• [WRITTEN BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 10 August, 2019 07:03 AM | Total Read Count 432
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राजनीतिक प्रबंधन में छाप

जम्मू कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म कराने की योजना पर कब से काम हो रहा था, यह कोई नहीं बता सकता। कई तरह की अटकलें चली हैं। जैसे यह कि अमित शाह को गृह मंत्री बनाया ही इसलिए गया था कि इस योजना पर अमल होना था। चर्चा हुई कि अमित शाह की जून में हुई कश्मीर यात्रा से पहले इस बारे में नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों सैद्धांतिक फैसला कर चुके थे। जून में कश्मीर यात्रा के दौरान शाह ने सेना और प्रशासन के अधिकारियों के साथ बातचीत की थी और जमीनी हालात को समझा था। मतलब कश्मीर यात्रा फैसले की तैयारी का हिस्सा थी। 

जून और जुलाई के दो महीने अमित शाह ने राजनीतिक प्रबंधन में बिताए। सबसे बड़ा सिरदर्द राज्यसभा में बहुमत बनाने का था। भाजपा और एनडीए के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं था और उन्हें चिंता थी कि अगर विपक्ष एकजुट हो गया तो क्या होगा। वे नहीं चाहते थे कि एक बार कदम आगे बढ़ाने के बाद पीछे हटना पड़े। तभी इन दो महीनों में उन्होंने कई स्तर पर विपक्ष को कमजोर करने का प्रयास किया। विपक्ष को संख्या बल में और धारणा के स्तर पर कमजोर करना और अपनी रणनीति को गोपनीय रखना, ये दो चीजें इस मामले में अंहम थी। 

सोचें, इन दो महीनों में कितनी पार्टियों के राज्यसभा सांसद टूटे। इसी अवधि में टीडीपी के चार सांसद तोड़े। टीडीपी के छह में से चार सांसदों को भाजपा में शामिल कराया। उनके ऊपर दलबदल कानून नहीं लागू हुआ। इंडियन नेशनल लोकदल के इकलौते सांसद का इस्तीफा करा दिया। समाजवादी पार्टी के तीन सांसदों का एक एक करके इस्तीफा कराया। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद संजय सिंह का इस्तीफा कराया और जिस दिन अनुच्छेद 370 हटाने का संकल्प पेश किया उस दिन कांग्रेस के दिग्गज नेता और राज्यसभा सांसद भुवनेश्वर कलिता का इस्तीफा करा दिया। जब विपक्षी पार्टियों के राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे शुरू हुए तो किसी को अंदाजा नहीं था कि यह किस रणनीति का हिस्सा है। 

इस बीच संसद के बजट सत्र को दस दिन बढ़ाने का फैसला था। तब यह कयास था कि सरकार कोई चौंकाने वाला बिल ला सकती है। इस मामले में गोपनीयता का उच्चतम स्तर मेंटेन किया गया। किसी को कश्मीर के बारे में अंदाजा नहीं लगाने दिया। उलटे मीडिया में एक हिस्से में यह खबर चलवाई गई कि बढ़ी हुई अवधि में सरकार नागरिकता कानून में संशोधन का बिल ला सकती है। पांच अगस्त की सुबह साढ़े नौ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट की बैठक शुरू हुई तब तक एक-दो को छोड़ कर किसी कैबिनेट मंत्री को अंदाजा नहीं था कि क्या होने वाला है। जो ज्यादा इंटेलीजेंट थे वे यह कयास लगा रहे थे कि अनुच्छेद 35ए खत्म करने का फैसला हो सकता है। जब कैबिनेट में अनुच्छेद 370 हटाने का प्रस्ताव रखा गया तो सब हैरान रह गए। 

पांच अगस्त, सोमवार की सुबह कैबिनेट की बैठक होने वाली थी और उसके बाद 11 बजे अमित शाह संसद में अनुच्छेद 370 के ज्यादातर प्रावधान हटाने का प्रस्ताव लाने वाले थे और राज्य का दो हिस्सों में बांटने का बिल था। आम तौर पर हफ्ते के पहले दिन पार्टियों के सांसद देर से सदन में आते हैं। ज्यादातर सांसद शुक्रवार को अपने क्षेत्र में चले जाते हैं और सोमवार की सुबह आते हैं तो उन्हें आते आते देरी हो जाती है। इसलिए अमित शाह ने एक रणनीति के तहत अपनी पार्टी के सांसदों को शुक्रवार को दिल्ली से बाहर जाने ही नहीं दिया। भाजपा ने तीन और चार अगस्त को दिल्ली में एक कार्यशाला रख दी। 

सांसदों को बताया गया कि इसमें सिखाया जाएगा कि उन्हें संसद में कैसे आचरण करना है और संसदीय बहसों में कैसे हिस्सा लेना है। हैरानी की बात है कि इसके लिए संसदीय कार्यमंत्री ने व्हीप जारी किया। व्हीप सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेने के लिए जारी होता है, सदन के बाहर के लिए नहीं। लेकिन व्हीप जारी करके यह सुनिश्चित किया गया कि सारे  भाजपा सांसद कार्यक्रम में हिस्सा लें। वह बहुत बोरियत वाला और उबाऊ कार्यक्रम था, जिसमें रविवार को पत्रकारों को मौजूद देख कर खुद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि आज रविवार है, आज तो छुट्टी ले लेते!

दो दिन के इस कार्यक्रम के बहाने अपने सारे सांसदों को दिल्ली में रखा गया ताकि सोमवार की सुबह जब अमित शाह भाजपा सरकार का अब तक का सबसे अहम प्रस्ताव संसद में रखें तो उस समय अधिकतम मौजूदगी रहे। तभी दोनों सदनों में भाजपा सांसदों की लगभग सौ फीसदी मौजूदगी रही। हालांकि उनको अंदाजा नहीं था कि सोमवार को संसद में क्या होने वाला है। वे सिर्फ कयास लगा रहे थे कि कुछ बड़ा होने वाला है। 

राजनीतिक प्रबंधन का दूसरा पहलू था कि किसी तरह से ज्यादा से ज्यादा विपक्षी पार्टियों और गैर यूपीए व गैर एनडीए पार्टियों को इसके समर्थन में तैयार किया जाए। इस काम में अमित शाह खुद तो लगे थे, उन्होंने दो ऐसे लोगों को इस काम में लगाया था, जिनका हर पार्टी के नेताओं से संपर्क रहा है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और पार्टी के महासचिव भूपेंद्र यादव को अमित शाह ने विपक्ष से बात करने की जिम्मेदारी लगाई थी। इन दोनों ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई। तभी बसपा और बीजद जैसी पार्टियां सरकार का समर्थन करने पर राजी हुई। दक्षिण भारत की ज्यादातर पार्टियों को समझाने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी क्योंकि उनके लिए यों भी कश्मीर का मसला बहुत सरोकार वाला नहीं रहा है। 

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