• [EDITED BY : Editorial Team] PUBLISH DATE: ; 09 July, 2019 12:09 AM | Total Read Count 125
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समानता की नई आवाज

इस बार महिला विश्व कप फुटबॉल टूर्नामेंट ने रिकॉर्ड लोकप्रियता हासिल की। इसके टीवी प्रसारण को यूरोप और अमेरिका में ऊंची टीआरपी मिली। रिकॉर्ड संख्या में लोग स्टेडियम भी पहुंचे। बहरहाल, फ्रांस में हुआ यह टूर्नामेंट महिला अधिकारों के लिए उठी आवाजों के भी याद रखा जाएगा। इसकी खूब चर्चा रही कि एक अमेरिकी खिलाड़ी ने अमेरिकी फुटबॉल महासंघ पर पुरुष और महिला खिलाड़ियों के बीच वेतन के अंतर को लेकर मुकदमा किया है। अब फीफा ने खेल में महिलाओं की भूमिका बढ़ाने का वादा किया है। 2016 में फात्मा समौरा को फीफा ने अपनी पहली महिला महासचिव नियुक्त किया था। अब उसने 2022 तक महिलाओं के खेल में लगभग 50 करोड़ डॉलर का निवेश करने का भरोसा दिया है। पिछले महीने फीफा ने कहा कि उसने अफगानिस्तान फुटबॉल फेडरेशन के पूर्व अध्यक्ष को फुटबॉल से आजीवन प्रतिबंधित कर दिया, क्योंकि उन्हें महिला खिलाड़ियों का यौन शोषण करने का दोषी पाया गया था। फीफा ने उन दो ईरानी महिलाओं का भी समर्थन किया, जो टी-शर्ट पहन कर स्टेडियम में मैच देखने आईं थीं और जिन्हें इस कारण स्टेडियम से बाहर निकाल दिया गया था। ईरानी महिलाओं और लड़कियों को इस्लामी क्रांति के बाद से चार दशकों से अधिक समय तक देश में किसी भी पुरुष खेल प्रतियोगिता में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई है। 1981 के बाद से उन्हें शीर्ष क्लबों के मैचों में शामिल होने की अनुमति नहीं है। बहरहाल, जानकार इस पर सहमत हैं कि महिला फुटबाल की लोकप्रियता में वृद्धि ने खिलाड़ियों की लंबे समय से अटकी शिकायतों को बल प्रदान किया है।

फीफा का अनुमान है कि इस बार पूरी दुनिया में एक अरब लोगों ने महिला फुटबॉल विश्व कप देखा। फीफा के अनुसार 2026 तक छह करोड़ महिलाओं और लड़कियों तक इस खेल को पहूंचाने का लक्ष्य है। पिछले एक दशक में विश्व कप में कुल 32 महिलाओं की टीमों ने हिस्सा लिया, जो कि पुरुषों की टीमों की संख्या की आधी है। फिर महिला और पुरुष खिलाड़ी एक ही जैसे नियमों के तहत मुकाबला करते हैं, लेकिन उन्हें अलग-अलग पुरस्कार राशि मिलती है। यह हाल सभी खेलों में है। युनेस्को के अनुसार केवल 4 फीसदी खेल मीडिया कंटेंट महिलाओं के खेल के लिए समर्पित है। इसमें 12 प्रतिशत खेल समाचार ही महिलाओं द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं। यानी चुनौती गंभीर है। मगर लैंगिक विषमता दूर करने की दिशा में अब एक प्रगति हुई है, यह भी निर्विवाद है। 

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