• [EDITED BY : नया ब्यूरो-दि/एजेंसी] PUBLISH DATE: ; 23 September, 2018 08:00 AM | Total Read Count 606
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राजनीति ने जगाई लालसा

तीन साल पहले जिस समय आरक्षण की मांग को लेकर जाट सड़कों पर उपद्रव मचा रहे थे, श्रीनगर के पम्पोर में पांच मंजिला सरकारी इमारत में घुसे लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों से सुरक्षा बलों की मुठभेड़ चल रही थी। मुठभेड़ में शहीद होने से पहले हरियाणा के जींद जिले के 23 साल के जाट कैप्टन पवन सिंह ने फेसबुक पर जो आखिरी पोस्ट किया था, वह था- ‘किसी को रिजर्वेशन चाहिए तो किसी को आजादी, हमें कुछ नहीं चाहिए बस अपनी रजाई।’ यह भावना उस जांबाज जवान की थी जो देश के दुश्मनों से लड़ रहा था, ऐसे दुश्मन जिन्हें ‘बाहरी’ शह मिली हुई है।

पवन सिंह जैसे जवानों को उसी दौरान उन उपद्रवियों से जूझना पड़ा जो अपने ही देश में आग लगाने को उतारू हो गए थे। कई दिन उन्होंने सड़कों पर तांडव मचाए रखा, जम कर हिंसा की। सिविल मशीनरी को पंगु बना दिया। जनजीवन ठप कर दिया। रेल, बसों, वाहनों, इमारतों को फूंक डाला। मंत्रियों और विधायकों के घरों को भी निशाना बनाया। अराजकता का ऐसा माहौल तो आतंकवादियों के हमले से भी नहीं बनता। आखिर इस तरह का खतरा अपने ही लोगों से बार-बार क्यों खड़ा किया जा रहा है? छह महीने पहले ही पटेलों को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर आरक्षण की सुविधा का लाभ देने की मांग पर गुजरात में उग्र तूफान उठा था। अब जाटों के बाद मैदान में कूद पड़े हैं। आखिर क्यों?

गुजरात की राजनीति और अर्थव्यवस्था में जिस तरह पटेल ताकतवर रहे हैं, हरियाणा व उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में जाटों की भी कमोबेश वैसी ही स्थिति रही है। कृषि पर मुख्य रूप से केंद्रित रहे पटेलों ने जिस तर्क पर आरक्षण मांगा वही जाट आंदोलन का आधार बना। यानी खेती अब मुनाफे का कारोबार नहीं रह गया है और उनके समुदाय के युवा आरक्षण की वैसाखी के बिना किसी और क्षेत्र में पनप नहीं सकते। गुजरात में पाटीदारों (पेटलों) में आरक्षण के लिए मोह अनायास नहीं जागा। आरक्षण की रेवड़ी में हिस्सा बंटाने को पटेल भी अरसे से लालायित रहे हैं।

तात्कालिक राजनीतिक फायदे के लिए करीब तीन दशक पहले संपन्न व ताकतवर जातियों में आरक्षण का जो लालच जगाया गया था, उसी का नतीजा है कि आरक्षण सभी को अपना अधिकार लगने लगा है। चुनावी फायदे के लिए कई जातियों को आरक्षण का चुग्गा दिया गया। कुछ अपनी दबंगई की वजह से अथवा चुनावी समीकरण में मजबूत मोहरा होने की वजह से आरक्षण का लाभ पा गईं। 1985 में गुजरात विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस ने अन्य पिछड़ी जातियों के लिए सरकारी नौकरियों व शिक्षण संस्थाओं में 28 फीसद आरक्षण का माधव सिंह सोलंकी का फार्मूला अपनाया।

जाटों ने आरक्षण की मांग 1989 में शुरू की। उस समय विश्वनाथ प्रताप सिंह ने धूल खा चुकी मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर समाज में विषमता और विद्वेष का ऐसा कंटीला पौधा खड़ा कर दिया जो लगातार देश के लिए मुसीबत बन कर चुभ रहा है। हरियाणा में तब अपनी ताकत बढ़ाने के लिए चौधरी देवीलाल ने गुरनाम सिंह आयोग का गठन किया।

आयोग को तय करना था कि जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल किया जाए या नहीं। आयोग ने हरियाणा में जाटों को इस वर्ग में आरक्षण देने की सिफारिश भी कर दी। लेकिन भजनलाल के नेतृत्व में सत्ता में आई कांग्रेस की सरकार ने इस सिफारिश पर अमल रोक दिया।

पिछले तीन दशक में अन्य पिछड़ा वर्ग में ढेरों जातियां ठुंस चुकी हैं। गुजरात में ही इस वर्ग में 146 जातियां शामिल हैं। इस व्यावहारिक सवाल पर कहीं भी कभी गौर नहीं किया गया कि मान्य पचास फीसद आरक्षण में अनगिनत जातियों को शामिल करने से क्या उन्हें सचमुच कोई फायदा होगा। सुप्रीम कोर्ट साफ निर्देश दे चुका है कि कुल आरक्षण 50 फीसद से ज्यादा नहीं होना चाहिए। संवैधानिक व्यवस्था के तहत अनुसूचित जाति का पंद्रह फीसद और अनुसूचित जनजाति का साढ़े सात फीसद यानी कुल साढ़े बाइस फीसद आरक्षण निर्धारित है। बाकी 27.5 फीसद हिस्से में आखिर कितनी जातियां समा पाएंगी?

ऐसे में सवाल उठता है कि छह महीने पहले गुजरात में पटेल, फिर हरियाणा में जाट और अब मराठा आरक्षण पाने के लिए इतने उग्र क्यों हो गए? यह हुआ है असमानता का अहसास होने की वजह से। आर्थिक कारण इसमें उतना अहम नहीं है जितना यह कि जब यादव, गुर्जर, सैनी आदि जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग में जगह मिल गई है तो जाटों को उससे वंचित क्यों किया जा रहा है? जिन जातियों ने खेती की मदद से संपन्नता पाई और उसके बल पर शहरों में पैठ जमाई, उस हर जाति का युवा वर्ग खेती की बजाए सरकारी नौकरी पाने या मेडिकल व इंजीनियरिंग कालेजों में दाखिला लेने को प्राथमिकता देने लगा है। आईएएस अफसर बन कर वे प्रशासनिक व्यवस्था में हिस्सा बनना चाहते हैं। आधी सीटें आरक्षित होने की वजह से उन्हें लगता है कि आरक्षण पाए बिना उनकी चाह पूरी नहीं हो सकती।

राजनीति ने आरक्षण का चुग्गा डाल कर हर राज्य में विभिन्न जातियों में जो रंजिश पैदा कर दी है उसे किसी अपील या सलाह से खत्म नहीं किया जा सकता। बेहतर रोजगार के रास्ते में अगर जाट युवा आरक्षण को बाधा मानते हैं तो इसमें गलत क्या है? यह हताशा या विक्षोभ हर उस राज्य में है जहां एक ही हैसियत वाली जातियों में अन्य पिछड़ा वर्ग में आरक्षण देने के मामले में भेदभाव हुआ है।

सबकी आर्थिक स्थिति और समाज में उनका रुतबा एक जैसा है लेकिन कुछ जातियां आरक्षण का लाभ पा रही हैं और कुछ इस राजनीतिक सौगात से वंचित हैं। खैरात में मिलने वाली सुविधा न मिलने की पीड़ा और उसकी अभिव्यक्ति के लिए हिंसक आंदोलन का रास्ता अपनाने की मानसिकता ने न गुजरात में पहली बार रंग दिखाया और न ही हाल का जाट आंदोलन आखिरी पड़ाव है।

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