• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 24 August, 2019 06:43 AM | Total Read Count 1016
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कांग्रेस, अहमद पटेल सोचें!

चिदंबरम जेल में हैं! मतलब कांग्रेस जेल में है। और ऐसा इंप्रेशन खुद कांग्रेस ने बनवाया है। निश्चित ही चिदंबरम की हवालात का अर्थ है कि आगे रॉबर्ट वाड्रा, अहमद पटेल को भी जाना ही है। चिदंबरम जैसा व्यक्ति यदि लाठी से हवालात में है तो रॉबर्ट वाड्रा, अहमद पटेल का आगे क्या होगा, इसे समझने में ज्यादा दिमाग नहीं लगाना चाहिए। और सोचें, यदि ये दोनों हवालात गए तो सोनिया-प्रियंका-राहुल क्या करेंगें? क्या कांग्रेस में तब चुनाव लड़ने, राजनीतिक आंदोलन करने की ताकत बचेगी? कतई नहीं। वह तब चुनाव लड़ने लायक नहीं, बल्कि अपने अहमद पटेल, चिदंबरम, रॉर्बट वाड्रा के लिए स्यापा करने वाली पार्टी हो जाएगी!

सो, कांग्रेस मुक्त भारत के अभियान में मील का पत्थर चिदंबरम, रॉबर्ट वाड्रा और अहमद पटेल पर एजेंसियों की घेरेबंदी वाली हवालात है। चिदंबरम का मामला टेस्ट केस है। सोनिया गांधी और अहमद पटेल ने इस गिरफ्तारी के खिलाफ कांग्रेस पार्टी की प्रतिष्ठा दांव पर लगाई। एआईसीसी में चिदंबरम ने प्रेस कांफ्रेंस की। कांग्रेस आलाकमान नेता बिना सोचे-समझे स्टैंड ले बैठे कि यह लोकतंत्र की हत्या है। बहुत संभव है अहमद पटेल ने ही सलाह दी हो कि कांग्रेस को चिदंबरम के लिए अपने आपको झोंकना चाहिए। तभी चिदंबरम के घर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने जा कर सीबीआई का प्रतिरोध किया। 

वह गलत फैसला था। इसलिए क्योंकि लुटयिन दिल्ली से बाहर के तमाम कांग्रेसी नेताओं- कार्यकर्ताओं में पी चिंदबरम को ले कर सहानुभूति नहीं है। चिदंबरम की अहंकारी, मनमानी और स्वार्थी नेता की इमेज कांग्रेसियों में ज्यादा गहरी पैठी हुई है। मुझे एक नहीं, बल्कि तीन चार राजधानियों (रांची, जयपुर, भोपाल, कोलकत्ता) से फीडबैक मिली कि चिदंबरम की गिरफ्तारी से कांग्रेसी उलटे खुश नजर आए। सो, कांग्रेस मुख्यालय ने चिदंबरम की गिरफ्तारी को भले लोकतंत्र पर हमला बताया लेकिन कांग्रेसियों ने मोटे तौर पर मन ही मन सोचा अच्छा हुआ। 

तभी सवाल है आगे रॉबर्ट वाड्रा और अहमद पटेल चपेटे में आए तो क्या होगा? कई लोग इस मुगालते में हैं कि इनके खिलाफ कुछ नहीं होना है। ऐसा अपने को नहीं लगता। जब चिदंबरम का मैनेजमेंट काम नहीं कर पाया और खुद की बेटी की एक हत्यारी इंद्राणी को गवाह बना चिदंबरम जैसे तुर्रम खां को निपटा दिया तो अगस्ता वेस्टलैंड मामले में क्रिश्चियन मिशेल को मोदी सरकार ने विदेश से ला कर अहमद पटेल के लिए सुरक्षित रखा हुआ है। वहीं दीपक तलवार, रतुल पुरी, संदेसरा ग्रुप जैसे कहीं की ईंट, कहीं का पत्थर जैसे प्रबंधों से अहमद पटेल, उनके बेटे-दामाद की वह तुकबंदी हुई पड़ी है, जिससे अंततः अहमद पटेल वह तोता बनेंगे, जिससे सीधे टेंटुआ कसे और भारत के लोकतंत्र में भी पाकिस्तान की तरह विरोधी नेताओं का देश छोड़ कर लंदन या दुबई जा कर बसना शुरू हो। यह तरीका भी नए भारत के नए लोकतंत्र में कांग्रेस मुक्त, परिवार मुक्त भारत का रास्ता हो सकता है।  

सचमुच चिदंबरम को कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी जैसों की लीगल टीम और इनके सत्ता के तमाम पुराने तारों के बावजूद हवालात है तो रॉर्बट वाड्रा और अहमद पटेल का वक्त आना ही है। अहमद पटेल को अभी तक चिदंबरम की क्षमताओं पर भरोसा था। अपने मैनेजमेंट और मोदी-शाह के गुजराती कनेक्शनों से सुरक्षा थी। कांग्रेस और परिवार को शायद इसलिए भी संभाला हुआ हो कि इसकी पूंजी से भी मोदी-शाह उनकी यूटिलिटी माने रहेंगे। वे न कांग्रेस को राहुल गांधी के नाम या उनकी चाह वाले लड़ाकू दिग्विजय सिंह को ट्रांसफर होने देंगे और न किसी ऐसे मर्द नेता को अध्यक्ष बनने देंगे, जिसकी वफादारी उनके प्रति न हो, बल्कि मोदी-शाह से भिड़ने में हो!

हां, इस तरह की चर्चाएं औसत कांग्रेसियों में भी हैं। इंदिरा गांधी के विपक्ष के वक्त में कांग्रेस संघर्ष के करो-मरो मोड में इसलिए आ जाया करती थी क्योंकि पार्टी ऑर्गेनिक थी। एचकेएल भगत, टाइटलर, सज्जन कुमार जैसे जुझारू नेताओं की भीड़ ताकत लिए हुए होती थी। सोचें, नरेंद्र मोदी ने पिछले चुनाव में दो टूक शब्दों में कहा है कि अभी ये जमानत पर हैं और सत्ता की अगली वापसी के बाद ये (कांग्रेसी-विपक्षी नेता) जेल में होंगे। तभी सौ दिन के भीतर चिदंबरम हवालात के पीछे हैं। इन सौ दिनों में कांग्रेस ने लड़ाई के लिए दबंग अध्यक्ष तय नहीं किया, बल्कि उलटे सोनिया-अहमद पटेल दोनों ने जहां राहुल गांधी का संन्यास होने दिया वहीं पार्टी पूरी तरह अहमद पटेल पर आश्रित हुई। अब कोई यह न सोचे कि सोनिया गांधी का चार्ज है तो अहमद पटेल कंट्रोल में नहीं हैं। 

यह स्थिति कुल मिला कर देश की इकलौती अखिल भारतीय विपक्षी पार्टी का भट्ठा बैठाने व इसके नेताओं को दो-तीन साल में दुबई या लंदन में निर्वासित जीवन गुजारने की मजबूरी बनाने वाला रास्ता है। चिदंबरम, रॉबर्ट वाड्रा, अहमद पटेल वे तीन चेहरे हैं, वे तीन तोते हैं, जिन्हें मोदी-शाह को हवालात में डालना ही है। इसका रोडमैप, गवाह, कागजात, सच्ची-झूठी जांच का खाका जानकार लोग वैसे ही बूझे हुए हैं, जैसे कभी मनमोहन सरकार के वक्त में चिदंबरम-अहमद पटेल का मोदी-शाह के लिए बना रोडमैप बूझा जाता था। 

अहमद पटेल को (चिदंबरम की तरह) गलतफहमी है कि उनका वक्त चुपचाप कट जाएगा। उन्हें राज्यसभा में रहने दिया जाएगा। उन पर आंच नहीं आएगी। कांग्रेस पर उनके कब्जे की यूटिलिटी में अदानी-अंबानी-गुजराती कनेक्शन मोदी-शाह की कृपा बनवाए रखेंगे। ऐसा चिदंबरम भी अरूण जेटली के भरोसे सोचा करते थे। अपनी थीसिस है कि मोदी-शाह जिस दिन रॉबर्ट वाड्रा-अहमद पटेल को हवालात में डालेंगें उस दिन हिंदू भक्तों में, खुद कांग्रेसियों के चेहरे मन ही मन यही बोलेंगे कि अच्छा हुआ। एआईसीसी में भले रॉबर्ट वाड्रा और अहमद पटेल प्रेस कांफ्रेस करें। गिरफ्तारी को पार्टी लोकतंत्र की हत्या बताए लेकिन अहमद पटेल के लिए पांच कांग्रेसी भी मन से रोने वाले नहीं होंगे। न नेता रोएंगे, न मीडिया रोएगा और न राहुल गांधी उनके लिए धरने पर बैठेंगे। मैं यह बात कुछ विश्वास से इसलिए कह रहा हूं क्योंकि राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से हटने के बाद तमाम छोटे-बड़े कांग्रेस नेताओं, प्रदेश अध्यक्षों-मुख्यमंत्रियों की मन की बात यह सुनाई दी कि अहमद पटेल पार्टी में किसी मर्द नेता को अध्यक्ष नहीं देखना चाहते। उन्हें अपने खतरे में अपना कठपुतली अध्यक्ष चाहिए। मतलब पार्टी न दबंग हो पाए, न आंदोलन कर पाए और न यह कहने की जुर्रत करे कि हमें हवालात जाने से डर नहीं। हां, अहमद पटेल और सोनिया गांधी को कतई यह अंदाज नहीं है कि उन्होंने पार्टी को सिर्फ और सिर्फ साजिशों के सामने एक ढाल में कन्वर्ट कर दिया है। तभी आगे चिदंबरम जैसी नियति में पार्टी का मरना-खपना है।

 

  • बहुत सच्चे मन से साफगोई और सत्यता से लिखा है।

    on 10:14 PM | August 28

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