• [EDITED BY : श्रीशचन्द्र मिश्र] PUBLISH DATE: ; 23 September, 2018 08:00 AM | Total Read Count 239
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कहां तक फैलेगी आरक्षण की आग!

आरक्षण का सवाल इस समय सबसे गंभीर मुद्दा बन गया है। एक तरफ सरकार संसद के शीतकालीन अधिवेशन में आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था करने वाला बिल लाने पर विचार कर रही है तो दूसरी तरफ सरकार के इस कदम से मौजूदा आरक्षण में कटौती की आशंका जताई जाने लगी है। जाहिर है कि मौजूदा व्यवस्था में किसी भी तरह का बदलाव हो नहीं सकता। सुप्रीम कोर्ट आरक्षण की सीमा पचास फीसद से ज्यादा करने के पक्ष में नहीं है।

ऐसे में आर्थिक आधार पर आरक्षण मुहैया कराने की गुंजाइश निकाल पाना आसान नहीं होगा। उस पर आए दिन विभिन्न जाति-समुदायों की आरक्षण की मांग और उसे पूरा करने के लिए हिंसा का सहारा लेने की बढ़ती प्रवृत्ति ने अजीब विस्फोटक स्थिति पैदा कर दी है। सात लोगों की जान लेने और कई हजार करोड़ रुपए की सरकारी व निजी संपत्ति को स्वाहा करने के बाद महाराष्ट्र का मराठा आरक्षण आंदोलन फिलहाल कुछहद तक थम गया है। छिटपुट हिंसा हालांकि जारी है। मराठाओं को शिक्षा व सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने की मांग पर शुरू हुआ आंदोलन ज्यादा उग्र इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि राज्य के राजनीतिक नेतृत्व ने उपद्रवियों के सामने घुटने टेक दिए।

उनसे बेहद नरमी बरती गई। पांच विधायकों के इस्तीफे के बाद राज्य सरकार बचाव की मुद्रा में आ गई और बातचीत कर समझौते का कोई रास्ता निकालने की कवायद शुरू हो गई। मराठा आरक्षण की मांग नई नहीं है। इसका कोई आधार भी नहीं है। लेकिन चुनावो के वक्त राजनीतिक फायदा उठाने के लिए हर पार्टी ने इसे एक शिगूफे की तरह इस्तेमाल किया। लोगों को सपना दिखाया। अब लोगों को सपना भाने लगा है तो वे आरक्षण को अपना अधिकार मान बैठे हैं।

राजनीति का यह खेल सिर्फ महाराष्ट्र तक ही सीमित नहीं है। विभिन्न राज्यों से किसी एक खास समुदाय के लिए आरक्षण की मांग उठना एक फैशन बन गया है। कभी यह ‘उपद्रव’ किसी राजनीतिक पार्टी की शह पर होता है तो कभी राष्ट्रीय फलक पर चकमने को आतुर जातिवादी संगठनों के पदाधिकारियों की उफनती महत्वाकांक्षी की वजह से। 2015-2016 के छह महीने के भीतर आरक्षण की मांग को लेकर गुजरात के पटेलों और हरियाणा जाटों ने जिस तरह प्रशासनिक व्यवस्था को बंधक बना कर अराजकता की स्थिति खड़ी कर दी थी और अब जिस तरह महाराष्ट्र के कुछ शहरों में हिंसा का तांडव हुआ, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। तीनों आंदोलनों में जो एक बड़ी समानता रही वह यह कि उनका नेतृत्व युवाओं ने किया।

किसी खुर्राट राजनेता के हाथ में उसकी बागडोर नहीं आ पाई। यह एक बड़ा बदलाव है। आम तौर पर आरक्षण को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया है। और यही वजह है कि जो व्यवस्था समाज में समरूपता ला सकती थी, वह उसमें विभाजन का एक बड़ा कारण बन गई है। जाटों, पटेलों और महाराठाओं के हिंसक आंदोलन ने उनमें और आरक्षण की सुविधा पाई अन्य पिछड़ी जातियों के बीच विद्वेष का एक ऐसा मजबूत आधार बना दिया है जो आने वाले समय में जातिवादी संघर्ष का रूप भी ले सकता है।

बहरहाल हाल फिलहाल के तीन आरक्षण आंदोलनों ने जो कचोटने वाले सवाल खड़े किए हैं उनका तत्काल जवाब ढूंढ़ना जरूरी हो गया है। यह अलग मुद्दा है कि जाटों, पटेलों और मराठाओं की आरक्षण की मांग जायज है या नहीं? असली मसला यह है कि क्या आरक्षण उनकी आर्थिक व सामाजिक हैसियत को और ज्यादा बढ़ा सकता है? यह भी कि आरक्षण क्या उन्हें बेहतर अवसर मुहैया करा सकता है? दवाब या आंदोलन के जरिए या राजनीतिक नफे-नुकसान की तराजू पर तौल कर इतनी ज्यादा जातियों को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर दिया गया है कि कोट में भी कोटे का संकट खड़ा हो गया है।

आरक्षण आंदोलन के पीछे किसी बड़ी राजनीतिक साजिश की आशंका भले ही जताई जाए लेकिन इस तरह के आंदोलन अनायास नहीं फूट पड़ते। यह अरसे से खदबदा रहे थे और राजनीतिक स्वार्थ के लिए इसे लगातार हवा-पानी दिया जा रहा था। जाट आरक्षण की बात करें तो 1989 में देवीलाल ने और उसके बाद केंद्र की वाजपेयी सरकार ने जाटों में आरक्षण की जो लालसा जगाई गई उस पर वोटों की राजनीति का खेल खेला गया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट चार साल से मांग कर रहे हैं कि देश भर के जाटों को आरक्षण देने के लिए सरकार संसद में कानून पास करवाए।

इसके लिए वे संसद का घेराव करने के अलावा दिल्ली में पानी और जरूरी चीजों की सप्लाई कई मौकों पर बाधित कर चुके हैं, रेल और सड़क यातायात को रोक कर व्यापक तोड़-फोड़ कर चुके हैं। हरियाणा में पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने लगातार वादा किया कि सत्ता में आते ही जाटों को दस फीसद आरक्षण देगी। सत्ता तो मिल गई लेकिन पार्टी अपना वादा भूल गई। डेढ़ साल तक जाट उसे उसका वादा याद दिलाने की कोशिश करते रहे और जब इसमें सफल नहीं हुए तो उनका असंतोष भड़क उठा। वह भी इतना उग्र कि बीस हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की सरकारी व निजी संपत्ति उन्होंने स्वाहा कर डाली। डेढ़ दर्जन से ज्यादा लोगों की जान गई सो अलग।

इससे ज्यादा शर्मनाक स्थिति और क्या हो सकती है कि असंतोष की सुगबुगाहट को समय रहते भांपा नहीं गया और जब उपद्रव विकराल हो गया तो सरकार ने घुटने टेक दिए। स्थिति ज्यादा बिगड़ सकती है इसका अंदेशा उसी समय हो गया था जब गुजरात में हार्दिक पटेल के आंदोलन की तर्ज पर 13 सितंबर 2015 को हिसार में रैली कर जाट आंदोलन को व्यापक करने का एलान हुआ था। अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति  ने उसकी रूपरेखा भी बना ली थी। सरकार का अगर मानना है कि जाटों को आरक्षण मिलना चाहिए तो उसने विध्वंस होने का इंतजार क्यों किया? और अगर जाटों को आरक्षण दिए जाने के पक्ष में वह नहीं है तो इतनी अराजकता के बाद वह इससे सहमत क्यों हुई? इससे सीधा संकेत यह गया है कि हिंसा का सहारा लेकर सरकार को झुकाया जा सकता है।

यह खतरनाक नजीर पहली बार नहीं बनी। लेकिन जाट आंदोलन के बाद इसके देश के कई हिस्सों में दोहराए जाने का खतरा खड़ा हो गया। महाराष्ट्र में पाटील मराठाओं ने आरक्षण की मांग शुरू कर दी। पिछले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने धनगरों व मराठाओं को आरक्षण देने का जो आश्वासन दिया था उसे उन पर 16 फीसद आरक्षण न्योछावरकर पूरा तो कर दिया लेकिन मामला अदालत में उलझ गया। महाराष्ट्र में करीब 75 जातियां आरक्षण की आस लगाए बैठी हैं।

मंडल आयोग ने 1930 की जनगणना के आधार पर पांच हजार से ज्यादा जातियों को पिछड़ा माना था। 2011 की जनसंख्या के जातिगत आंकड़े अगर जारी हो गए तो अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल होने के लिए न जाने कितनी और जातियां उठ खड़ी हों। सभी ने अपना ‘हक’ पाने के लिए हिंसा और तोड़-फोड़ का रास्ता अपनाना शुरू कर दिया तो क्या होगा? इससे तो समाज टूटेगा ही।

आरक्षण पर नए सिरे से विचार करने की अब जरूरत है, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की इस राय पर खासा हंगामा हुआ। दलील दी गई कि आरक्षण की व्यवस्था में रत्तीभर भी फेरबदल किया गया तो गृहयुद्ध छिड़ जाएगा या खून की नदियां बह जाएंगी। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सिर्फ दस साल आरक्षण तय करने की व्यवस्था की गई थी, उसकी समीक्षा करने की जरूरत समझे बिना उसे बनाए रखने और उसमें आरक्षण के नए-नए रास्ते खोलने की कामचलाऊ नीति ने क्या कम खून बहाया है?  आंतरिक अव्यवस्था की स्थिति तो वैसे भी समय-समय पर बनती रही है। ऐसे में मजबूत इच्छाशक्ति दिखा कर आरक्षण का आधार जातिगत की बजाए आर्थिक करने पर तो विचार किया ही जा सकता है। समरसता बनाए रखने के नाम पर अगड़ों और पिछड़ों को आमने-सामने खड़ा करने की आदत को नहीं बदला गया तो स्थिति और भयावह हो जाएगी। आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था से असहमति की कोई गुंजाइश नहीं बन पाएगी।

 

 

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