• [WRITTEN BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 10 August, 2019 06:56 AM | Total Read Count 431
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घाटी के बंदोबस्तों कतई कोताही नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को अंदाजा था कि अनुच्छेद 370 हटाने पर देश में और खास कर कश्मीर में क्या प्रतिक्रिया होने वाली है। इसलिए राजनीतिक प्रबंधन के साथ साथ सुरक्षा बंदोबस्तों पर भी अमित शाह ने पूरा ध्यान दिया। जून में अपनी यात्रा के दौरान उन्होंने सुरक्षा हालातों का जायजा लिया था और यह समझ लिया था कि किसी इमरजेंसी की स्थिति के लिए क्या करना होगा। इसके उपाय करते हुए अमित शाह ने हमेशा यह ध्यान रखा कि किसी को ऑपरेशन 370 की भनक न लगे। 

याद करें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल की कश्मीर यात्रा को। वे 23-24 जुलाई को कश्मीर की यात्रा पर गए थे। इसके दो दिन बाद करगिल विजय के 20 साल पूरे होने वाले थे। हर साल 26 जुलाई को विजय दिवस मनाया जाता था। सो, माना गया कि अजित डोवाल उसी सिलसिले में कश्मीर गए हैं। तभी किसी ने इस बारे में कोई अतिरिक्त कयास नहीं लगाया। जिस समय कश्मीर और देश में करगिल विजय के 20 साल पूरे होने का जश्न मनाया जा रहा था उस समय अमित शाह असल में अनुच्छेद 370 हटाने का ताना बाना बुन रहे थे। 

शाह की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि कश्मीर घाटी में हिंसा न हो और सीमा पार से पाकिस्तान किसी बड़ी घटना को अंजाम न दे पाए। इन दोनों मोर्चों पर भी वैसे पहले से ही कार्रवाई हो रही थी। राष्ट्रीय जांच एजेंसी, एनआईए ने कश्मीर के सारे अलगाववादी नेताओं की नकेल पहले से कस रखी थी। इस लिहाज से सोच सकते है कि ऑपरेशन 370 पर पिछली सरकार में ही काम शुरू हो गया था। पिछले दो साल में एनआईए ने अलगाववादी नेताओं की सारी फंडिंग बंद कर रखी है और हवाला के जरिए इनको पैसे पहुंचाने वाले सारे कारोबारियों के खिलाफ भी मामले दर्ज हैं। कई अलगाववादी और उनको आर्थिक मदद देने वाले कारोबारी जेल में बंद हैं। अलगाववादियों के बाहर और सक्रिय नहीं होने का फायदा यह मिला कि वे लोगों को भड़का नहीं सके। उनके खिलाफ हुई कार्रवाई ने घाटी के आम लोगों में यह मैसेज बनवाया कि अपने इशारे पर कश्मीर घाटी को नचाने वालों का यह अंजाम है तो आम पत्थरबाजों और प्रदर्शन करने वालों के साथ क्या बरताव किया जाएगा? 

बहरहाल, डोवाल के कश्मीर से लौटने के बाद इस योजना पर अमल शुरू हुआ। सबसे पहले अमरनाथ यात्रा रोकी गई। सरकार अमरनाथ यात्रा के बाद भी यह फैसला कर सकती थी पर तब शायद इतना माहौल नहीं बनता और देश इतना उद्वेलित नहीं होता। अमरनाथ यात्रा रोक कर देश भर में भाजपा के समर्थकों को तैयार रहने का मैसेज दे दिया गया। यह बता दिया गया कि सरकार कुछ बड़ा करने जा रही है। इसके बाद बड़े पैमाने पर घाटी से तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों को निकालने का अभियान चला। इसके समानांतर अतिरिक्त सैन्य बलों की तैनाती घाटी में शुरू की गई। 

खुद अमित शाह इस पर नजर रखे हुए थे। उन्होंने दिल्ली में वरिष्ठ अधिकारियों के साथ रविवार को बैठक की। खुफिया ब्यूरो और रॉ के अधिकारियों के साथ भी बैठक की। उधर सेना, वायु सेना को हाई अलर्ट पर रखा गया और स्थानीय स्तर पर बताई गई जरूरतों के मुताबिक सेना के विमान तैनात किए गए। देश के अलग अलग हिस्सों से सेना के विमानों के जरिए अतिरिक्त सैन्य बलों को कश्मीर पहुंचाया गया। अपेक्षाकृत शांत उत्तरी कश्मीर और जम्मू के कई इलाकों में भी अतिरिक्त बलों की तैनाती की गई। राजनीतिक प्रबंधन की तरह यहां भी ध्यान रखा गया कि फैसले की घोषणा से पहले किसी को भनक न लगे कि सरकार क्या करने जा रही है। 

तभी यह प्रोपेगेंड़ा हुआ कि बड़े आतंकवादी हमले की खुफिया सूचना है। जब्त किए गए लैंडमाइन्स और हथियार भी दिखाए गए। यह भी प्रचारित किया गया कि हर पंचायत में सरपंचों को कहा गया है कि वे 15 अगस्त को अपने यहां तिरंगा फहराएं, इसके लिए अतिरिक्त बलों की तैनाती की जा रही है। विपक्षी नेता राज्यपाल सत्यपाल मलिक से मिलने गए तब राज्यपाल ने कहा कि राज्य प्रशासन की जानकारी में ऐसी कोई बात नहीं है कि सरकार किसी संवैधानिक प्रावधान को बदलने जा रही है। रविवार को आधी रात के करीब जब पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती को नजरबंद किया गया और कश्मीर में धारा 144 लगाई गई तब भी यहीं कयास लगाया जा रहा था कि सरकार अनुच्छेद 35ए हटाने जा रही है। 

शांति बनाए रखने के बंदोबस्त कितने पुख्ता तो इसका अंदाजा इस बात से लगता है कि सेना और अर्धसैनिक बलों को तमाम किस्म के साजोसामान से लैस किया गया। कश्मीर में सेना, अर्धसैनिक बलों और पुलिस के पास जितने भी सेटेलाइट फोन थे, सारे निकाले गए। उन्हें दूरदराज के इलाकों में पहुंचाया गया। 35 हजार से ज्यादा अतिरिक्त बलों की तैनाती की गई। सुखोई और मिराज 2000 विमानों ने श्रीनगर हवाईअड्डे पर कितनी उड़ाने भरीं इसकी गिनती नहीं है। एनटीआरओ के ड्रोन अलग अलग इलाकों में तैनात किए गए ताकि अगर लोगों की भीड़ इकट्ठा हो तो उसके बारे में जल्दी सूचना मिल सके। 

सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत खुद सारी तैयारियों का जायजा ले रहे थे। उन्होंने राज्य का दौरा किया और ऐसी जगहों पर खास ध्यान दिया, जहां से आतंकवादी हमले की ज्यादा संभावना थी। सीमा पार के आतंकवादी शिविरों की पहचान करके उनको निशाना बना कर फायरिंग भी हुई ताकि यह कंफ्यूजन बने की सैन्य बलों की तैनाती आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए बढ़ाई जा रही है। यह भी गोपनीयता बनाए रखने की रणनीति का एक हिस्सा था।

 

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