• [EDITED BY : Editorial Team] PUBLISH DATE: ; 07 July, 2019 11:46 PM | Total Read Count 179
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‘न्यू इंडिया’ की सोच

संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण में एनडीए सरकार की सोच झलकी। इसमें कोई हैरतअंगेज बात नहीं है। हर सरकार अपनी सोच के मुताबिक सर्वेक्षण या कोई दूसरे दस्तावेज तैयार करती है। बहरहाल, ध्यान इस सोच की दिशा ने खींचा। गौर कर करें। सरकार ने कर चोरी कम करने और इसे ज्यादा मात्रा में जुटाने के लिए धर्म का खौफ दिखाया है। हिंदू, इस्लाम और बाइबिल में इस संबंध में कही गई बातों का जिक्र करते हुए कर चुकाने को जरूरी बताने की कोशिश की गई है। उल्लेख किया है कि मजहब में कर्ज न चुकाने को पाप बताया गया है। शास्त्रों में इसे स्वर्ग प्राप्ति के बाधा के रूप में देखा गया है। हिंदू धर्म में मृतक व्यक्ति के उसके बच्चों द्वारा कर्ज चुकाने को पवित्र दायित्व के सिद्धांत के रूप में पेश किया गया है, तो इस्लाम में कोई व्यक्ति तब तक जन्नत नहीं पहुंच सकता, जब तक कि उस पर कर्ज हो। बाइबिल प्यार में कर्ज को छोड़कर बाकि किसी कर्ज के बकाया न रखने की हिदायत दी गई है। 

हिंदू धर्म के शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति कर्ज नहीं चुकाता वह राज्य में कर्जदार होकर मरता है। उसकी आत्मा को इसके परिणाम झेलने पड़ सकते हैं। लिहाजा यह उनके बच्चों की जिम्मेदारी या दायित्व है कि वह इस तरह के परिणामों से उनकी (अभिभावक) आत्मा को बचाएं। बच्चों की जिम्मेदारी या दायित्व है कि वह एक विशेष सिद्धांत के आधार पर अपने मृत अभिभावक के ऋण चुकाएं। इसे ‘पवित्र दायित्व के सिद्धांत’ के नाम से जाना जाता है। 

इस्लाम में नबी मुहम्मद ने पाप और बड़े कर्ज को समान बताया है और इसे करने से मना किया है। यानी तमाम मजहबों के मुताबिक किसी के जीवन में ऋण का भुगतान आवश्यक है। भारतीय संस्कृति में धर्म को काफी महत्व दिया गया है। देश में कर चोरी और जान-बूझकर किये गये घपले कम करने के लिए व्यवहार अर्थशास्त्र के सिद्धांत को इन धर्मग्रंथों या धार्मिक प्रावाधानों से जोड़े जाने की जरूरत है। बहराहाल, ये तमाम बातें जानी-पहचानी हैं। अब खास बात यह है कि इनका आर्थिक सर्वे में जिक्र हुआ। लेकिन अगर सरकार ने इससे यह उम्मीद की है कि इससे कर्जदार अपने ऋण चुका देंगे, तो उसे मायूसी हाथ लग सकती है। धार्मिक व्यवस्थाओं और नियमों के हजारों साल से कायम रहने के बावजूद अगर ये बुराइयां खत्म नहीं हुईं, तो आर्थिक सर्वे में उनका उल्लेख कर देने से क्या होगा?

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