• [EDITED BY : Editorial Team] PUBLISH DATE: ; 07 August, 2019 07:49 AM | Total Read Count 167
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‘न्यू कश्मीर’ न्यू इंडिया की ‘नींव’ तो  कांग्रेस कब बदलेगी..!

राकेश अग्निहोत्री

जम्मू कश्मीर पुनर्गठन बिल संसद में पास होने के साथ प्रधानमंत्री ने न्यू कश्मीर ही नही अपने मिशन न्यू इंडिया की  नींव सही मायने में शायद अब रख दी... 70 साल पुरानी  कश्मीर समस्या  के स्थाई समाधान के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना  भले ही फिलहाल जल्दबाजी माना जाए..  लेकिन हिंदुस्तान के मणि मुकुट कश्मीर के कायाकल्प का  खाका जरूर  मोदी और शाह ने  तैयार कर लिया है .. देश की आन शान से जुड़े  इस मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों के बीच  सहमति नहीं बन पाई..  तो संकट  भरोसे   का प्रमुख विपक्षी दल कॉन्ग्रेस के अंदर गहराता जा रहा है.. जो भी हो  जोखिम मोल लेकर  बड़े फैसले लेने के साथ दृढ़ इच्छाशक्ति  का परिचय  मोदी ने दे दिया है.. जिसे संवैधानिक तौर पर अंजाम तक पहुंचाने का काम गृहमंत्री अमित शाह ने बखूबी कर दिखाया ..वह बात और है कि चुनौतियां अभी भी बरकरार चाहे फिर वह  हिंदुस्तान की जनता की नब्ज पर हाथ रखने के बावजूद कश्मीर के आवाम का भरोसा जीतना ही क्यों ना हो.. जो फिलहाल सुरक्षाबलों के घेरे में है.. मोदी सरकार हो या फिर भाजपा और पर्दे के पीछे संघ ने अपने एजेंडे को लागू कर न्यू इंडिया का संदेश  दिया तो सवाल खड़ा होना लाजमी है संसद में इस बहस के दौरान निशाने पर रही कांग्रेस आखिर कब कैसे खुद को बदलेगी .... बदलती सियासत में जो अपनी उपयोगिता और दूरदर्शिता साबित कब कैसे करेगी.. यह सवाल इसलिए क्योंकि राहुल गांधी लोकसभा चुनाव के हार की जिम्मेदारी स्वीकार कर पार्टी का नेतृत्व अपनी ओर से छोड़ चुके.. तो विकल्प की तलाश को लेकर 10 अगस्त को सीडब्ल्यूसी की महत्वपूर्ण बैठक में नए नेता के चयन की उम्मीद की जा रही है... तो बड़ा सवाल विपक्ष की राजनीति में भी अलग-थलग पड़ती जा रही कांग्रेस के अंदर से जब सैद्धांतिक और वैचारिक तौर पर चाहे फिर वह कश्मीर मुद्दा ही हो दो धाराएं और अलग-अलग सोच सामने आ रही ...तो इस बदलते न्यू इंडिया हो या फिर न्यू कश्मीर के लिए न्यू कॉन्ग्रेस सामने कब आएगी..

राज्यसभा के बाद लोकसभा में भी जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल वोटिंग के साथ पास होने के बाद बीजेपी खासतौर से मोदी और शाह कोई संदेश देश को नए रोड मैप के साथ देते ..इससे पहले ही कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की मंत्रणा शुरू हो गई.. जिसे 10 अगस्त की वर्किंग कमेटी की बैठक के एजेंडा सेट करने से जोड़कर देखा गया ..तो संसद के अंदर कश्मीर के मुद्दे पर राज्यसभा से लेकर लोकसभा में जिम्मेदार वक्ताओं की सोच उनके  बीच मतभेद और महत्वपूर्ण बना दिया ..क्योंकि राहुल गांधी के ट्वीट से अलग सदन में चर्चा के निर्णायक दौर में सदन के बाहर से पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के ट्वीट ने इस बात को और पुख्ता कर दिया कि कश्मीर पुनर्गठन को लेकर पार्टी के जिम्मेदार नेताओं में तगड़े मतभेद है ..ज्योतिरादित्य की गिनती राहुल गांधी के करीबी नेताओं में होती है जिन्हें पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के दावेदारों में भी गिना जाता है ...यदि सिंधिया ट्वीट कर जम्मू कश्मीर और लद्दाख का पूर्ण विलय और देशभक्ति का समर्थन करते हैं ...तो इससे पहले हरियाणा के दीपेंद्र हुड्डा महाराष्ट्र के मिलन देवड़ा ही नहीं कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव अनुभवी और वरिष्ठ जनार्दन द्विवेदी जैसे नेता के बयान भी यह संदेश दे चुके हैं कि कांग्रेस में सब कुछ अभी भी ठीक-ठाक नहीं है ...चाहे फिर संसद के अंदर जरूरी रणनीति का अभाव के बीच नीतिगत फैसलों की बात हो.. या फिर पुरानी और नई पीढ़ी के बीच समन्वय सामंजस की... राहुल गांधी के इस्तीफे की पेशकश के बाद कांग्रेस के अंदर नए नेतृत्व का जो संकट खड़ा हुआ .. उसमें कश्मीर पुनर्गठन ने इजाफा ही किया है ..भाजपा जब 15 अगस्त तक का एक बड़ा प्लान लेकर जीत के जश्न और आजादी को नए अंदाज में सेलिब्रेट करने की रणनीति बना रही.... तब कांग्रेस का आंतरिक कलह किसी न किसी रूप में रोज सामने आ ही जाता है.. नए अध्यक्ष के चयन को लेकर कश्मीर से ही ताल्लुक रखने वाले कर्ण सिंह का बयान भी गौर करने लायक है ..लेकिन बड़ा सवाल जब मोदी और शाह ने केंद्र में दूसरी बार सरकार बनाकर बिना समय गवाएं संसद के पहले सत्र में ही कश्मीर मुद्दे पर पार्टी घोषणा पत्र की लाइन को आगे बढ़ा दिया है ...तब कांग्रेस का सदन के अंदर या विरोध क्या आने वाले समय में राज्यों से लेकर केंद्र की सियासत में उसकी समस्या में और इजाफा करेगा ...पब्लिक परसेप्शन या फिर पार्टी की इंटरनल पॉलिटिक्स से लेकर हिंदुस्तान का माहौल यदि कांग्रेस नहीं समझ पा रही तो आखिर उसकी वजह क्या है ..क्या पुरानी और नई पीढ़ी के बीच टकरा हट सोच की बढ़ती जा रही है ..या फिर मोदी और शाह के दूरगामी एजेंडे को समझने की समझ कांग्रेस के किसी नेता और चिंतन के पास नहीं रह जाती है ..इस पूरे घटनाक्रम के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मौन रहना और कमान जिस तरह गृह मंत्री अमित शाह ने संभाली उससे सीख कांग्रेस को समय रहते ले लेना चाहिए ..बहस के दौरान सदन के अंदर भाजपा के रणनीतिकारों की बिसात भी गौर करने लायक थी ..कश्मीर के मुद्दे पर जब भी मौका मिला पुराने विवादित मामलों को हवा देकर पूरा फोकस देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू पर बना कर उन्हें सवालों के कटघरे में खड़ा किया गया .. यही नहीं इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी  की  कमियों को सामने रखकर एक ही परिवार पर  चोट भी की गई ..यही नहीं सरदार पटेल को अपने पाले में खड़ा कर बीजेपी ने अपनी उस रणनीति को आगे बढ़ाया कि कांग्रेस के अंदर वैचारिक मतभेद और उभर कर सामने आए जो इस बिल पर नेताओं के ट्वीट और बयान के साथ देखने को भी मिले ..संसद के अंदर भाजपा ने एनडीए के अपने सहयोगी दलों का भी बेहतर इस्तेमाल कर उनसे नेहरू गांधी परिवार को निशाने पर लिया.. लोकसभा में अपना दल हो या फिर लद्दाख कारगिल के युवा सांसद ने पूरे सदन का अपनी ओर ध्यान आकर्षित किया.. तो ऐसे में सवाल कांग्रेस का कायाकल्प कैसे होगा जब न्यू कश्मीर न्यू इंडिया की लाइन को बदलती बीजेपी ने एक नई दिशा दे दी है ..तब न्यू कांग्रेस की अगुवाई कौन करेगा ..क्योंकि सिर्फ यूपीए के सहयोगी सुविधा की सियासत कर कर कांग्रेस से दूरी  नहीं बना रहे ..बल्कि कांग्रेस के अपने सांसद भी इस्तीफा देने लगे हैं.. तो चुनौती नेहरू गांधी इंदिरा की विरासत को बचाने की भी है तो उससे भी बड़ी चुनौती अपने सिद्धांत और विचारधारा को सियासत में जिंदा रखने की.. ऐसे में क्या गारंटी है कि कांग्रेस का नया नेतृत्व पुरानी और नई पीढ़ी के बीच समन्वय बनाकर आगे बढ़ेगा ...क्या गारंटी है कि सीडब्ल्यूसी की बैठक में मतभेद अब देखने को नहीं मिलेंगे ..जब देश के साथ कांग्रेस बड़ी चुनौतियों से गुजर रही तब राहुल गांधी का जिम्मेदारी की आड़ में पद छोड़ देना क्या कार्यकर्ताओं को रास आएगा.. राहुल के इस्तीफे के बाद ऐसा नहीं है कि उनके कई सहयोगियों ने इस्तीफे की पेशकश नहीं की लेकिन जो बात राहुल ने इस्तीफे के साथ अपनी चिट्ठी में लिखी थी ..उस समस्या का समाधान होता नजर नहीं आ रहा.. ऐसे में देखना दिलचस्प होगा जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन की यह नई कवायद कांग्रेस को कौन सा रास्ता दिखाएगी ...जो कर्नाटक की गठबंधन सरकार खो चुकी है ..तो राज्यों की राजनीति में मध्य प्रदेश से लेकर राजस्थान की कांग्रेस सरकार पर भी संकट पूरी तरह से खत्म हो गया हो ऐसा नजर नहीं आता है ...तो बड़ा सवाल यदि राहुल गांधी की जिद के चलते कांग्रेस की कमान प्रियंका सोनिया और खुद राहुल नहीं संभालते हैं ..तो फिर कांग्रेस में एकजुटता कैसे देखने को मिलेगी.. क्योंकि हर राज्य में कांग्रेस के दो गुट आमने-सामने पहले से खड़े हुए तो दिल्ली में पुरानी और नई पीढ़ी के नेताओं के ताजा बयान इस बात पर मुहर लगाते कि नई चुनौतियों के साथ नया संकट का सामना कांग्रेस को नए नेता के चयन के साथ करना ही पड़ेगा...
कांग्रेस को नए सिरे से सोचना होगा कि संसद में यदि बहुमत है तो फिर कुछ नया कर गुजरने की ललक होना चाहिए.. वह भी जनता की नब्ज और उसकी अपेक्षाओं को समझते हुए  समय के साथ कार्यप्रणाली और सोच में बदलाव कितना जरूरी है.. बदलाव पीढ़ी का हो या फिर नई चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ने का.. सिद्धांत व विचारधारा और संकल्प.. सियासत में आखिर कितना मायने रखते राजनीतिक दल को भविष्य की सोच के साथ समन्वय से लेकर समझौते के सारे दरवाजे खोल कर रखना कितना जरूरी है.. अमित शाह की बदलती बीजेपी और न्यू इंडिया की कल्पना को कांग्रेस ने आखिर हल्के में क्यों लिया.. नई पीढ़ी युवा वोटर, ऊर्जावान ,सशक्त युवा नेतृत्व और मजबूत संगठन खड़ा करना यदि वक्त का तकाजा है तो कांग्रेस आखिर अपने आप को बदलने को तैयार कब होगी ..क्या चेहरा बदलने से समस्याएं खत्म हो जाएंगी.. यदि किसी राजनीतिक दल को जनता का समर्थन और निष्ठावान कार्यकर्ता उसके पास मौजूद है.. तभी वह विधानसभा से लेकर संसद में अपनी संख्या गणित को मजबूत कर सकती है.. एक बहुमत वाली सरकार को किस तरह के फैसले लेना चाहिए ..शायद यह कांग्रेस को मोदी सरकार से सीखना ही होंगे.. विपक्ष की भूमिका में यदि कांग्रेस जनता की अपेक्षा और उसकी भावनाओं और सोच को नहीं समझ पाई तो फिर राह भी आसान नहीं होगी.. क्योंकि जन भावनाओं से जुड़ा मुद्दा सिर्फ कश्मीरी नहीं राम मंदिर भी अभी बाकी है तो क्या बहुसंख्यक ओं को नजरअंदाज कर किसी राजनीतिक दल का कायाकल्प असंभव है

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