• [WRITTEN BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 10 August, 2019 07:18 AM | Total Read Count 794
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श्रेय अमित शाह अकेले को

हां, कोई माने या न माने, अपना दो टूक मानना है कि अनुच्छेद 370 का हटना सिर्फ और सिर्फ अमित शाह की वजह से है। वैसे ही जैसे सोमनाथ मंदिर का बनना सरदार पटेल की समझ व जिद्द से था। पंडित नेहरू को जैसे मंदिर का श्रेय नहीं देते हैं जबकि वे फैसले की कैबिनेट में प्रधानमंत्री थे वहीं स्थिति अनुच्छेद 370 का फैसला लेने वाले कैबिनेट की है। अमित शाह ने ही रास्ता निकाला, फैसला बनाया और उस पर नरेंद्र मोदी की मंजूरी थी। मई 2014 से मई 2019 के बीच फैसला नहीं हुआ, पांच वर्षों में हिंदू एजेंडे में एक काम नहीं हुआ और दूसरे कार्यकाल के तीन महीने में तीन तलाक, एनआईए व यूएपीए एक्ट और अनुच्छेद 370 को खत्म करने का फैसला हुआ है तो वजह सिर्फ और सिर्फ अमित शाह का गृह मंत्री बनना है। 

इसकी वजह में अमित शाह की किंतु-परंतु के बीच रास्ता निकालने की कोर ताकत याकि जिद्द है। अनुच्छेद 370 के फैसले के बाद अरूण जेटली ने जब समर्थन के ट्विट किए तो मेरे मन में विचार आया कि यदि जेटली अभी सरकार में होते और कानून मंत्री होते तो क्या संविधान-कानून से ऐसे रास्ता निकाल लेते, जैसे अमित शाह ने बिना वकील हुए निकाला है? न सोचें कि कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने तरीका सुझाया। कैसे अनुच्छेद 370 की ही जूती से और राष्ट्रपति शासन से ही सभी शक्तियां अपनी बता कर जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करना है, यह क्रिएटिविटी शत-प्रतिशत अमित शाह की मानी जानी चाहिए। अमित शाह ने राज्यसभा में अनुच्छेद 370 के खंड-तीन का जिस अंदाज में जिक्र कर टेक्निकलिटी के हवाले विपक्ष की आपत्ति को खारिज किया उसके पीछे उन्हीं के द्वारा टेक्निकलिटी में अनुच्छेद 370 को ध्वस्त करने का जुगाड़ू बुलडोजर भी है! 

हां, नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह, अरूण जेटली 2014-19 के पांच साल में जम्मू-कश्मीर के मामले में  35ए पर विचार से आगे नहीं बढ़ पाए थे जबकि अमित शाह ने एक झटके में सब कुछ खत्म कर जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित दिल्ली जैसा प्रदेश बना डाला। संविधान प्रावधान, व्यवस्था सबकी टेकनीकल जोड़-तोड़ से ऐसा जुगाड़ निकाला कि अभी भी तमाम संविधान विशेषज्ञ व जानकार यहीं सोच हैरान है कि ऐसा कैसे हो गया? 

तो जवाब अकेले अमित शाह! 

पूरी स्क्रिप्ट, क्या जवाब देना, कैसे विपक्ष को तोड़ना और अजित डोवाल से ले कर पूरी ब्यूरोक्रेसी का कैसा उपयोग करना है यह सब कुछ अकेले अमित शाह के सौजन्य से है। अमित शाह के अलावा किसी का कोई मतलब नहीं! सब जीरो। 

कह सकते हैं मोदी प्रथम कार्यकाल (2014-19) में यदि नंबर एक फैसला नोटबंदी का था तो वह अकेले नरेंद्र मोदी का था तो वैसे ही मोदी-दो कार्यकाल का सबसे बड़ा फैसला (ऐसा पूरे पांच साल के परिप्रेक्ष्य में भी मान सकते हैं।) जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन है और वह सिर्फ और सिर्फ अमित शाह की बदौलत है। आजाद भारत के इतिहास में नोटबंदी और अनुच्छेद 370 खत्म करने के दो लम्हे हमेशा स्मरणीय रहेंगे। इनके नतीजे में अंततः क्या बनता है इसका जवाब वक्त देगा लेकिन मोटे तौर पर 1947 के बाद प्रारंभिक वक्त में तत्कालिन आइडिया ऑफ इंडिया में पंडित नेहरू और सरदार पटेल की जैसी जो पहचान दर्ज है वैसे ही संघ के आइडिया ऑफ इंडिया के हिंदू राज में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की इन दो फैसलों से बन गई है। 

इस बात का अधिक मतलब नहीं है कि राज्यसभा में फैसला होने के बाद अमित शाह ने सदन में ही झुक कर नरेंद्र मोदी से आशीर्वाद लिया और उसकी फोटो जब अखबार में छपी तो देश ने माना कि जो कुछ है वह रामजी के हनुमानजी को आशीर्वाद से है। फालतू बात है। अमित शाह स्वंयभू नेता, सरदार पटेल जैसी शख्सियत हिंदू मनोविश्व में बना चुके हैं। उनका नरेंद्र मोदी से आशीर्वाद लेना या मोदीजी को अनवरत श्रेय देना वैसे ही है जैसे कभी मोदी बार-बार आडवाणी से आशीर्वाद लिया करते थे! 

 

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