• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 03 August, 2019 06:21 AM | Total Read Count 438
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आज उद्यमी- कारोबारी दशा

पिछले पांच सालों में कोई पांच हजार उद्मी-बिजनेसमेन भारत में तंग आ कर भारत छोड़ विदेश जा बसे। कोई 378 बड़ी कॉरपोरेट-कंपनियां कर्ज की देनदारी में दिवालिया हो अपने को खत्म कराने के लिए आईबीसी में है। ये कंपनियां मार्च 2019 तक ढाई लाख करोड़ रू की कर्ज देनदारी लिए हुए थी। कुल 750 बड़े कॉरपोरेट डिफाल्टर थे। कंपनियों की बदहाली और बाजार मूड ने शेयर बाजार में लोगों के बारह लाख करोड रू डुबाए हंै। जो सर्वाधिक उछलता ऑटो उद्योग था उसमें जुलाई में बिक्री 40 प्रतिशत कम थी। तमाम ऑटो कंपनियां बाजार में खरीददार न होने से उत्पादन घटाएं हुए है और इनकी बिना बिकी गाड़ियों की इनवंट्री दिनोदिन बढ़ रही है।  

सो हर कोई दुष्चक्र में फंसा हुआ। कैफे कॉफी डे की बिक्री घटी हुई थी। मालिक सिर्धाीबर्थ के लिए कम बिक्री, जस के तस खर्चें, ऊपर से पूंजी देने वाले साहूकारों का तकाजा था तो वैसी दशा इस समय सौ से ज्यादा उद्यमी मालिकों की है। केयर रेटिंग लि. के मुख्य अर्थशास्त्री के अनुसार ऐसे सौ प्रतिष्ठान हंै जहां लोग उस एक्ट्रीु म स्थिति में हंै कि कंपनियां अपने को बचाए रखने के लिए रिफाइनेंस का जुगाड़ नहीं बना पा रही है। जुगाड़ हो भी नहीं सकता क्योंकि पूरी आर्थिकी गतिहीन, जकड़ी हुई है। 

मतलब जिस दशा में किसान आत्महत्या करता है, वैसी दशा असंख्य कारोबारियों की होंगी। लघु और मध्यम (एमएसएमई)कंपनियों या धंधों के उद्यमियों का संकट अधिक भयावह है। यही क्षेत्र भारत में व्यापार, धंधे की जान है। छह -साढ़े छह करोड़ यूनिट के उद्यमियों से भारत में बारह करोड लोगों को रोजगार मिलता है और कुल जीडीपी का एक-तिहाई उत्पादन इनसे होता है। नोटबंदी के बाद इन ईकाईयों और उनके उद्यमी मंदी के चलते अपना सामान बेचने, लिए हुए कर्ज की किस्ते अदा करने या रिफाईनेंस में सर्वाधिक परेशान रहे है। 

इसलिए क्योंकि भारत के दिवालिया बैंकों के पास कर्ज देने के लिए न पैसा है और न हिम्मत। सरकार की महाकाय गैर-बैकिंग वित्तिय संस्था आईएलएंडएफएस के दिवालियां होने के बाद तो बाजार में उद्यमियों की दशा वैसी ही भयावह है जैसे किसानों के लिए चौपट सहकारी बैंक आदि से कर्ज ले सकना या कर्ज को आगे बढ़ा सकना असंभव है।   

सोच सकते हैं कि इन बातों का क्या मतलब है? तो वह यह है कि आज भारत में छोटे-लघु या कॉरपोरेट सभी तरह के उद्योगपति, लखपति-करोड़पति-अरबपति वैसी ही दशा में है जैसे फसल बरबाद होने, फसल नहीं बिकने के बाद छोटे- बड़े किसान की होती है। सबने पैसा लिया हुआ है लेकिन चुका नहीं सकते है। ब्याज बढ़ रहा है और ग्राहकी कम है और प्लांट, कर्मचारियों का खर्चा जस का तस।  2015 के बाद इस उम्मीद में लगातार जस का तस खर्चा बना हुआ है कि इस साल नहीं तो अगले साल बिक्री बढ़ेगी। डिमांड बनेगी। लेकिन एक-एक कर चार साल गुजर गए, और दुकान खुली हुई है, कारखाने चल रहे है लेकिन बिक्री नहीं और स्टॉक बढ़ा हुआ।  

ऐसे में छोटा उद्यमी छोटे इंस्पेक्टरों, लोकल बैंक मैनेजर के तकाजों में बरबाद है तो अरबपतियों की बैंक बोर्ड, इनकम टैक्स, ईडी. सेबी आदि के तकाजों, कंपलायंस से जान सूखी हुई है। भ्रष्टाचार कैसे चरम स्थिति में पहुंचा है इसकी हर कारोबारी अनुभव के साथ दास्तां बताता मिलेगा। जुलाई-जून के छोटे-बडे दोनों किस्सों पर गौर करे। जून में केरल के एक मजदूर साजन ने नाईजीरिया में मजदूरी करके अपनी 12 करोड़ रू की बचत से प्रदेश में एक कंनवेंशन हॉल बनाया। अचानक एक दिन उस उद्यमी ने आत्महत्या कर ली। खबर अनुसार इसलिए क्योंकि वह नगरपालिका से निर्माण की एनओसी, लाईसेंस नहीं ले पाया। नगरपालिका की चेयरमैन महीनों उसे घूमाती रही। वह कम्युनिस्ट पार्टी से है। सो कम्यनुस्ट पार्टी की सत्ता की कलम हो या भाजपा की कलम हो या कांग्रेस की सबका व्यवहार सदा सनातनी भारत में एक सा है। क्योंकि सबके लिए भारत में नादिरशाह की परंपरा हाकिमशाही का यह ब्रह्यवाक्य है कि भारत लूटने के लिए है। 

सपने बना कर, मजूदरी से 12 करोड़ रू बचा कर भारत में लौटा एनआरआई एक नगरपालिका के आगे विवश हुआ और आत्महत्या की तो अरबपति, पूर्व मुख्यमंत्री का दामाद कैफे कॉफी डे का मालिक सिर्द्धार्थ अपने खुद के शेयरों से अपने कर्ज का निपटारा इसलिए नहीं कर पाया क्योंकि इनकम टैक्स का अफसर सांप की तरह फन तान कर बैठा हुआ था।  

सो एक तो मंदी और ऊपर से सिस्टम के पिटारे के सभी सांपों को नरेंद्र मोदी द्वारा उद्योगपतियों, व्यापारियों, कारोबारियों के बीच छोड़ कर डराने का ऐसा तंत्र आज बना है कि आगे की यह बात नोट रखे कि अगले दो-तीन सालों में कारोबार-धंधे में वह होगा जिसकी कभी कल्पना नहीं की होगी।  

 

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