• [WRITTEN BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 10 August, 2019 07:08 AM | Total Read Count 536
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अमित शाह ‘मुखौटा’ नहीं ‘असली’ पर तब...

वक्त और इतिहास जिस निर्ममता से भारत में रिपीट होता है वह गहरे सवाल लिए हुए है। सोचें, क्या गजब बात जो एक आइडिया ऑफ इंडिया के वक्त में पंडित नेहरू और सरदार पटेल की जोड़ी थी तो उस आइडिया से भारत को बदलवाने  वाले याकि ट्रांजिशनल फेज में वाजपेयी और आडवाणी की जोड़ी का राज बना। अब संघ के आइडिया ऑफ इंडिया का दो टूक राज है तो जोड़ी मोदी-शाह की है। 

अब जरा यह विचार करें कि 72 वर्षों के अनुभव में भारत राष्ट्र-राज्य में अंततः नेहरू, वाजपेयी और मोदी का राजयोग हुआ तो क्या मतलब है और पटेल, आडवाणी आउट हुए तो अमित शाह की आगे क्या नियति है? मोटे तौर पर भारत के लोगों ने मध्यमार्गी, सहजवादी व्यक्तित्व और लफ्फाजी को अवतारी राजा वाला मान दिया है। इसे बारीकी से समझा जाए। आजादी से पहले और बाद में कांग्रेस में सरदार पटेल का दबदबा था। उनका कांग्रेस में योगदान, प्रभाव वैसा ही था जैसा भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी का था। पटेल हिंदू आकांक्षा, हिंदुओं के मन के नायक थे बावजूद इसके राजतिलक नेहरू का हुआ!

ऐसे ही भाजपा का असली चेहरा लालकृष्ण आडवाणी थे। बेचारे गोविंदाचार्य ने उस वक्त गलत नहीं कहा कि वाजपेयी मुखौटा हैं, जबकि आडवाणी असली चेहरा। आडवाणी ने ही मंदिर आंदोलन पकाया। रथयात्रा की। संगठन और हिंदुओं को नए चेहरे और जुमले दिए। 

लेकिन इस सबके बावजूद राजतिलक अटल बिहारी वाजपेयी का हुआ। आडवाणी मन मसोस कर रह गए। राज आडवाणी की मेहनत, विजन और संकल्प से आया लेकिन प्रधानमंत्री का पद वाजपेयी को मिला। उन्हें नंबर दो हो कर, हार्डलाइन, संगठक की इमेज के साथ जीवन जीना पड़ा।  वहीं स्थिति नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी की हकीकत है। 

कोई माने य़ा न माने, सन् 2012 में नरेंद्र मोदी के दिल्ली चलो के सफर की शुरुआत का बीज अमित शाह की बदौलत है। सन् 2011-12 में दिल्ली में निर्वासन के वक्त में अमित शाह ने ही जंतर-मंतर में अन्ना हजारे-केजरीवाल के आंदोलन के साथ नौजवान चेहरों की मनोदशा को बूझते हुए एक शाम नरेंद्र मोदी को फोन कर कहा था कि साहेब दिल्ली तैयार है। इसके अलावा इस मोटी बात को भी नोट रखें कि उत्तर प्रदेश में माहौल बनाने और वाराणसी से नरेंद्र मोदी को चुनाव लड़वाने की कल्पना आदि का रोडमैप अमित शाह की बदौलत ही था। मतलब यह कि आडवाणी ने जैसे माहौल, स्थितियां, देश की राजनीति स्थिति बदलने का पुरुषार्थ किया ठीक वहीं रोल नरेंद्र मोदी के 2014 के जनादेश से पहले अमित शाह का था। 

सो, वक्त, भाग्य, घटनाओं और हिंदू मनोविश्व की बुनियादी दशाओं ने मोदी-शाह की जोड़ी का आज जो रूप बनाया हुआ है वह कई मायनों में वाजपेयी-आडवाणी की पुनरावृत्ति है। 

तब सवाल है कि अमित शाह का राजनीतिक सफर भी क्या आडवाणी जैसा रहेगा? वे कुछ भी कर लें, नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद पर लगातार बैठे रहने हैं। कई भाई लोग चंडूखाने वाली यह चर्चा करते हैं कि सन् 2022 में नरेंद्र मोदी राष्ट्रपति बनेंगे और अमित शाह प्रधानमंत्री या यह कयास की 2029 में तो अमित शाह प्रधानमंत्री बन ही जाएंगे। 

अपन न ज्योतिषी हैं और न ज्योतिष पर विश्वास रखने वाले हैं। इस मामले में मैंने सिर्फ एक भविष्यवाणी सही होते देखी है, जिसे अस्सी के दशक में भी आडवाणी को ले कर बताया जाता था। वह यह कि वे कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। इसके बजाय मैं खुद सियासी हिसाब, जनता की बुनावट में लोकसभा में दो सदस्यों की दशा व रथयात्रा के बाद आडवाणी के लिए लिखता रहा, कहता रहा कि आडवाणी के लिए ले दे कर एके हंगल का रोल बनता है न कि सुपर हीरो याकि अमिताभ बच्चन जैसा रोल। नेता के प्रति हिंदू का मनभावन तभी है जब बॉलीवुड़ के सुपर हीरो जैसी डायलॉगबाजी और सिनेमाई जादू हो। इसके अलावा आडवाणी के मामले में उत्तर भारत के हिंदू में उनकी सिंधी पहचान है तो भला कैसे मुख्यधारा के जननायक बन सकते हैं। 

वहीं सीमा अमित शाह के लिए है। नरेंद्र मोदी ने अपने आपको ओबीसी प्रचारित किया है तो वह वाजपेयी के ब्राह्मण होने की पहचान की लीक पर है। जबकि अमित शाह की सीमा जैन-हिंदू (ऐसा परिवार की श्रीनाथजी मतलब वैष्णव-शैव आस्था से) होना है। वे अपने को बनिया प्रचारित कराएं लेकिन उत्तर भारत के बनियों में अरविंद केजरीवाल बैठे हुए हैं और अमित शाह नहीं। अमित शाह के साथ ऐसी और भी कई सीमाएं हैं। उनकी डायबिटीज पुरानी है, सेहत में उन्हें लगातार अनुशासित रहना होता है। फिर पुरानी इमेज का अलग संकट है। वैसे अमित शाह के पास वक्त है और वे सन् 2029 में भी 65-66 साल के ही होंगे लेकिन इस सबमें आडवाणी को कितना लंबा कालखंड मिला मगर बना क्या? मतलब लंबा वक्त भी गारंटी लिए नहीं होता है।  

पूछ सकते हैं यह सब सोचना ही क्यों? अमित शाह ने अपने को हनुमान बनाया हुआ है तो हनुमान की तरह सेवा कर उन्हें रिटायर होना है। इस पर मैं कुछ नहीं बोलूंगा। बस, इतना ध्यान रखें कि युग त्रेता का नहीं, बल्कि कलियुगी है। इसके आगे फुलस्टॉप!

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