• [WRITTEN BY : Editorial Team] PUBLISH DATE: ; 30 August, 2019 06:40 AM | Total Read Count 194
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बाल मजदूरी की मजबूरी

भारत को बाल मजदूरी के कलंक से मुक्ति नहीं मिल रही है। वैसे यह आम अनुभव है, लेकिन एक हालिया रिपोर्ट ने इसकी तथ्यात्मक सूरत हमारे सामने पेश की है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसी- टेर दे होम्स- की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया था कि बिहार और झारखंड की अभ्रक खदानों में 22 हजार से ज्यादा बच्चे मजदूरी कर रहे हैं। इस एजेंसी के सर्वेक्षण के दौरान इन इलाकों के बड़ी संख्या में बच्चों के कुपोषण की चपेट में होने की बात भी सामने आई। अभ्रक खदानों में काम करने वाले बच्चों की मौतों को छिपाने की घटनाएं भी होती रही हैं। भारत अभ्रक के सबसे बड़े उत्पादक देशों में से एक है। यहां झारखंड व बिहार में इसका बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश में भी इसका कुछ उत्पादन किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक और सौंदर्य प्रसाधनों के अलावा रंगों के उत्पादन में भी अभ्रक का इस्तेमाल किया जाता है। पर्यावरण के अनुकूल होने की वजह से हाल के वर्षों में इस खनिज की अहमियत काफी बढ़ गई है। हालिया सर्वेक्षण में पता चला कि अभ्रक खदान वाले इलाकों में बच्चों के लिए मौकों की भारी कमी है। इसी वजह से बच्चे अपने परिवार की आय बढ़ाने के लिए बीच में ही पढ़ाई छोड़ कर मजदूरी करने लगते हैं। उस सर्वेक्षण बिहार के नवादा के अलावा झारखंड के गिरीडीह और कोडरमा जिलों में किया गया। सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि झारखंड के अभ्रक खदान वाले इलाकों में छह से 14 साल की उम्र के 4,545 बच्चे पढ़ाई छोड़ चुके हैं।

यानी वे स्कूल नहीं जाते। झारखंड और बिहार के अभ्रक खदान वाले इलाकों में बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी इस सर्वेक्षण के मुताबिक बिहार के नवादा जिले में स्कूल नहीं जाने वाले ऐसे बच्चों की तादाद 649 है। इन बच्चों के स्कूल नहीं जाने की वजह के बारे में आयोग ने कहा है कि पढ़ाई के प्रति दिलचस्पी नहीं होना इसका कारण है, खदान से अभ्रक के टुकड़े एकत्र करना और महात्वाकांक्षा की कमी ही इसकी प्रमुख वजह है। इलाके के कई परिवारों का गुजारा अभ्रक के टुकड़े बेचकर होने वाली आय से ही चलता है। वहां रहने वाले ज्यादातर परिवारों को लगता है कि बच्चों को स्कूल भेजने से कोई फायदा नहीं है। इसलिए लोग स्कूल भेजने की बजाय बच्चों को अभ्रक के टुकड़े एकत्र करने के लिए खदानों में भेजने को तरजीह देते हैं। लेकिन यह अपने समाज की कैसी तस्वीर सामने रखता है, यह साफ है। 

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