• [WRITTEN BY : Edit Team] PUBLISH DATE: ; 06 September, 2019 06:46 AM | Total Read Count 244
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ये मंदी ही है

तकनीकी परिभाषा की आड़ लेकर यह कहा जा सकता है कि अभी भारत मंदी का शिकार नहीं है। बल्कि अभी भी भारत की अर्थव्यवस्था 5 फीसदी की दर से बढ़ रही है, जो वैश्विक पैमाने पर बहुत बुरा नहीं है। लेकिन असलियत पर गौर करें तो यह थोथा तर्क महसूस होगा। विभिन्न आर्थिक सूचक असल में मंदी की ओर इशारा कर रहे हैं। 2012 के बाद वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर घटकर पांच फीसदी रह जाने पर अनेक विश्लेषकों का मानना है कि नीति निर्माताओं के लिए इस स्थिति से उभर पाना आसान नहीं होगा होगा। मुंबई स्थित निर्मल बाग इक्विटी प्राइवेट ने एक रिपोर्ट में कहा है कि विकास अब लगातार दो तिमाही के दीर्घकालिक रूझान में 6.6 फीसदी से नीचे चला गया है, जो दर्शाता है कि भारत लगभग मंदी जैसे हालात हैं। शुरुआती संकेत बताते हैं कि विकास को एक बार फिर पटरी पर लाना काफी मुश्किल होने वाला है। अगर लगातार दो तिमाहियों में जीडीपी विकास दर में गिरावट दर्ज की जाती है, तो ये अर्थव्यवस्था में मंदी के आम मानक परिभाषा पर खरा उतरता है। साथ ही अन्य आर्थिक गतिविधियों में महीनों तक जारी सुस्ती भी मंदी की ओर इशारा करती है। भारत में ऑटो उद्योग में बिक्री अपने दो दशकों के निचले स्तर पर पहुंच गई है। 

वहीं उद्योग की ओर से तमाम कोशिशें भी कामयाब नहीं रही हैं। इसके अलावा वित्त वर्ष 2018-19 की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत थी। इस हिसाब से 2019-20 की पहली तिमाही में जीडीपी विकास दर में 3.2 प्रतिशत की भारी कमी आई है। वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर में आई ये कमी पिछले सात सालों में सर्वाधिक है। ब्लूमबर्ग ने एक अध्ययन में पाया कि उपभोग और निवेश में गिरवाट के बीच लगातार जुलाई महीने में भी आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती रही। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि सितंबर तिमाही के अंत तक जीडीपी विकास दर निम्नतम स्तर पर पहुंच सकती है। साथ ही उनका मानना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए सरकारी खर्चों में बढ़ोतरी की जरूरत है। विभिन्न कंपनियों के बाद अब गोल्डमन सैक्स का भी कहना है कि सुस्ती से उभरने के लिए रिजर्व बैंक को ब्याज दर में कटौती करने की जरूरत है। मगर मुश्किल यह है कि सरकार इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

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