• [EDITED BY : नया इंडिया राजनैतिक ब्यूरो] PUBLISH DATE: ; 07 April, 2019 12:07 PM | Total Read Count 215
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समझौता बम विस्फोट: अदालती फैसले की असलियत कुछ और

प्रदीप श्रीवास्तवः समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट मामले में विशेष अदालत के फैसले के बाद सरकार और भाजपा के शीर्षस्थ पदों पर बैठे लोगों की एक के बाद एक जो प्रतिक्रिया आई है वह अजीबो गरीब और स्तब्ध कर देने वाली है। आरोपियों को बरी करने के इस फैसले को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वित्त मंत्री अरुण जेटली से लेकर भाजपा  अध्यक्ष अमित शाह ने एक के बाद एक अपने भाषणों और बयान में खुशी जाहिर करते कांग्रेस पर ‘हिंदुत्व’ के नाम पर हमला करना  शुरू कर दिया। जबकि इस क्रूर और बर्बर आतंकी वारदात पर अदालत ने जो फैसला दिया है वह इस मामले की जांच करने वाली एजेंसी, ‘नेशनल इवेंस्टीगेशन एजेंसी(एनआईए) और सरकार को कटघरे में खड़ी करती है। 

पंचकुला की विशेष अदालत ने जांच एजेंसी और सरकारी वकील के खिलाफ जो टिप्पणी की है वह ऐतिहासिक है। अदालत में सुनवाई के दौरान दोषियों के खिलाफ इस मामले जो प्रमाण पेश किए गए, जिस तरह सरकारी पक्ष की तरफ से जिरह की गई उसे लेकर विशेष अदालत के जज जगदीप सिंह ने आश्चर्य प्रकट वाल  के साथ कई सवाल खड़े किए और यह संकेत दिया कि किस तरह एजेंसी की तरफ से घोर लापरवाही बरती गई। फैसले में  बस उन्होंने इतना नहीं कहा कि इन बम विस्फोट की कार्रवाई में ‘दोषियों’ को सजा दिलाने की जगह उन्हें बचाने की कोशिश की गई है।

पर 160 पेज के इस फैसले में जांच एजेसी  के इस रवैए पर अपनी पीडा  व्यक्त की। अपने फैसले में उन्होंने लिखा है कि 'इस तरह की हिंसा की घटना में विश्वसनीय और स्वीकार्य योग्य सबूतों के अभाव में अपराध की बगैर सजा दिए जो फैसला करना पड़ रहा है उसका उन्हें दुख है। फरवरी 2007 में भारत-पाक के बीच चलने वाली ट्रेन ‘समझौता एक्सप्रेस’ में किए गए बम विस्फोट में 68 यात्री मारे गए थे। इनमें 43 पाकिस्तानी, 10 भारतीय थे और 15 लोग ऐसे मारे गए जिनकी पहचान नहीं हो पाई।

यूपीए सरकार ने उस समय इस आतंकी वारदात की जांच का जिम्मा एनआईए को दिया था। इसमें जिन लोगों को पकड़ा गया और जो मुख्य आरोपी बनाए गए थे उनमें संघ के स्वामी असीमानंद, लोकेश शर्मा, कमल चैहान और राजेन्द्र चैधरी को 20 मार्च 2019 को अपने फैसले में विशेष अदालत ने बरी कर दिया। 20 मार्च को इन चारों को छोड़ने की खबर के बाद पहले वित्त मंत्री अरुण जेटली का बयान आया कि इस फैसले से साबित हुआ कि कांग्रेस की सरकार ने इस मामले में ‘हिंदू आतंकवादियों’ का नाम लेकर हिंदुओं को बदनाम करने की कोशिश की।

इसके बाद प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष अमितशाह ने जनसभाओं में इसी लाईन पर न केवल प्रहार करना शुरू किया बल्कि यह भी सवाल जनता से पूछे कि क्या हिंदू कभी आतंकवादी बन सकता है। प्रधानमंत्री ने एक कदम आगे बढ़ कर पांच हजार पुरानी हिंदू संस्कृति की दुहाई दे दी। जाहिर है पहले से सोची समझी योजना के तहत 20 मार्च को समझौता ट्रेन विस्फोट के चारों आरोपियों के छूटने के बाद ये सब बयान आए। जबकि अदालत का विस्तृत 160 पेज का फैसला जो 28 मार्च 2019 को सार्वजनिक हुआ उसने कुछ और ही सच्चाई  सामने लाई।

एक दो अखबारों ने ही उसे सामने लाया। इतने बड़े हत्याकांड पर अदालत द्वारा की गई गंभीर टिप्पणी पर सबने  चुप्पी साध ली। इस फैसले में आईए देखते हैं माननीय जज ने क्या कहा। अपने फैसले में अदालत ने कहा कि इस मामले में जो सही और बेहतर प्रमाण दोषियों के खिलाफ थे उन्हें जांच एजेंसी अदालत में लेकर आई ही नहीं। उन उन प्रमाणों को एंजेसी ने अपने पास  रख लिया। अभियोजना पक्ष (सरकारी पक्ष) ने कई स्वतंत्र गवाहों से जिरह नहीं की। महत्वपूर्ण गवाह राम प्रताप सिंह का जिक्र करते हुए अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि यह भोपाल में 2008 की बैठक में था।

इसे लेकर जांच एजेंसी के वकील ने उसको बुलाकर उससे जिरह तक नहीं की। फैसले में यह ईशारा किया गया है कि आरोपियों की अपराध को लेकर की गई बातचीत, उनकी बैठकों, अपराध करने के उद्देश्य जैसे मुद्दों को जोड़ने से संबंधित एक भी दस्तावेज या वैज्ञानिक सबूुत रिकार्ड में नहीं लाए गए। जांच एजेंसी ने सबूतों के बीच काफी सूराग छोड़ दिए गए हैं। अदालत ने इस मामले में  एनआईए की लापरवाही या जानबूझ कर बरती गई लापरवाही के बारे में कई सबूत खुद दिए।

फैसले में कहा गया कि 51 गवाह अपने बयान से पलट गए। यहां तक कि एक प्रत्यक्षदर्शी गवाह जिसने बम विस्फोट के पहले कुछ लोगों को ट्रेन से उतरते देखा था उसे भी नहीं पेश किया गया। समझौता एक्सप्रेस बम कांड के अभियुक्तों में अमित चैबे, रामचंद्र और संदीप डांगे को एनआईए ने भगोड़ा घोषित कर दिया है। एक अन्य आरोपी सुनील जोशी जिसका नाम अजमेर बमकांड में भी था,  जिसे एनआईए ने समझौता विस्फोट की साजिश का मास्टर माइंड बताया था, उसकी दिसंबर 2007 में हत्या कर दी गई।

अपने फैसले में अदालत ने कहा कि सुनील जोशी के मोबाईल के काल डिटेल्स के आधार पर एनआईए की तरफ से अदालत को बताया गया कि फरवरी 2007 को जब इंदौर के कोठारी मार्केट इस वारदात की साजिश बनी थी तो जोशी वहां था। उसकी काल डिटेल्स से पता चलता है कि अन्य अभियुक्तों में प्रज्ञा ठाकुर, संदीप डांगे, असीमानंद की कनैक्टिविटी सुनील जोशी के साथ थी। उनके बीच संबंध थे। पर एनआईए ने किसी भी मोबाइल की काल डिटेल्स या उन सबके फोन को कोर्ट में पेश नहीं किया , उसकी जांच नहीं की गई। अदालत की इस टिप्पणी से साफ है यूपीए की सरकार के समय की जा रही जांच को मोदी सरकार आते ही बंद कर दिया। एन आई के अफसरों को ने निर्देश मिल गया।

जज जगदीप सिंह ने अपने फैसले में एनआईए को गंभीर उपेक्षा का एक और सबूत देते हुए कहा कि ट्रेन पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से रवाना होती है और स्टेशन पर जगह-जगह पर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं। विशेष अदालत ने कहा कि एनआईए ने कोर्ट को सीसीटीवी की जानकारी दी थी। पर सीसीटीवी उस दिन के फुटेज, जो एक बढ़िया प्रमाण होने का काम करते उसे एनआईए ने अपने पास रख लिया। अदालत के सामने पेश ही नहीं किया। जगदीप सिंह ने अपने फैसले में इस बारे में यह साफ लिखा है कि ‘यदि उन फुटेज को कब्जा कर उसकी गहराई से जांच की जाती तो जांच एजेंसी को साजिशकत्र्ताओं को पकड़ने की ‘लीड मिल सकती थी। लेकिन इसे लेकर अदालत के सामने कोई प्रमाण नहीं लाया गया।

एनआईए ने साजिशकर्ताओं के हक में कुछ और काम भी किए।  विशेष अदालत ने कहा कि दो सूटकेस, जिनमें रखे बम नहीं फटे थे वह घटनास्थल पर जांच एजेंसी को मिले। इन सूटकेस के कवर को इंदौर के एक दर्जी ने सिला था। लेकिन उस दर्जी की पहचान परेड जांच एजेंसी ने नहीं कराई, इसकी वजह क्या थी यह जांच एजेंसी ही बेहतर जान सकती है। अदालत ने इस तथ्य पर जोर दिया कि कुछ प्रमाण ऐसे मिले जो जांच एजेंसी द्वारा दी गई कहानी के विपरीत है।

इस मामले में अपने फैसले में एक गवाह के बयान का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने एक ऐसे गवाह से जिरह की जिसका कहना था ट्रेन दिल्ली से रात 10 बजकर 50 मिनट पर खुली। लेकिन दस मिनट बाद कुछ देर के लिए रुक गई। उस गवाह का कहना था कि कुछ लोग जनरल डिब्बे से उतर गए हैं। ‘इसका अर्थ यह हो सकता है कि कुछ संदिग्ध लोग यात्रा शुरू करने के पहले ट्रेन से उतर गए। पर इस दिशा में कोई जांच ही नहीं की गई। जांच एजेंसी ने कोर्ट जो थ्योरी दी उसके मुताबिक अपराधियों ने समझौता एक्सप्रेस से यात्रा ही नहीं की।

उन्होंने दिल्ली स्टेशन पर ट्रेन में बम प्लांट किया और भाग गए। जज जगदीप सिंह ने इस पर अपनी टिप्पणी में कहा कि जांच एजेंसी का यह बयान प्रत्यक्षदर्शी गवाह के बयान से विपरीत है। उस गवाह के बयान को दरकिनार कर दिया। अदालत के फैसले में की गई टिप्पणियों की गंभीरता सरकार, पीएम,वह भी जाने-माने वकील अरुण जेटली न समझते हों ऐसा माना नहीं जा सकता। हिंदू समुदाय के लोग आतंकवादी और हिंसक घटनाओं से पहले से जुड़े रहे हैं। यह प्राचीन, मध्यकालीन भारत की बात नहीं है। 2017 में ही अजमेर बम कांड में तीन लोगों को आतंक की घटना को लेकर एनआईए की विशेष अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई थी। इनमें एक सुनील जोशी को मरने के बाद भी सजा सुनाई गई।

सिख वोटों के लिए 1984 के दंगे को हमेशा उछालने की कोशिश में भाजपा को अच्छी तरह पता है कि सैकड़ों सिखों की निर्मम हत्या किस समुदाय ने की। टायर गले में बांध कर आग लगा कर हत्या करने का क्रूर ईजाद किस वर्ग ने किया। उन्हें यह भी मालूम है कि भागलपुर हो या गोधरा के बाद गुजरात में हुए दंगे, या फिर गाय के नाम पर अपने ही समुदाय को बेरहमी से मारने की ‘बहादुरी’ हिंदुओं की तरफ से ही दिखाई गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘पांचव हजार साल पुरानी हिंदू संस्कृति की तरफ देखने की जरूरत नहीं है। 15-20 साल का पिछला इतिहास देख लें तो उन्हें मालूम हो जाएगा।

इन बयानों से जो निष्कर्ष निकाल सकते हैं उससे साफ है कि समझौता एक्सप्रेस के फैसले को जिस तरह भाजपा के नेताओं ने ‘हिंदू’ से जोड़कर कांग्रेस पर हमला करना शुरू किया वह चुनावी पैंतरा और हिंदुत्व एजेंडा को चुनाव में वापस लाने की कोशिश के तहत है। 
 ‘हिंदुओं’ की तरफ से प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री स्तर के नेताओं द्वारा दी गई सफाई और कांग्रेस को पांच हजार वर्ष पुरानी हिंदू संस्कृति का विरोधी करार देने जैसे उच्च स्तर के बयान भाजपा की बौखलाहट का भी संकेत करती है। यह बौखलाहट प्रियंका गांधी के ‘पूजा अर्चना’, ‘हिंदू भक्ति’ के प्रदर्शन से प्रतीत होती है।

जिस तरह विध्यांचल देवी, बाबा विश्वनाथ का दर्शन प्रियंका ने पिछले दिनों अपने यूपी दौरे में किया, गंगा की आरती में हिस्सा लिया उससे भाजपा में बेचैनी है। खबर यह भी है कि असीमानंद को भाजपा ने पश्चिम बंगाल से लोक सभा चुनाव का टिकट देने का फैसला किया। पर ताज्जुब इस बात का है कि केन्द्र सरकार को या भाजपा को इस बात की कोई चिंता नहीं है कि भारत में हुए जिस आतंकवादी कार्रवाई में 68 बेकसूर मारे गए उनका असली हत्यारा कौन है?

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