• [WRITTEN BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 07 September, 2019 07:19 AM | Total Read Count 225
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बैंकों की मरहम पट्टी का उपाय

भारत में बैंकिंग और गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं का हालत सबसे खराब है। बैंकों का एनपीए और बट्टे खाते में डाले जाने वाले कर्ज की मात्रा लगातार बढ़ रही है तो दूसरी ओर गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं के दिवालिया होने का सिलसिला भी उतना ही तेज हो रहा है। आईएलएंडएफएस दिवालिया हो गई है और डीएचएफएल भी दिवालिया होने की कगार पर है। इन कंपनियों ने हजारों करोड़ रुपए के लोग फर्जी कंपनियों को दिए, जो सब डूब गए। इसी तरह सरकारी बैंकों के कर्ज भी डूबे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक पिछले पांच साल में सरकारी बैंकों ने पांच लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के कर्ज को राइट ऑफ किया है यानी बट्टे खाता में डाला है। ऐसी स्थिति में पूरी आर्थिकी की बड़ी चीरफाड़ की जरूरत है। बड़े आर्थिक सुधारों की जरूरत है। आर्थिकी पटरी पर लौटेगी तभी बैंकों की स्थिति सुधरेगी। इसे समझने की बजाय सरकार बैंकों की मरहम पट्टी में लगी है। 

इस समय देश का लगभग हर बैंक बढ़ते एनपीए से परेशान है। किसी का कम है तो किसी का ज्यादा है। सो, भारत सरकार ने ओवरऑल एनपीए घटाने का एक नायाब तरीका निकाला। सरकार ने बैंकों का विलय शुरू करा दिया। जिन बैंकों का एनपीए कम था, उनके साथ ज्यादा एनपीए वाले बैंकों का विलय करा दिया और इस तरह ओवरऑल बैंकों का एनपीए घट गया। विजया बैंक और देना बैंक के विलय के समय इसी आधार पर बैंक कर्मचारियों के संगठन ने सरकार के फैसले का विरोध किया था। पर सरकार के विरोध की सुनवाई इन दिनों कहीं भी नहीं हो रही है। 

बहरहाल, उस प्रयोग से प्रोत्साहित होकर सरकार ने इस बार एक साथ दस बैंकों के विलय का फैसला किया। दस बैंकों को मिला कर चार बड़े बैंक बनाने की घोषणा की गई। वित्त मंत्री ने आर्थिकी की खराब हालत और मंदी की चिंता के बीच एक दिन कुछ छोटे मोटे उपाय बताए और उसके अगले हफ्ते बैंकों का विलय का ऐलान किया। इस बार के विलय में पंजाब नेशनल बैंक, यूनाइटेड बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स, इलाहाबाद बैंक, यूनियन बैंक, इंडियन बैंक, केनरा बैंक, बैंक ऑफ इंडिया आदि शामिल हैं। सरकार ने बैंकों के विलय की शुरुआत स्टेट बैंक के छह एसोसिएट बैंकों और भारतीय महिला बैंक के विलय से किया था। विलय की इस प्रक्रिया से भारत के सरकारी बैंकों की संख्या 27 से घट कर 12 हो गई है। 

सरकार का तर्क है कि बैंकों का विलय करके बड़ा बैंक बनाने से उसके प्रबंधन में आसानी होती है। हालांकि बैंक कर्मचारियों के सबसे बड़े संगठन का ऐसा नहीं मानना है। अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ का मानना है कि बड़े बैंक होने से बैंक का प्रबंधन सुधर जाता हो इसका कोई सबूत नहीं है। हां, यह जरूर है कि बैंक बड़े होंगे तो उनके पास ज्यादा पूंजी होगी और वे ज्यादा कर्ज दे सकेंगे। ध्यान रहे इस समय सरकार की सबसे बड़ी चिंता यह है कि लोग कर्ज लें और खर्च करें ताकि मांग बढ़े और विकास दर बढ़ाई जा सके। सरकार के इससे पहले के तमाम प्रयास विफल हो चुके हैं। मौद्रिक नीति के जरिए सरकार ने विकास दर बढ़ाने का बहुत प्रयास किया। कई बार नीतिगत ब्याज दरों में कटौती की गई। पिछले एक साल में आरबीआई ने ब्याज दर एक फीसदी से ज्यादा कम किए पर कोई फायदा नहीं हुआ। 

तो अब बैंकों के विलय, बड़े बैंक बनाने, बड़ी पूंजी उपलब्ध कराने की बातें शुरू हुई हैं। ध्यान रहे सरकार ने यह भी कहा है कि वह तत्काल सरकारी बैंकों को 70 हजार करोड़ रुपए उपलब्ध कराने जा रही है। इसका भी मकसद वहीं है कि बैंक कर्ज बांटना बढ़ाएं और लोग कर्ज लेकर खर्च करें। पर इसका दूसरा पहलू यह है कि देश के बड़े उद्योगपतियों को ज्यादा कर्ज दिलाया जा सकेगा। उनके ऊपर पहले से बहुत भारी भरकम कर्ज है, जिनका बड़ा हिस्सा बैंक बट्टे खाते में डाल रहे हैं। उनको नए और बड़े कर्ज भी दिलाए जा सकते हैं। इससे बैंकों की हालत सुधरने की बजाय और खराब होगी। बदलाव सिर्फ यह होगा कि पहले जिन लोगों पर चार बैंकों का कर्ज था उन पर अब एक बैंक का कर्ज हो जाएगा। सो, उन्हें अपने कर्ज अलग अलग बैंकों से राइट ऑफ कराने की बजाय एक ही जगह से कराने में आसानी हो जाएगी। 

सरकार बार बार भरोसा दिला रही है कि बैंकों के विलय से कर्मचारियों की नौकरी नहीं जाएगी। पर असल में ऐसा नहीं है। स्टेट बैंक में उसके एसोसिएट बैंकों के विलय के बाद हजारों लोगों की नौकरी गई है। अगर नौकरी नहीं भी जाती है तो यह तय मानें कि नई नौकरियों का रास्ता पूरी तरह से बंद होगा। विलय से बनने वाले बड़े बैंकों के दुनिया के बैंकों से प्रतिस्पर्धा करने लायक होने का दावा भी बेबुनियाद है क्योंकि छह-सात बैंकों को स्टेट बैंक में मिलाने के बाद भी देश का सबसे बड़ा बैंक दुनिया के बैंकों के मुकाबले कहीं नहीं है।

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