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल ऐसे राज्य हैं, जहां अदालत परिसरों में महिलाओं के लिए शौचालय नहीं हैं। आंध्र प्रदेश में 69 प्रतिशत अदालत परिसरों में महिलाओं के लिए शौचालय नहीं हैं। ओडिशा में 60 प्रतिशत और असम में 59 प्रतिशत अदालत परिसरों में यही स्थिति है।

गोवा, झारखंड, उत्तर प्रदेश और मिजोरम ऐसे राज्य हैं जहां सबसे कम अदालत परिसरों में शौचालय हैं। सर्वेक्षेण के अनुसार झारखंड की राजधानी रांची के जिला अदालत परिसर में महिला और पुरुष किसी के लिए भी शौचालय नहीं है। ऐसा भी नहीं कि देश के दूर दराज के या पिछड़े हुए राज्यों में ही ऐसा हाल है। साल 2000 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली न्यायिक सेवा संघ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस पर सुनवाई करते हुए कहा था कि भरे हुए कोर्ट रूम, भीड़ भाड़ वाले और अंधेरे कॉरिडोर, ऊपर तक भरे टॉयलेट और हर ओर गंदगी के कारण ऐसी अदालतों में आने से ऊबकाई आने लगती है। ऐसे में अपेक्षित था कि स्वच्छता अदालत प्रशासन की प्राथमिकता बने। लेकिन साफ है, ऐसा नहीं हुआ है। 

 

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