• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 27 July, 2019 07:42 AM | Total Read Count 758
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नमो नहीं अब अमित शाह!

गजब अटकलबाजी है लेकिन हकीकत नहीं। बावजूद इसके दिल्ली के सत्ता गलियारों, सांसदों- अफसरों और भाजपा के नेताओं में चौतरफा सचमुच चर्चा है कि सरकार अमित शाह चला रहे हैं। उन्हीं से अफसरों के, पार्टी के, सरकार की रीति-नीति के फैसले हो रहे हैं। पहले कार्यकाल में नमो-नमो था अब अमित शाह-अमित शाह है। क्या सचमुच? मैं नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बीच रिश्तों की हकीकत जानता हूं, इसलिए मैं इस धारणा को फिजूल मानता हूं। कुछ भी हो जाए, कुछ भी कर लें नरेंद्र मोदी और अमित शाह के रिश्ते वाजपेयी- आडवाणी की ही प्रकृति में बंधे रहने हैं। मतलब याद रखें कि आडवाणी का कितना ही जलवा बना हो, संगठन- गृह मंत्री के नाते उनकी कितनी ही चर्चा हुई हो मगर कभी आडवाणी की हिम्मत नहीं हुई जो वाजपेयी के रहते प्रधानमंत्री बनने का अपना प्रोफाइल बनवाएं या दांव चलें। 

वैसा ही मामला मोदी और शाह में है। मोदी अभी भी अमित शाह के लिए ‘साहेब’ हैं, वे खुद हनुमान हैं, आडवाणी हैं। राज नमो का ही है अमित शाह का नहीं। ये चर्चाएं बेतुकी हैं कि अंततः अमित शाह प्रधानमंत्री बनने की ओर हैं। अपना मानना है कि मोदी-शाह की जोड़ी का मौजूदा स्वरूप 2029 तक जस का तस रहेगा। मैं ज्योतिष-सेहत विशेषज्ञों के हवाले होने वाली इन अटकलों में भी सार देखता हूं कि बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दमखम को अगले दस साल तक कुछ नहीं होना है। सो, अमित शाह का रोल, कार्यकाल हनुमान, आडवाणी का ही बना रहना है। 

बावजूद इसके अमित शाह का कद सरकार में पटेल की तरह नेहरू पर ओवरशैडो बनाता तो दिख रहा है। गौर करें 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद के 60 दिनों पर और नई लोकसभा के गुजरे साठ दिनों पर। तब सरकार में फैसले करवाने के नाते अरूण जेटली का नाम था। अफसरों से ले कर रीति-नीति सबमें जिधर सुनें उधर जेटली का नाम। बावजूद इसके वे आडवाणी और पटेल जैसी कोई धारणा नहीं बना पाए। मगर इन साठ दिनों में संसद के सेंट्रल हॉल में व बाहर कई नेता-जानकार अपने को समझाते मिले कि अमित शाह छा गए हैं। मैं इसके आगे की पतंगबाजी का उल्लेख नहीं करूंगा क्योंकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों की तासीर, उनके रिश्तों की बारीकियां जानता हूं। 

बहरहाल, सवाल है कि अमित शाह के छा जाने की धारणा क्यों बनी है? निःसंदेह वजह मंत्रियों को बनाए जाने, स्पीकर तय करने से ले कर अफसरों की पोस्टिंग, संसद के एजेंडे, पार्टी के तमाम फैसलों में अमित शाह की निर्णायकता है। भाजपा के इतिहास की इस अनहोनी का भी संगठन- नेताओं पर असर हुआ है कि नया अध्यक्ष तय होने के बाद भी उसे कार्यकारी रखा गया है और सभी फैसले बतौर अध्यक्ष अमित शाह के नाम से ही हो रहे हैं तो इसका अर्थ हुआ कि सब कुछ अमित शाह के सुपुर्द। संघ की तरफ से भी वे ही सभी मामलों में कर्ता-धर्ता। 

सो, साठ दिनों का अनुभव बताता है कि मोदी के पिछले कार्यकाल के साठ दिनों में अरूण जेटली का जो जलवा था वह इस कार्यकाल में अमित शाह के जलवे के आगे दस-बीस प्रतिशत भी नहीं था। न ही वाजपेयी राज में आडवाणी की वैसी तूती बनी थी जैसी आज अमित शाह की है। इसलिए दिल्ली के सत्ता गलियारों के आम जानकारों में जो फील है वह स्वभाविक भी है। भाई लोग नरेंद्र मोदी और अमित शाह के साथ-साथ चलते हुए उनकी बॉडी लैंग्वेज, भाव-भंगिमा के हवाले भी बताने लगे हैं कि आपने गौर नहीं किया कि अमित शाह का सीना, उनकी चाल, उनकी भंगिमा ज्यादा छप्पन इंची अहसास लिए हुए है। अब इस पर यह बताते हुए क्या बहस हो कि अमित शाह के चलने का अंदाज उनकी कद-काठी की बुनावट से है। बावजूद इसके नमो-एक कार्यकाल में सरकार में जेटली की धमक और नमो-दो सरकार में अमित शाह की धमक का साठ दिन का फर्क, विश्लेषण दो टूक पब्लिक परसेप्शन लिए हुए है कि अमित शाह ने अपनी छाया में सबको ले लिया है। 

अपना मानना है कि नरेंद्र मोदी खुद ऐसा चाहते हैं, इसलिए ऐसा है। मोदी अब अपने को वैसे ही वैश्विक नेता हुआ मान रहे हैं, जैसे पंडित नेहरू ने माना था। वे नेहरू बन गए हैं या बन रहे हैं और यह अहसास बनने दे रहे हैं कि वे उदार मना, दुनिया की, गरीब की चिंता करते हुए महादेवता हैं और बाकी अमित शाह के सुपुर्द। नरेंद्र मोदी इस कार्यकाल में अटल बिहारी वाजपेयी, पंडित नेहरू जैसी पुण्यता बनाने की फितरत में हैं, अपने अवतार को नए शृंगार में सजवाने का रोडमैप लिए हुए हैं। तभी पार्टी, संगठन, अफसरी तबादलों, राजकाज की रोजमर्रा की कर्कशता व चुनाव आदि की जरूरतों को अमित शाह के सुपुर्द किए हुए हैं। 

मतलब यदि अमित शाह सरकार में सरदार पटेल और आवाडणी बनें तो बनें उससे भला नरेंद्र मोदी का क्या बिगड़ेगा। उनके राज को चार चांद ही लगेंगे। क्या कोई कहता या लिखता है नेहरू-पटेल सरकार या वाजपेयी-आडवाणी सरकार? इसलिए अमित शाह के ओवरशैडो जैसी बातें फालतू हैं। नरेंद्र मोदी ही सरकार है और वे ही सरकार 2024 में भी रहेंगे और तब यदि भाजपा वापिस जीती तब भी वे ही फिर सरकार होंगे। 

 

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