• [WRITTEN BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 07 September, 2019 08:40 AM | Total Read Count 476
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हिंदू कथा सुनेगा, हकीकत नहीं!

वक्त किसी का भी हो, हिंदू राजा का हो, गोरी या गजनवी का हो या नेहरू और नरेंद्र मोदी का, हिंदू कथाओं में जीता है। कथा वह तरीका है जो हकीकत, तकलीफ, जिंदगी जीने के सत्य से, चुनौतियों के आगे रेत में सिर छुपवाते हुए मुंगेरीलाल के सपनों में हिंदुओं का जीना संभव बनवाती है। कथा जो बांचता है, बनाता है, सुनता-सुनाता है उसके लिए इहलोक की, वक्त की, वर्तमान की, आज की हकीकत का मतलब नहीं है। पंडित नेहरू और उनके बाद के दशकों में दो-तीन प्रतिशत विकास दर थी और दुनिया ने उसे हिंदू विकास दर का नाम दिया तब भी हम हिंदू अपने आपको विश्व गुरू, सोने की चिड़िया बनता मान रहे थे। तब के प्रोपेगेंडा याकि कथाओं का सार था कि आज भले तकलीफ है लेकिन भविष्य की नींव पड़ रही है। दुनिया में भारत के मॉडल, मध्य मार्ग व नेहरू का जलवा है। इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया तो आम हिंदू तब उस कथा से मंत्रमुग्ध था कि सरकारी छत्रछाया में बैंक वैश्विक स्तर के बनेंगे। गरीब को, आम जनता को पैसा और पूंजी सुलभ होगी। 

कथा की तब ताकत थी जो गरीबी हटाओ के झूले में पूरा देश झूला। इंदिरा गांधी को बार-बार वोट मिला। सचमुच जैसे आसाराम, राम-रहीम आदि बाबा और संत लाखों लाख भक्तों के आगे कथा और लीला रच हिंदुओं को मंत्रमुग्ध बनाते हैं वैसे भारत के नेताओं ने भी हिंदू, हिंदू की जातियों, समुदायों को दशकों झूला झुलाया कि वे भरोसा रखें, कल्याण सुनिश्चित है, त्याग करो, दान करो, चढ़ावा चढ़ाओ, उनकी गद्दी बनवाए रखो तो सामाजिक न्याय होगा। आर्थिक विकास होगा। हम जगदगुरू बनेंगे। घी-दूध की नदियों में डुबकियां लेंगे। 

यह प्रस्तावना इसलिए है क्योंकि इस सप्ताह मैंने दिल्ली के बाहर बैंकों के पुनर्गठन पर आम हिंदू के दिल-दिमाग से निकली कुछ दिलचस्प प्रतिक्रिया सुनी। एक प्रतिक्रिया थी- विलय से अपने बैंक इंटरनेशनल लेवल के हो जाएंगे। बैंकों की ही समस्या थी तो सरकारी बैंकों के एक-दूसरे में मिलने से आर्थिकी और मंदी का संकट दूर होगा! कैसे? तो दलील थी कि बैंक फटाफट पैसा देंगे और घाटा जल्दी दूर हो जाएगा। बैंक पैसा निकालेंगे तो पैसा चलेगा और चलेगा तो आर्थिकी दौड़ेगी!

और यह बात मैंने ऐसे व्यापारियों (निश्चित ही अंध मोदी-भाजपा समर्थक), उद्यमियों से सुनी जो मंदी से, बदहाली और दिवालियापन से बुरी तरह घायल हैं। बरबाद हुए पड़े हैं लेकिन बावजूद इसके आखिर में वाक्य यहीं सुनने को मिला कि कोई बात नहीं, अगली पीढ़ी का भविष्य बन रहा है!

यह है कथा उर्फ प्रोपेगेंडा उर्फ नैरेटिव का कमाल! हम हिंदुओं की नियति है कि एक वक्त गांधी-नेहरू ने धर्म आधारित देश का विभाजन, देश की हत्या करा कथा बनाई थी कि इससे इतिहास की समस्या का समाधान हुआ और हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई। फिर नेहरू ने मझोले-बड़े कारोबारों का राष्ट्रीयकरण करके, लोगों की उद्यमिता को मार कर समाजवाद की झांकी की कथा सुनाई और हिंदू उनके अंध भक्त माफिक दिवाने बने रहे। 

यह फर्क बेहूदा है कि तब हिंदू मूर्ख थे और 72 साल बाद आज समझदार हैं, जो पंडित नेहरू के वक्त की कथा को छोड़ कर आज वे हकीकत में जीवन जी रहे हैं। पहले साक्षर नहीं थे। अब साक्षर हैं। अपना उलटा मानना है तब हिंदू उस वक्त की दुनिया, आबोहवा में ज्यादा ज्ञानवान, विचारवान, पुस्तक, विज्ञान केंद्रित था। तब ऑक्सफोर्ड-कैंब्रिज, बीएचयू, एएमयू की शिक्षा-दीक्षा से भारत के लोग उत्प्रेरित थे न कि आज की तरह मूर्खताओं-झूठ के व्हाट्सअप विश्वविद्यालय की सर्वशिक्षा से प्रभावित। तब आसाराम, राम-रहीम जैसे कारोबारी साधू-संतों-बाबाओं की कथाओं, उनके प्राणायामों में हिंदू नहीं जीता था, बल्कि सात्विक, सनातनी प्रभुदत्त ब्रह्यचारी, शंकाराचार्यों और कल्याण पत्रिका की कथाओं में हिंदू जीया करता था। तब सत्यनारायण की कथा चलती थी न कि लाल किताब के जादू टोने या शनि के काले धागे को गांधी या नेहरू या पंडित मालवीय बांधे रहते थे।

फिर भी तब और अब का फर्क भी फिजूल है। इसलिए कि कुल मिला कर तो दोनों वक्त वक्त की सच्चाईयों से परे कथाओं में हिंदू का जीना प्रमाणित है। नेहरू और उनके बाद के प्रधानमंत्रियों ने भी विकट आर्थिक संकट के वक्त में नहीं माना था कि एक-दो-तीन प्रतिशत की विकास दर सत्यानाश है। महंगाई या मंदी से लोगों का जीना बेहाल है। हर वक्त, हर दौर में हिंदू को यह कहते हुए उल्लू बनाया जाता रहा है कि कोई बात नहीं आने वाली पीढ़ियों के लिए काम हो रहा है। भारत विश्व ताकत बन रहा है। तीसरी दुनिया के देशों में भारत सिरमौर हो रहा है। 

वह ढर्रा जस का तस आज है। दुनिया कह रही है, घर-घर में चर्चा है कि पैसे की कड़की है, कामधंधा चौपट है, रोजगार गायब है, सामान बिक नहीं रहा है, बाजार में खरीददार नहीं है लेकिन भारत सरकार और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को नहीं दिख रहा है आर्थिक संकट! सब तो ठीक है। डॉ. मनमोहन सिंह ने चेताया कि अब तो सबकी सुन कर संकट समाधान का रास्ता निकालो तो निर्मला सीतारमण का जवाब था- उन्होंने जो कहा उस पर मेरा कोई सोचना नहीं। उन्होंने बोला मैंने सुना! एक सितंबर को उनसे पत्रकार ने पूछा कि इकोनोमिक स्लोडाउन है या नहीं तो उनका जवाब था- सरकार बीमार क्षेत्रों के साथ विचार विमर्श कर रही है। मतलब ऐसा संकट कहा जो जनता को हकीकत बताते हुए कहा जाए कि आर्थिकी हिचकोले खा रही है, दुर्घटना हो सकती है इसलिए सभी बेल्ट बांधें। 

ऐसा कहना हकीकत व सच्चाई बताना होगा। लोगों के आगे तब नोटबंदी के बाद की बरबादी की सच्चाई को मानना होगा। भक्ति और अंध विश्वास की नींद से लोगों को जगाना होगा। कथा खत्म करनी होगी और सबके लिए पंडाल छोड़ भागने का रास्ता खोलना होगा। 

और हां, कथा सुन रहे, सपने देख रहे हिंदू कतई नहीं सोचेंगे कि जो हो रहा है वह हिंदू का मूल दो-तीन प्रतिशत विकास दर की और लौटना है और भारत की आर्थिकी का पाकिस्तानीकरण है। जिहादी पाकिस्तान में लोगों ने कभी आर्थिकी और पैसे की चिंता नहीं की। जिन्ना की कथा जिहादी बनाने की थी तो लोग बने। 72 सालों में पाकिस्तान में कभी आर्थिकी संकट को ले कर चिंता या स्यापा नहीं हुआ। वैसा ही विश्वास आज भारत के नियंताओं को भी है तो इसलिए कि आज की भारत कथा में वह कथानक है जो जिन्ना-लियाकत-भुट्टो-इमरान से पाकिस्तान की जनता लगातार सुनती रही है। 

 

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