• [EDITED BY : श्रीशचन्द्र मिश्र] PUBLISH DATE: ; 29 July, 2018 09:41 AM | Total Read Count 572
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क्या बदलेगा चुनाव का रंग रूप!

अगले साल होने वाले आम चुनाव के लिए मची उठा पटक के बीच लोकसभा चुनाव के साथ ही राज्यों के विधानसभा चुनाव कराने का जुमला एक बार फिर उछला है। इस मुद्दे पर दो तरह की राय सामने आती रही है। एक तो मोदी सरकार का ही तर्क है कि इससे चुनाव पर होने वाला खर्च बचेगा। अब कोई सरकार पैसा बचाने की कोशिश करें तो बात आसानी से हजम नहीं होती। खैर विरोधियों को आशंका है कि एक साथ सभी चुनाव कराकर सरकार देश में निरंकुश शासन का सिलसिला शुरू करना चाहती है। 

सवाल है कि क्या लोकसभा और राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराने से शासन व्यवस्था दुरुस्त, कारगर और जवाबदेह बन पाएगी? असल में शासन व्यवस्था तय करने के लिए शुरू की गई लोकतांत्रिक प्रक्रिया पिछले सत्तर साल में इतनी उलझ चुकी है कि उसे पटरी पर लाना टेढ़ी खीर साबित होता जा रहा है। मसला सिर्फ चुनावी प्रक्रिया का ही नहीं है, और भी कई कारक हैं जो आदर्श व्यवस्था के लिए अड़चन बने हुए हैं। सबसे पहले उनका कड़ा निदान करने की जरूरत है। मोदी सरकार भी फिलहाल इस दिशा में गंभीर नहीं है। समस्या सिर्फ अपने यहां ही नहीं है। 

चुनाव के जरिए अपना शासक चुनने की व्यवस्था हर देश में थोड़ी बहुत खामियों का शिकार हुई है। भ्रष्टाचार बढ़ा है, चुनाव पर धनतंत्र हावी हुआ है। भारत में स्थिति ज्यादा विकट है तो इसके कई कारण हैं। कहने को संविधान में दिए गए अधिकार और जन प्रतिनिधित्व कानून में समय-समय पर संशोधन के जरिए कुछ खामियों को दुरुस्त करने की कोशिश जरूर हुई लेकिन उसका व्यापक असर नहीं हुआ। जिस तरह एक बार फिर सरकारी खर्च पर चुनाव कराने का जो प्रस्ताव सामने आया उसी तरह कुछ अन्य सुधारों के सुझाव भी बीच-बीच में उछलते रहे हैं। 2014 और 2015 में चुनाव कानूनों में सुधार के सवाल पर हुए विमर्श में चुनाव आयोग ने विधि आयोग से कहा था जब तक राजनीति का अपराधीकरण नहीं रोका जाएगा, कुछ नहीं बदल पाएगा।

इस दिशा में कई मंचों से कुछ कड़े कदम उठाने के प्रस्ताव सालों से आते रहे हैं। मसलन अगर किसी राजनीतिक व्यक्ति के खिलाफ गंभीर मामले में आरोप तय हो जाते है और उस अपराध में उसे सात साल से ज्यादा की सजा मिल सकती है। तो उसे कम से कम तेरह साल चुनाव न लड़ने दिया जाए यानी सात साल सजा के और सजा काटने के छह साल बाद तक वह चुनाव न लड़ सके। जनप्रतिनिधित्व कानून में कुछ और बदलाव किए जाने के प्रस्ताव भी सामने आते रहे हैं। इसमें एक समय में एक से ज्यादा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने से रोक, चुनाव प्रचार खर्च की सीमा बढ़ाना, चुनाव खर्च का गलत हलफनामा देने पर सदस्यता रद्द करना, उम्मीदवार या पार्टी को चुनाव खर्च के लिए सरकारी मदद देना, राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे में पारदर्शिता बनाए रखना और उसे सार्वजनिक करने के लिए नियम बनाना शामिल है। सरकार और मीडिया पर अंकुश लगाने और मतदान से छह महीने पहले सरकार की उपलब्धियों का बखान करने वाले विज्ञपनों की सीमा तय करने का प्रस्ताव आया।

जल्दी ही कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने सरकार से कहा है कि वह अध्यादेश के जरिए पेड न्यूज और उम्मीदवार, उसके एजेंट या समर्थक द्वारा मतदाताओं को पैसा या उपहार देने को संज्ञेय अपराध घोषित करे ताकि ऐसे लोगों को तत्काल गिरफ्तार किया जा सके और उन्हें जमानत भी न मिले। पेड न्यूज और मतदाताओं को पैसे, उपहार आदि से लुभाना तो व्यापक समस्या का एक हिस्सा भर है। राजनीति में अपराधी किस कदर हावी हो गएहैं इसकी एक मिसाल भी मुख्य चुनाव आयुक्त ने हाल ही में दी। उनके सामने उत्तर प्रदेश व महाराष्ट्र के कुछ किस्से आए जिसमें दो साल से ज्यादा की सजा पाने वाले जन प्रतिनिधियों ने अपना कार्यकाल पूरा किया। सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देश के बावजूद उनकी सीट को खाली घोषित नहीं किया गया। 

राजनीति में बढ़ता अपराधीकरण कोई नई समस्या नहीं है। अब तो यह एक बड़ी बीमारी का रूप ले चुका है। आदर्श निर्वाचन प्रणाली विकसित करने के लिए सभी पार्टियां वैचारिक मंच पर चुनाव में अवैध धन के इस्तेमाल और राजनीति के अपराधीकरण का जम कर विरोध करती रही हैं। लेकिन मौका पड़ने पर सभी इन्हीं दुर्गुणों के सहारे अपनी चुनावी नैया खेती रही हैं। निष्पक्ष, भयमुक्त चुनाव कराने में आने वाली दिक्कतों को दूर करने का कोई रास्ता तलाशने की गंभीर कोशिश तो खैर किसी ने की नहीं, किसी और स्तर पर कोशिश हुई भी तो उनका सहयोग रत्ती भर नहीं रहा। 

महाबलियों और साधन संपन्न लोगों की शह पर अपराध व राजनीति के बढ़ते घालमेल ने चुनाव की शक्ल इतनी बिगाड़ दी है कि अब उसका तात्कालिक इलाज जरूरी हो गया है। राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून की व्याख्या करने में सुप्रीम कोर्ट और सरकार का नजरिया अलग हो सकता है। पुलिस या न्यायिक हिरासत वाले व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकने के पीछे 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने तर्क दिया था कि जब हिरासत से कोई व्यक्ति वोट नहीं डाल सकता तो उसे चुनाव भी नहीं लड़ने देना चाहिए। 1989 में जन प्रतिनिधित्व कानून में दागी नेताओं के लिए बचाव का रास्ता बना दिया गया था। इसका फायदा उठा कर सांसद या विधायक आपराधिक मामलों में दो साल या उससे अधिक की सजा पाने के बावजूद चुनाव लड़ते रहे और जीतते रहे। 

किसी अदालत से सजा मिलने के बाद सांसद या विधायक को अयोग्य घोषित करने का सुप्रीम कोर्ट का 2013 का निर्देश दो याचिकाओं का निपटारा करते हुए आया था। दोनों याचिकाओं में जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा आठ (चार) की संवैधानिकता पर सवाल उठाया गया था जिसमें दोषी पाए गए सांसदों व विधायकों को अपनी निर्धारित अवधि पूरी करने और उसके बाद भी चुनाव लड़ने की छूट दी गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का कोई असर नहीं हुआ। और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं का दबदबा राजनीति में और बढ़ गया। 

2013 में यूपीए सरकार ने जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन के विधि मंत्रालय के उस प्रस्ताव को मान लिया। जिसमें व्यवस्था थी कि दोषी पाए जाने वाले सांसद व विधायक तब तक अयोग्य घोषित नहीं होंगे जब तक सजा के खिलाफ उनकी अपील विचारार्थ होगी। बस वे मतदान में हिस्सा नहीं ले सकेंगे और वेतन व भत्ते भी नहीं पा सकेंगे। लेकिन जेल में बंद नेता के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में यूपीए सरकार नहीं थी।

सालों से हर राजनीतिक पार्टी एक दूसरे पर आपराधिक तत्वों को बढ़ावा देने का आरोप लगाती रही है। लेकिन सभी में ऐसे तत्वों की भरमार है। कोई भी पार्टी आपराधिक रिकार्ड वाले व्यक्ति को किसी भी हालत में उम्मीदवार न बनाने की हिम्मत नहीं दिखा पाई है। दिलचस्प बात तो यह है कि आजादी के बाद पचास साल तक राजनीति में अपराधियों के प्रवेश पर निगाह रखने की जरूरत महसूस नहीं की गई और न ही सरकारी या राजनीतिक स्तर पर इस बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने की कोई पहल हुई। 

सभी का राजनीतिक हित जो इससे सध रहा था। इस चलन पर रोक लगाने के लिए गैर सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म्स’ की जनहित याचिका पर 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने हर उम्मीदवार के लिए अपनी पृष्ठभूमि का हलफनामा चुनाव आयोग को देना अनिवार्य कर दिया। यह व्यवस्था 2004 के आम चुनाव में शुरू हुई। तब 125 ऐसे उम्मीदवार सांसद सामने आए जिनके खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे थे जिनमें उन्हें दो साल या उससे ज्यादा की सजा हो सकती थी। 2009 में ऐसे सांसदों की संख्या बढ़ कर 162 हो गई। यानी कुल सांसदों के तीस फीसद ने माना कि उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। राज्यों की विधानसभा में तो हालत और भी विकट है।

कहने को हर राजनीतिक पार्टी राजनीति के अपराधीकरण पर नाक भौं चढ़ाती है। अक्सर यह दलील भी दी जाती है कि मतदाता आपराधिक छवि वाले उम्मीदवार को चुनाव जिताते ही क्यों हैं? सवाल यह है कि राजनीतिक पार्टियां उन्हें अपना उम्मीदवार बनाती ही क्यों हैं? 2009 में कांग्रेस के आठ फीसद, भारतीय जनता पार्टी के बारह फीसद, बहुजन समाज पार्टी के 18 फीसद, झारखंड मुक्ति मोर्चा के 46 फीसद, जनता दल (युनाइटेड) के तीस फीसद और समाजवादी पार्टी के 26 फीसद सांसदों व विधायकों पर आपराधिक मामले थे। एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म्स और नेशनल इलेक्शन वाच के आंकड़ों को माने तो झारखंड मुक्ति मोर्चा के 82 फीसद, राष्ट्रीय जनता दल के 64 फीसद और समाजवादी पार्टी के 48 फीसद सांसदों व विधायकों पर आपराधिक दाग थे। 
भारतीय जनता पार्टी के 1017 सांसदों व विधायकों में से 31 फीसद यानी 313 पर आपराधिक आरोप थे। कांग्रेस के 1433 सांसदों व विधायकों में से अपराध के दाग वाले 21 फीसद थे यानी 305। एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म्स ने नामांकन के समय दिए जाने वाले उम्मीदवारों के हलफनामे के हवाले से बताया कि तीस फीसद सांसदों पर आपराधिक मामले चल रहे थे। चौदह फीसद पर तो हत्या, बलात्कार, धोखाधड़ी, घोटाले और समुदायों के बीच नफरत फैलाने जैसे गंभीर अपराध थे। 2014 में हुए आम चुनाव में भी स्थिति नहीं सुधरी। 2004 में 24 फीसद सांसद दागी थे तो 2009 में उनकी संख्या 30 फीसद हो गई। 2014 में चुनाव जीते 34 फीसद यानी 186 सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें से 112 पर तो बलात्कार, हत्या, हत्या की कोशिश, अपहरण, महिला उत्पीड़न व सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने जैसे संगीन अपराधों के आरोप थे। 
 

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