• [EDITED BY : नया इंडिया राजनैतिक ब्यूरो] PUBLISH DATE: ; 10 June, 2018 07:44 AM | Total Read Count 245
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भाजपा  में तो शुरू आम  चुनाव तैयारी

तन्मय कुमार -- भारतीय जनता पार्टी ने अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव का अभियान शुरू कर दिया है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के चार साल पूरे होने के मौके पर उपलब्धियां बताने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह अब अगले साल होने वाले चुनाव तक चलेगा। एक तरफ सरकार की उपलब्धियों का प्रचार है तो दूसरी ओर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का संपर्क अभियान है। वे देश की मशहूर हस्तियों से मिल कर उनके अपने साथ होने का मैसेज देश के लोगों को दे रहे हैं। वे अपनी सहयोगी पार्टियों के नेताओं से भी मिल रहे हैं। 

उन्होंने चुनाव के लिहाज से महत्वपूर्ण मुद्दों की पहचान कर ली है और किसी न किसी तरीके से उसे सुलझाने क प्रयास हो रहा है। सहयोगी पार्टियों के नेताओं से मिल कर उनको मनाने और अगले साल चुनाव में गठबंधन करके ही लड़ने के लिए तैयार करने का भी उनका प्रयास चल रहा है। पर कांग्रेस इन सारे मामले में फिसड्डी साबित हो रही है। जबकि भाजपा के मुकाबले उसके मुद्दों की पहचान करने और गठबंधन करने के लिए ज्यादा प्रयास करने की जरूरत है। उसका गठबंधन पूरे देश में बिखरा हुआ है और कायदे से उसे अब तक अपने सहयोगियों के साथ बातचीत करके गठबंधन को अंतिम रूप देने का काम शुरू कर देना चाहिए था पर उसने अब तक ऐसा नहीं किया है। 

कांग्रेस के पिछड़े होने के कारणों की पड़ताल करने से पहले यह देखना होगा कि कांग्रेस के साथ कौन कौन सी पार्टियां पक्के तौर पर हैं यानी कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए के साथ कौन सी पार्टी अब भी जुड़ी हुई है? इस लिहाज से गिनी चुनी पार्टियों का ही नाम लिया जा सकता है। वैसे कांग्रेस जब विपक्षी पार्टियों की बैठक बुलाती है तो उसमें 18 पार्टियां शामिल होती हैं पर उनमें से ज्यादातर यूपीए से बाहर हैं। 

यूपीए में कांग्रेस की सहयोगियों में सिर्फ छोटी छोटी पार्टियां हैं। डीएमके, राष्ट्रीय जनता दल, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, केरल कांग्रेस आदि पार्टियां यूपीए में हैं। अब कर्नाटक की जेडीएस भी यूपीए का हिस्सा बन गई है। इनके अलावा एनसीपी के साथ कांग्रेस की बातचीत चल रही है। ध्यान रहे कांग्रेस और एनसीपी ने महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव अलग अलग लड़ा था।  2014 के अक्टूबर में एनसीपी यूपीए से अलग हो गई थी। पिछले दिनों भंडारा गोंदिया सीट पर एनसीपी को कांग्रेस ने समर्थन दिया पर अभी एनसीपी की आधिकारिक रूप से यूपीए में वापसी नहीं हुई है। तभी कहा जा रहा है कि कांग्रेस के लिए सहयोगियों से बातचीत का मामला थोड़ा उलझा हुआ है। 

भाजपा और केंद्र सरकार के खिलाफ कांग्रेस की बुलाई बैठकों में शामिल होने वाली पार्टियां कांग्रेस के साथ भी हैं और अलग खिचड़ी भी पका रही हैं। जैसे समाजवादी पार्टी पिछले साल कांग्रेस के साथ मिल कर विधानसभा चुनाव लड़ी थी पर अब दोनों पार्टियां अलग अलग राजनीति कर रही हैं। सपा का रूझान बसपा की ओर ज्यादा दिख रहा है। 

इसी तरह कांग्रेस 2016 में सीपीएम के साथ मिल कर पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव लड़ी थी पर अब कांग्रेस के नेता तृणमूल कांग्रेस की ओर रूझान दिखा रहे हैं। सो, चाहे सपा हो या बसपा, सीपीएम हो या तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी हो या टीडीपी और टीआरएस हो या डीएमके सबके साथ कांग्रेस को नए सिरे से बात करनी है। ये पार्टियां कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन बनाने के बारे में दुविधा में हैं। इनके बीच तीसरा या संघीय मोर्चा बनाने की बातचीत भी हो रही है। तभी कांग्रेस को समझ में नहीं आ रहा है कि वह कहां से और किसके साथ बातचीत की शुरुआत करे। 

कांग्रेस को लेकर प्रादेशिक पार्टियों में एक सोच यह भी है कि पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी अभी देश भर की पार्टियों का नेतृत्व करने लायक नहीं हुए हैं। प्रादेशिक क्षत्रपों को राहुल गांधी से बातचीत करने में भी दिक्कत है। इसके अलावा कई क्षत्रपों की महत्वाकांक्षा प्रधानमंत्री बनने की है। सो, वे कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन को लेकर दुविधा में हैं। 

कायदे से कांग्रेस को आगे बढ़ कर पहल करनी चाहिए। सोनिया गांधी को खुद दूसरी पार्टियों के नेताओं से बात करनी चाहिए। नेतृत्व का मुद्दा तय किए बगैर एकजुटता की बात होनी चाहिए। कांग्रेस के पुराने नेता इसमें कारगर हो सकते हैं। 

कांग्रेस को समझना होगा कि प्रादेशिक क्षत्रपों के साथ उसका तालमेल बैठाना और भाजपा के खिलाफ एक साझा मोर्चा बनाने में ढेर सारी जटिलताएं हैं और अगर उसने देरी की तो इन्हें सुलझाने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाएगा। भाजपा से मुकाबले में बने रहने के लिए कांग्रेस को जल्दी से जल्दी अगले लोकसभा का अभियान शुरू करना होगा। 

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