• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 06 July, 2019 07:13 AM | Total Read Count 271
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फिर भी भरोसे की गलतफहमी में क्षत्रप

हर क्षेत्रीय पार्टी को लग रहा है कि लोकसभा में निपट गए तो कोई बात नहीं, आगे फिर वापसी कर लेंगे। उनको यह भी लग रहा है कि कांग्रेस निपट गई तो कोई बात नहीं वे नहीं निपटेंगे। मायावती को लग रहा है कि सपा निपट गई तो अच्छा हुआ बसपा मजबूत हो जाएगी। जदयू के नेताओं को लग रहा है कि अच्छा हुआ जो राजद खत्म हुई अब जदयू मजबूत हो जाएगी। हेमंत सोरेन को लग रहा है कि बाबूलाल मरांडी निपट गए तो अच्छा हुआ अब जेएमएम के लिए कोई चुनौती नहीं है। ऐसे ही शरद पवार को लग रहा है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस साफ हुई तो एनसीपी को फायदा होगा। प्रकाश अंबेडकर की पार्टी ने तो कांग्रेस को 40 विधानसभा सीटों का प्रस्ताव देकर यह बताने का प्रयास किया है कि कांग्रेस खत्म हो रही है और उसके दम पर छोटी पार्टियां मजबूत होंगी। 

क्षेत्रीय नेताओं का यह भरोसा उनको ले डूबेगा। उनको समझ ही में नहीं आ रहा है कि उनकी लडाई कांग्रेस या अपने जैसी किसी दूसरी छोटी पार्टी से नहीं है। उनको भाजपा से लड़ना है और भाजपा जिस अंदाज में लोकसभा का चुनाव लड़ी थी उसी अंदाज में वह विधानसभाओं के चुनाव भी लड़ेगी। झारखंड की दुमका सीट पर जोर लगा कर भाजपा ने शिबू सोरेन को हरा दिया तो यह नहीं समझना चाहिए कि अब वह शांत होकर बैठ जाएगी। उसे संथालपरगना का पूरा इलाका झारखंड मुक्ति मोर्चा के हाथ से छीनना है। वह इसके लिए राजनीति कर रही है। इसलिए वह इस इलाके में हेमंत सोरेन को घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ेगी। भाजपा बरसों से इस इलाके में मेहनत कर रही है। इसलिए अगर झारखंड मुक्ति मोर्चा को लोकसभा चुनाव की हार से सबक लेकर भाजपा से लड़ने की रणनीति बनानी होगी। 

शरद पवार की पार्टी लोकसभा की चार सीट जीत गई और कांग्रेस सिर्फ एक सीट पर जीती है। इससे एनसीपी नेताओं को इस मुगालते में रहने की जरूरत नहीं है कि अब वे कांग्रेस की जगह ले लेंगे। या कांग्रेस तो निपट गई पर एनसीपी बच जाएगी। अगर विपक्ष निपटेगा तो पूरा ही निपटेगा और उसका कारण उनकी कमजोर तैयारी और आपसी फूट होगी। लोकसभा चुनाव में पूरी तरह से साफ होने के बावजूद दिल्ली में सरकार चला रहे अरविंद केजरीवाल इस भ्रम में हैं कि वे विधानसभा चुनाव में अपने को बचा लेंगे। यह ठीक है कि प्रयास कर रहे हैं पर लोकसभा चुनाव की गलतियों से सबक नहीं ले रहे हैं। सबसे हैरान करने वाला मसला दक्षिण भारत के क्षत्रपों का है। वे इस भ्रम में हैं कि भाजपा उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है। इसी भ्रम में देवगौड़ा परिवार अपने नए सदस्यों को पार्टी का पदाधिकारी बना रहा है तो स्टालिन भी बेटे को उत्तराधिकारी बनाने में लगे हैं। इनका यह अतिआत्मविश्वास ही इनको ले डूबेगा। 

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