• [EDITED BY : Devdutt Dubey] PUBLISH DATE: ; 07 August, 2019 08:25 AM | Total Read Count 246
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महत्त्व बनाए रखने के लिए संभावनाओं से भरा मध्य प्रदेश

देवदत्त दुबे

दिल्ली में राजनीति करने के लिए जिस तरह से कोई जगह दिखाई नहीं दे रही है उससे अब मध्य प्रदेश से जुड़े तमाम नेता अपना महत्व बनाए रखने के लिए प्रदेश को ही संभावनाओं से भरा हुआ मान रहे और किसी न किसी तरह से वे अपनी सक्रियता अपना प्रेम अपना रुझान दिखा रहे हैं।

दरअसल, दिल्ली में जिस तरह से मोदी और शाह का दबदबा बना हुआ है। उससे वहां और किसी के लिए फिलहाल संभावनाएं नहीं बन पा रही है यहां तक कि प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष के चयन को ही लेकर संशय की स्थिति में है। उससे कांग्रेस नेताओं को भी अपना भविष्य अनिश्चित दिख रहा है। यही कारण है की राज्यों के क्षत्रप नेता दिल्ली की बजाए अपने अपने राज्य में ही अपनी जमीन तलाश रहे है ऐसे में मध्यप्रदेश में दिग्गज नेताओं की बढ़ती रुचि ने सियासत मैं कौतूहल पैदा कर दिया है और हालत यह है कि अब कौन कब किसके साथ हो जाए कौन पाला बदल जाए कुछ भी नहीं कहा जा सकता।

प्रदेश के दोनों ही प्रमुख दलों कांग्रेस और भाजपा को जहां अपने निर्वाचित विधायकों को संभालने में पसीना आ रहा है। उन दोनों ही दलों के दिग्गज नेताओं के मूड को भावना भी मुश्किल हो रहा है।

बहरहाल, मुख्यमंत्री कमलनाथ को इस मायने में दूरदर्शी नेता माना जा सकता है जिन्होंने बहुत पहले केंद्र की राजनीति की दिशा भापकर मध्य प्रदेश का रुख कर लिया था वरना इसके पहले तक वे मध्यप्रदेश में केवल किंगमेकर की भूमिका में ही रुचि लेते रहे और केंद्र की राजनीति में हमेशा सक्रिय रहे हैं। वैसे तो दिग्विजय सिंह ने भी समय रहते नर्मदा यात्रा के सहारे प्रदेश की राजनीति में अपनी जमावट शुरू कर दी है। आज उनके प्रदेश में विधायक भी है मंत्री भी है और महत्वपूर्ण पोस्टों पर अधिकारी भी हैं और लगातार बे प्रदेश में सकरी बने हुए हैं। जबकि पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मध्यप्रदेश में पहले प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनना चाहते थे फिर मुख्यमंत्री बनना चाहते थे लेकिन ऐसा हो नहीं पाया उल्टे वे लोकसभा का चुनाव और हार गए।

लोकसभा चुनाव के बाद सिंधिया समर्थक विधायक और मंत्रियों ने एक बार फिर से उनका नाम प्रदेश अध्यक्ष के लिए आगे बढ़ाया लेकिन अभी जबकि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का ही अता-पता नहीं है ऐसे में मध्यप्रदेश में किसी भी प्रकार के परिवर्तन की गुंजाइश नहीं बन रही है लेकिन यदि सिंधिया दबाव नहीं बनाएंगे तो फिर उन्हें अपने मंत्रियों को मंत्रिमंडल में बनाए रखने में भी मुश्किल हो सकती है। यही कारण है कश्मीर के मुद्दे पर उन्होंने पार्टी लाइन से हटकर धारा 370 हटाए जाने का स्वागत कर दिया। वैसे तो यह जन भावना के साथ सिंधिया का जाना माना जा रहा है लेकिन सिंधिया के इस कदम से पार्टी के अंदर सनसनी जरूर बनी है कि जिस तरह से उलटफेर की राजनीति देश में उफान पर है वैसे में कहीं सिंधिया समर्थकों का इशारा उसी राजनीति की तरफ तो नहीं है। फिलहाल सिंधिया समर्थक भी उनकी सक्रियता मध्यप्रदेश में ही चाहते हैं। दूसरी तरफ भाजपा में भी अधिकांश नेता मध्य प्रदेश में ही सक्रिय रहना चाहते हैं पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह को भले ही सदस्यता अभियान का राष्ट्रीय प्रभारी बना दिया गया लेकिन वे मध्यप्रदेश में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से नहीं चूकते है। यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती भी दिल्ली और उत्तर प्रदेश घूमने के बाद मध्यप्रदेश में सक्रिय हो गई हैं। भाजपा की राजनीतिक परिस्थिति जो इस समय है वह भी उमा भारती के लिए संभावनाओं को दिखा रही है। यही कारण है कि उनके भोपाल के श्यामला स्थित बंगले पर इस समय सुबह से शाम तक मिलने वालों का सिलसिला चलता रहता है।

कुल मिलाकर जैसे जहाज का पंछी बार-बार लौटकर जहाज पर ही आता है वैसे ही मध्य प्रदेश के क्षत्रप नेता भी इस समय लौटकर मध्यप्रदेश में ही अपना भविष्य उज्जवल देख रहे हैं क्योंकि उन्हें अपना महत्त्व बनाए रखने के लिए मध्य प्रदेश से जो मदद मिल सकती है वह किसी अन्य राज्य से नहीं।

 

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