• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 06 July, 2019 07:00 AM | Total Read Count 288
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भगवान भरोसे लालू यादव की पार्टी

जनता दल से अलग होकर लालू प्रसाद ने जब से अपनी अलग पार्टी राजद बनाई तब से पहला मौका है, जब उनकी पार्टी का लोकसभा में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। पहली बार ऐसा हुआ कि बिहार की 40 में से एक भी सीट उनकी पार्टी नहीं जीत पाई। सोचें, रांची की जेल और अस्पताल में बैठे लालू क्या महसूस कर रहे होंगे? पर उससे भी ज्यादा उनके लिए चिंता की बात यह होगी कि ऐसे खराब नतीजे के बाद भी उनका परिवार या पार्टी कोई समझदारी वाला फैसला नहीं कर रहा है। 

लोकसभा चुनाव के नतीजे आए और उन्होंने अपने जिस बेटे को पार्टी का कमान सौंपी है वह गायब हो गया। 23 मई के बाद से लापता रहा तेजस्वी यादव हफ्ते भर पहले प्रकट हुए और कहा कि इलाज के लिए गए थे। तेजस्वी जब अज्ञातवास से लौटे तो बिहार विधानसभा का सत्र चल रहा था और वे शुरू के दो-तीन दिन सत्र में भी शामिल नहीं हुए। सोचें, राजद बिहार की सबसे बड़ी पार्टी है। सरकार चला रहे नीतीश कुमार की पार्टी से दस विधायक ज्यादा हैं राजद के। तेजस्वी उस पार्टी के नेता हैं फिर भी सरकार के लिए कोई चुनौती नहीं हैं। क्या वे समझ रहे हैं कि अपने आप सारी चीजें ठीक हो जाएंगी? उनका बंधुआ वोट बैंक फिर से उनको वोट दे देगा और पार्टी का प्रासंगिकता बनी रह जाएगी? 

यदि तेजस्वी ऐसी ही राजनीति करते रहे तो पिछले 30 साल में उनके पिता ने जो पूंजी बनाई है वह दो साल में गंवा देंगे। भाजपा इसके लिए जीतोड़ प्रयास कर रही है। तेजस्वी की गैरहाजिरी में भाजपा नेताओं ने कई किस्म की अफवाहें फैलाईं। राजद की ओर से पिछले डेढ़ महीने में ऐसा कोई राजनीतिक प्रयास नहीं हुआ है, जिससे लगे कि वह भाजपा की फैलाई अफवाहों को गलत साबित कर रही है। 

उसके सहयोगी रालोसपा नेता उपेंद्र कुशवाहा खुद चुनाव हार गए और उनकी पार्टी भी शून्य पर सिमट गई। पर वे राज्य सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरे हैं। मुजफ्फरपुर से पटना की पदयात्रा कर रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी पार्टी के नेता नदारद हैं। तेजस्वी, मीसा भारती और तेज प्रताप पहले परिवार का झगड़ा सुलझाएं, फिर पार्टी को एकजुट करके नए एजेंडे के साथ मैदान में उतरें नहीं तो अगले साल होने वाले चुनाव में नामोनिशान नहीं बचेगा। 

 

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