• [EDITED BY : Mohan Kumar] PUBLISH DATE: ; 12 September, 2019 07:18 PM | Total Read Count 136
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भारत में 2020 तक गंभीर जलसंकट!

नई दिल्ली। भारत में 2020 तक जलसंकट गंभीर रुप धारण कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि देश के अधिकतर शहरों में 2020 तक भूजल खत्म हो जाएगा।  इस खतरे के सिर पर मंडराने के साथ ही विशेषज्ञों ने कहा है कि देश के जलभरों (एक्विफर) के संभरण के लिए एक ही तरह का समाधान जरूरी नहीं कि सभी राज्यों के लिए काम करे। जलविज्ञानियों, भूवैज्ञानिकों और अन्य विशेषज्ञों का मानना है कि बहु आयामी दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक होगा क्योंकि पारंपरिक रूप से सूखे इलाकों में ही नहीं बल्कि धरती के सबसे समृद्ध भूजल जलाशय- गंगा-ब्रह्मपुत्र घाटी के भी सूखा ग्रस्त होने का जोखिम है।

अनुमान दर्शाते हैं कि भारत विश्व की कुल भूमि क्षेत्र के महज दो प्रतिशत से कुछ अधिक मात्र से बना हुआ है लेकिन जनसंख्या के मामले में यह वैश्विक आबादी का 19 प्रतिशत है जिससे अपने नागरिकों को प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध कराने के लिहाज से यह स्पष्ट रूप से दबाव में है।
जून में आई नीति आयोग की एक रिपोर्ट में अनुमान जताया गया कि 21 भारतीय शहरों में 2020 तक भूजल समाप्त हो जाएगा- यह उस देश के लिए काफी निराश करने वाला परिदृश्य है जहां 75 प्रतिशत घरेलू जल क्षेत्र और 80 प्रतिशत खेती के लिए सिंचाई भूजल पर निर्भर है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर में हाइड्रोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर अभिजीत मुखर्जी ने कहा, “भारत उपलब्ध जल संसाधनों से अधिक का इस्तेमाल कर रहा है। शुरुआत में ऐसा सोचा गया कि केवल पांरपरिक रूप से जल अभाव वाले क्षेत्र जैसे पश्चिम भारत और दक्षिण भारत के कुछ हिस्से सूख रहे हैं।” मुखर्जी ने कहा, “हालांकि पिछली कुछ गर्मियों में जल संबंधी अभूतपूर्व चिंताएं पूर्वी भारत के मानचित्र पर भी उभरने लगी हैं, जिन्हें ऐतहासिक रूप से जल समृद्ध माना जाता रहा है और जहां विश्व की सबसे बड़ी भूजल घाटियां मौजूद हैं।” उन्होंने कहा कि भूजल को दूषित करने वाले प्राकृतिक पदार्थों की बड़े पैमाने पर मौजूदगी के साथ ही उत्पन्न हो रहे नये तरह के प्रदूषकों, बढ़ती जनसंख्या के कारण भोजन की बढ़ती मांग और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों ने इस समस्या में और इजाफा कर दिया है। 

मुखर्जी ने कहा कि सरकार ने स्थिति का जायजा लिया है और 2024 तक प्रत्येक घर में पाइप से पेयजल पहुंचाने की योजना बनाई है। उन्होंने कहा, “भूजल के कृत्रिम तरीके से पुनर्भरण के राष्ट्रव्यापी प्रयास मनरेगा कार्यक्रम के तहत शुरू किए गए हैं और देश भर में सूखे पड़ चुके जल संचयन ढांचों की समीक्षा की जा रही है।”

मुखर्जी ने कहा कि ये प्रस्ताव अच्छे भाव एवं मशा से लाए गए हैं लेकिन भूजल पुनर्भरण पर लागू होने वाले वैज्ञानिक सिद्धांतों को ध्यान में नहीं रखा गया है। उन्होंने कहा कि भूजल भंडारण कुछ निश्चित कारकों के संतुलन पर निर्भर करता है जिसके वैज्ञानिक मूल्यांकन एवं समझ की जरूरत है।

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