• [EDITED BY : Uday] PUBLISH DATE: ; 14 April, 2019 01:46 AM | Total Read Count 193
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तो इस बार भी नवीन पटनायक?

श्रीशचंद्र मिश्रः पिछले साल मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में सत्ता के दुर्ग ढहने के बाद अब ओडिशा का किला बाकी है जहां नवीन पटनायक पिछले उन्नीस साल से खूंटा गाड़े बैठे हैं। इस बार उन्हें पांच साल का और विस्तार मिल पाएगा क्या, यह सवाल ज्यादा अहम हो गया है। राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव में नवीन पटनायक ने सरकार का साथ देकर राज्य में एक बार फिर बीजद और भाजपा में तालमेल होने की जो संभावना जगाई थी उस पर पानी फिर गया है। बीजू जनता दल के दो मौजूदा और एक पूर्व सांसद के अलावा तीन विधायक भाजपा में शामिल हो चुके हैं। 

बागी बैजयंत पांडा ने भी भाजपा का दामन थाम लिया है। चुनाव से पहले राजनीति में इस तरह का पारंपरिक आवागमन आम बात है और इसके आधार पर सत्तारूढ़ पार्टी की हार या जीत का आकलन नहीं किया जा सकता है। इस तरह की चुनौतियां पिछले कुछ समय से पार्टी के भीतर और बाहर से नवीन पटनायक के सामने आती रही हैं और उनका तो हाल फिलहाल कुछ हद तक उन्होंने सामना भी कर लिया लेकिन इससे यह संकेत भी सामने आए कि राज्य में उनकी एकछत्र अपराजेय हैसियत धीरे-धीरे खुरचने लगी है। ऐसे में यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि 2014 के आम चुनाव में मोदी लहर को राज्य में नाकाम करने और राज्य में अपनी सत्ता को बचाने वाले नवीन पटनायक 2019 के विधानसभा चुनाव में अपना वर्चस्व क्या कायम रख पाएंगे?

स्थानीय निकाय चुनाव में पिछले साल भारतीय जनता पार्टी को कुछ इलाकों में मिली बढ़त ने इस सवाल को ज्यादा प्रासंगिक कर दिया है। राज्य में विधानसभा चुनाव आम चुनाव के साथ होंगे। नवीन पटनायक का लक्ष्य सिर्फ विधानसभा चुनाव जीतना ही नहीं पिछले आम चुनाव की तरह भारतीय जनता पार्टी को मात देकर लोकसभा की ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतना है। बाधाएं कई हैं। भाजपा से मिल सकने वाली चुनौती से ज्यादा अहम है सत्ता विरोधी लहर को थामना और पार्टी में एकजुटता बनाए रखना। अपने अस्वस्थ होने की खबरों को विराम देकर उन्होंने यह संकेत तो दे दिया कि पार्टी पर उनका पूरा नियंत्रण है और उनके खिलाफ कोई असंतोष नहीं है। 

देखना यह है कि सारी कवायद क्या इस साल उन्हें पांच साल पुरानी हैसियत पर टिकाए रख पाती है? अभी तक की उनकी रणनीति हमेशा कारगर साबित होती रही है। पिछले आम चुनाव में नरेंद्र मोदी की सुनामी जिन तीन राज्यों- पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और ओडिशा में दरवाजे पर ही ठिठक गई थी, उनमें पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु के बारे में तो पूर्वाभास हो गया था लेकिन ओडिशा भी भारतीय जनता पार्टी के लिए निराशाजनक साबित होगा, यह किसी ने नहीं सोचा था। आम चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव में भी नवीन पटनायक ने किसी भी पार्टी को उभरने नहीं दिया। संयोग देखिए कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, तमिलनाडु में अन्ना द्रमुक और ओडिशा में बीजू जनता दल भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय गठबंधन का कभी न कभी हिस्सा रहे।

2014 के आम चुनाव में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में जयललिता को भाजपा के सहारे की जरूरत नहीं थी। ओडिशा में तो भाजपा की मदद से नवीन पटनायक ने अपनी राजनीतिक जमीन पक्की की थी। सत्ता उन्हें विरासत में मिल गई थी लेकिन उसे भाजपा का कंधा नहीं मिलता तो अंग्रेजी दा नवीन बाबू टूटी फूटी उड़िया बोल कर अपनी जड़ नहीं जमा पाते। ऐसे में भाजपा से अलग होकर नवीन पटनायक का अकेले चुनाव लड़ने का पासा इतना सटीक बैठेगा, इसकी उम्मीद कम ही थी। 
अपनी नीतियों और विकास के आधार पर लगातार मुख्यमंत्री बने रहने का रिकार्ड हालांकि कइयों ने बनाया है।

ऐसे में नवीन पटनायक अपवाद नहीं हैं। खास बात यह है कि वे लगातार राज्य पर अपनी पकड़ मजबूत करते जा रहे हैं। 1998 में बीजू जनता दल की लोकसभा में नौ सीटें थी। 1999 में यह संख्या दस, 2004 में बारह होते हुए 2009 में 14 तक पहुंच गई। 2014 में बीजू जनता दल ने कांग्रेस को तो खाता खोलने ही नहीं दिया, भाजपा को भी सुंदरगढ़ की इकलौती सीट जीतने दी। 2000 में विधानसभा में बीजू जनता दल के 68 और 2004 में 61 विधायक थे। 2009 में मिली 103 सीटों को बीजू जनता दल ने 2014 में 117 तक पहुंचा दिया।

रणनीति हवा के साथ चलने कीः आम चुनाव में किसी योद्धा की तरह मैदान में कूदने की बजाए नवीन ने क्षेत्रीय दायरे में ही सक्रियता बढ़ाई। तीन साल पहले प्रस्तावित संघीय गठबंधन में शामिल होने के ममता बनर्जी से मिले न्योते से नवीन गदगद तो हुए लेकिन उसमें बहे नहीं। ओडिशा की परिधि से बाहर निकल कर राष्ट्रीय राजनीति को नियंत्रित और संचालित करने के कुछ सूत्र अपने हाथ में लपेटने और ओडिशा से बाहर अपनी कद्दावर नेता की छवि बनाने की छिटपुट मुहिम नवीन पटनायक ने वैसे 2012 में शुरू की। आम चुनाव में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसे राष्ट्रीय दलों के गिरते वोट औसत और प्रादेशिक दलों के बढ़ते जलवे से उन्हें यह आकलन करने में कोई दिक्कत नहीं हुई कि भले ही कितनी भी जोड़ तोड़ क्यों न होती रहे, 2014 में केंद्र में प्रादेशिक दलों के समर्थन की कील पर टंगी विकलांग सरकार ही बनेगी।

ऐसे में केंद्र सरकार को समय समय पर घुड़की देते रहना, किसी मोड़ पर उसके कमजोर दिखते ही उसकी बांह मरोड़ कर अपने हित की बात मनवा लेने की हर प्रादेशिक दल की रणनीति उन्होंने अपना ली। अपनी मुहिम की शुरुआत उन्होंने उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता के नक्शे कदम पर चलते हुए केंद्रीय मंत्रियों और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर चिट्ठी दर चिट्ठी दाग कर की। मुद्दा चाहे राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र (एनसीटीसी) बनाने का रहा या राज्य में खेल प्रशिक्षण केंद्र खोलने का, नवीन पटनायक ने विभिन्न समस्याओं पर कई केंद्रीय मंत्रियों और प्रधानमंत्री को पचास से ज्यादा चिट्ठियां लिख भेज डालीं। अपने लिखे पत्रों के संबंधित केंद्रीय मंत्रियों तक पहुंचने से पहले ही उन्होंने पत्रों को मीडिया के हवाले कर दिया। 
नवीन पटनायक ने पत्रों के माध्यम से यह संदेश दिया कि उनकी सरकार तो मुस्तैदी से काम कर रही है।

लेकिन केंद्र की उपेक्षा से दिक्कत हो रही है। ओडिशा में ही बैठ कर नवीन ने पोलावरम बांध व केंद्र के प्रस्तावित रेलवे सुरक्षा बल कानून का ही विरोध नहीं किया, माओवादी समस्या से निपटने के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती, सुरक्षा से जुड़े खर्च का दायरा बढ़ाने जैसे मुद्दों पर केंद्रीय गृह मंत्रालय को कटघरे में खड़ा कर आभास दे दिया कि राज्य हित के ले वे कैसा भी आक्रामक तेवर अपना सकते हैं। बारह जून, 2013 को दिल्ली में उन्होंने तीस सांसदों व विधायकों के जत्थे के साथ रैली कर और उग्र तेवर अपनाया और नीतीश की तर्ज पर आरोप मढ़ दिया कि केंद्र सरकार उन्हीं राज्यों की सुध लेती है जहां कांग्रेस या सहयोगी दल की सरकार है। ‘स्वाभिमान समावेश’ रैली में बिहार की तरह ओडिशा को विशेष राज्य का दर्जा देने का उनकी मांग से ज्यादा महत्वपूर्ण रहा नवीन का उड़िया में बोलना। 

विदेशों में पले बढ़े नवीन पटनायक पर हमेशा आरोप लगता रहा है कि लगातार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद वे उड़िया नहीं बोल सकते। दिल्ली रैली के लिए उन्होंने उड़िया सीखी या किसी और लिपी में लिखा भाषण उन्होंने पढ़ दिया, यह तो पता नहीं लेकिन उड़िया अस्मिता का तो उन्होंने दिल्ली में डंका बजा दिया। रैली में यह घोषित करते हुए कि गुजरात से बाहर नरेंद्र मोदी का कोई असर नहीं होगा और राहुल गांधी का कोई भविष्य नहीं है, नवीन पटनायक ने यह भविष्यवाणी तो कर दी कि दोनों में से किसी में प्रधानमंत्री बनने लायक क्षमता नहीं है। लेकिन अपने अगले कदम के बारे में पत्ते नहीं खोले। यह तो वे मान रहे थे कि तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में संघीय गठबंधन ज्यादा बेहतर होगा लेकिन ऐसे मोर्चे की संरचना और उसके नेतृत्व के सवाल पर वे जल्दबाजी में कोई फैसला करने के पक्ष में नहीं थे। जाहिर है कि पहले की तरह किसी की उंगली थाम कर वे किसी मोर्चे का सजावटी अंग नहीं बनना चाहते थे। 

2014 में जब मोदी के नेतृत्व में एनडीए ने पूर्ण बहुमत से सरकार बना ली तो नवीन पटनायक ने अपने आक्रामक तेवर ढीले कर दिए और नेपथ्य में चले गए। इसे नवीन पटनायक की सूझबूझ कहें या रणनीति कि आम चुनाव से पहले जब नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित हो गए और देश में उनकी हवा बहने लगी तो बाकी प्रादेशिक क्षत्रप उसे भांप नहीं पाए। नवीन पटनायक ने समझ लिया कि राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बनने के लिए अतिरिक्त सक्रियता दिखाने की बजाए ओडिशा में अपना राजनीतिक हैसियत बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। राज्य में उनके लिए कोई अड़चन नहीं थी।

2014 में चौथी बार मुख्यमंत्री बनने को लेकर भी कोई अंदेशा नहीं था। शुरू के एक दशक तक अपने सहयोगियों पर भरोसा कर वे चैन की नींद सोते रहे। 2012 में स्वामी भक्ति और निष्ठा का पर्याय रहे उनके विश्वस्त प्यारी मोहन महापात्र ने जो बगावत की, उसे लंदन प्रवास बीच में ही छोड़ कर नवीन पटनायक ने बड़ी निर्ममता से कुचल दिया। लेकिन इससे भी वे संतुष्ट नहीं हुए। राज्य की राजनीति में उनके वर्चस्व को भविष्य में भी कोई चुनौती न दे सके, इसके लिए उन्होंने कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी।

अपने खिलाफ विद्रोह को पूरी तरह कुचल डालने के लिए नवीन ने 2012 में जो चाबुक फटकार दिया था उसकी गूंज काफी समय तक रही। सत्ता से बेदखल किए जाने की कोशिश नाकाम होने के बाद से नवीन पटनायक ने कई मंत्रियों, सार्वजनिक प्रतिष्ठानों के प्रमुखों, योजना बोर्ड के सदस्य और सहकारी विभागों के कई प्रमुखों की छुट्टी कर दी। इनमें से ज्यादातर प्यारी मोहन महापात्र के करीबी माने जाते थे। बागियों का सफाया करने का नवीन का अभियान थमा नहीं। 2013 में मई दिवस पर बीजू जनता दल के पूर्व महासचिव व पूर्व विधायक जनेश्वर बाबू को गिरफ्तार करवा कर उन्होंने संकेत दे दिया कि वे किसी ‘बागी’ पर रहम करने वाले नहीं।

बगावत को कुचल डालने और बागियों को चुन चुन कर ठिकाने लगाने के बाद भी नवीन पटनायक के सामने चुनौतियां कम नहीं हुईं। प्यारी मोहन ने नवीन पटनायक को गद्दार बता कर ओडिशा जन मोर्चा नाम की पार्टी बना ली और दावा किया कि बीजू जनता दल के 62 विधायक उनके समर्थन में कभी भी नवीन का दामन झटक सकते हैं। जनेश्वर बाबू की गिरफ्तारी को एक बड़ा मुद्दा बना कर उन्होंने राजभवन के सामने विरोध प्रदशर्न भी किया। प्यारी मोहन का दावा था कि नवीन पटनायक का कोई जमीनी आधार नहीं है। बीजू जनता दल की उठा पटक का राज्य की विपक्षी पार्टियां फायदा उठाने की फिराक में थीं। प्यारी मोहन की वजह से बीजू जनता के उम्मीदवारों की जीत की संभावना में दरार पड़ने का फायदा कांग्रेस को दिखने लगा था।

दांव-पेंच में महारतः ऐसे में पूरी ताकत जुटा कर नवीन पटनायक ने जो रणनीति बुनी उसमें विपक्ष उलझ कर रह गया। भाजपा से अलगाव को धर्म निरपेक्षता का सैद्धांतिक लबादा ओढ़ने के लिए इस्तेमाल उन्होंने नहीं किया बल्कि उसके जातीय व सामाजिक फायदे को देखकर यह कदम उठाया। नवीन पटनायक ने 2014 में चुनाव में जातीय राजनीति के कुचक्र को तोड़ा। चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा से ग्यारह साल पुराना नाता तोड़ कर उसे ऐसा झटका दिया कि 2004 में विधानसभा की 32 व लोकसभा की सात सीटें पाने वाली भाजपा 2009 में लोकसभा की एक भी सीट नहीं जीत पाई। भाजपा के स्थानीय नेताओं ने इसे विश्वासघात व राजनीतिक अवसरवाद बता कर नवीन पटनायक को खूब कोसा।

लेकिन राजनीति की भाषा में वह नवीन का मास्टर स्ट्रोक था। विधानसभा की 147 में से 103 व लोकसभा की 21 में से चौदह जीत कर नवीन पटनायक बड़े गर्व से यह कह कर खुद को सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष नेता के रूप में स्थापित कर गए कि मेरे शरीर की हर हड्डी धर्म निरपेक्ष है। 2014 के आम चुनाव में खंडित जनादेश की संभावना बनने के बीच चर्चा हुई कि बीजद व भाजपा फिर साथ हो सकते हैं। सवाल उठे कि क्या ‘धर्म निरपेक्ष’ नवीन पटनायक नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली ‘सांप्रदायिक’ भाजपा से हाथ मिलाएंगे या कांग्रेस व भाजपा से बराबर की दूरी बनाए रखने की अपनी पुरानी नीति पर चलते हुए वे तीसरे मोर्चे का साथ देंगे?

नवीन ने अकेले चलने का फैसला किया और अपने रुख में बड़ा बदलाव भी किया। उन्होंने समझ लिया था कि तीसरा मोर्चा बनने की कोई गुंजाइश नहीं है। देश में मोदी लहर को वे ही भांप पाए थे इसीलिए चुनाव प्रचार में भाजपा को बार-बार सांप्रदायिक कहने से उन्होंने परहेज किया। अन्य प्रादेशिक क्षत्रपों की तुलना में उन्होंने नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने में थोड़ा संयम बरता। उनका पूरा जोर ओडिशा पर ही रहा। चुनाव बाद बदली हुई परिस्थितियों को समझ कर नवीन पटनायक ने केंद्र सरकार के प्रति रुख भी लचीला कर लिया। करीब तीन साल की चुप्पी के बाद वे फिर सक्रिय तो हुए लेकिन दो मोर्चों पर उन्होंने खासी सावधानी बरती। एक, केंद्र से टकराव के अन्य प्रादेशिक क्षत्रपों के अभियान का उन्होंने अनुसरण नहीं किया।

दूसरे, भाजपा के खिलाफ विपक्षी महागठबंधन से जुड़ने में उन्होंने कोई आतुरता नहीं दिखाई। इससे संकेत गया कि नवीन बाबू इस बार भाजपा के साथ खड़े हो सकते हैं। विपक्ष ने इस तरह के आरोप लगाने भी शुरू कर दिए। राहुल गांधी ने तो कहा भी कि नवीन पटनायक मोदी के रिमोट कंट्रोल मे हैं। हाल ही में नवीन पटनायक की अमेरिका में रह रही उपन्यासकार बहन गीता मेहता को ‘पद्मश्री’ दिया गया जिसे उन्होंने लेने से मना कर दिया, इस दलील के साथ कि उनके पुरस्कार स्वीकार करने से चुनावी साल में विपक्ष को बात का बतगंडड बनाने की छूट मिल जाएगी।

दिचलस्प बात यह है कि कुछ महीने पहले जब अपने प्रकाशक पति सोनी मेहता के साथ गीता मेहता भारत आईं तो नरेंद्र मोदी ने उनसे करीब डेढ़ घंटे बातचीत की। पिछले साल राज्यसभा के उपसभापति के लिए हुए चुनाव में नवीन पटनायक ने एनडीए के उम्मीदवार हरिवंश का समर्थन कर सबको चौंका दिया। चुनावी साल में इसका कोई भी राजनीतिक संदेश निकाला जा सकता है।
राज्य स्तर पर भी नवीन पटनायक ने कुछ अहम फैसले किए हैं।

खास कर किसानों और उन दलित व आदिवासियों के लिए जिनके पास जमीन है ही नहीं। अन्य राज्यों की तरह कर्ज माफी की लोकलुभावन लेकिन अव्यावहारिक साबित हो रही योजनाओं से अलग नवीन पटनायक ने तीस लाख छोटे व मझौले किसानों के लिए ‘कालिया’ (कृषक असिस्टेंट फॉर लाइवलीहुड एंड इनकम असिस्टेंट) योजना के तहत हर साल सीजन में पांच हजार रुपए देने की व्यवस्था की है। दस लाख भूमिहीन गरीबों को सरकार घरेलू उद्योग चलाने के लिए साढ़े बारह लाख रुपए दे रही है। इससे उनकी लोकप्रियता बढ़ी है।

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