• [EDITED BY : Editorial Team] PUBLISH DATE: ; 31 July, 2019 05:51 AM | Total Read Count 254
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दोस्ती पर मुनाफा भारी!

भारत और अमेरिका दोस्त हैं, लेकिन जब बात स्वार्थों की आए तो डोनल्ड ट्रंप प्रशासन को सारी बातें भूल जाती हैं। उसने व्यापार संबंधी मामलों में भारत पर दबाव बढ़ा रखा है, यह जग-जाहिर है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिकी रुख की वजह से ई-कॉमर्स नीति और डेटा सुरक्षा कानून बनाने संबंधित प्रस्तावित मसौदे को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। अमेरिकी कंपनियों ने इन दोनों प्रस्तावों का विरोध किया है। सहायक अमेरिकी व्यापार प्रतिनिध क्रिस्टोफर विल्सन और भारत के अतिरिक्त वाणिज्य सचिव संजय चड्ढा के बीच 11-12 जुलाई को दिल्ली में बैठक हुई थी। इससे पहले दोनों देशों के प्रमुखों ने जापान के ओसाका में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन के बीच द्विपक्षीय संबंध को बेहतर करने के लिए बातचीत की थी। जानकारों का कहना है कि इससे कुछ अतिरिक्त हासिल नहीं हुआ है। बातचीत में जिस मुद्दे पर सुई जहां अटकी हुई है, वो आयात शुल्क एवं बैरियर्स और दोनों प्रस्तावित कानून हैं। अधिकारियों का कहना है कि उसमें कुछ बदलाव किया जा सकता है। यह बदलाव घरेलू बाजार और विदेशी निवेश दोनों के बीच संतुलन बनाकर  किया जाएगा। व्यापक ई-कॉमर्स नीति के लिए डेटा सुरक्षा नीति बहुत महत्त्वपूर्ण है। कई अमेरिकी कंपनियां भारत में डेटा स्टोरेज और प्रोसेसिंग पर किसी भी प्रकार के प्रतिबंध का विरोध कर रही हैं। ई-कॉमर्स नीति का प्रशासनिक मंत्रालय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आता है। भारतीय अधिकारियों के मुताबिक ई-कॉमर्स नीति के मसौदे का सरकार ने अनावरण नहीं किया है, क्योंकि सरकार देश के लगभग सात करोड़ व्यापारियों को निराश करना नहीं चाहती है।

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने हाल में राज्यसभा में कहा था कि नेशनल ई-कॉमर्स नीति का ड्राफ्ट तैयार हो चुका है। सरकार को अलग-अलग हितधारकों (कंपनी, उद्योग, थिंक टैंक, विदेशी सरकारें आदि मिल चुकी है। भारतीय अधिकारियों के मुताबिक ड्राफ्ट पॉलिसी में ई-कॉमर्स से संबंधित छह मुख्य मुद्दों पर गौर किया गया है। इसमें वर्चुअल मार्केटप्लेस, नियंत्रण संबंधी मुद्दे, आधारभूत ढ़ांचे का विकास, डेटा, घरेलू डिजिटल अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करना और ई-कॉमर्स के माध्यम से निर्यात को बढ़ावा देना शामिल है। ई-कॉमर्स नीति निजी डेटा सुरक्षा नीति पर निर्भर करती है। इसके तहत संवेदनशील डेटा को विदेशी सर्वर पर जाने से रोका जाएगा। साथ ही उपभोगताओं की निजी जानकारी की भी सुरक्षा की जाएगी। मगर ये बात अमेरिकी कंपनियों को मंजूर नहीं है। इसी कारण गहरा अनिश्चिय पैदा हो गया है।

 

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