• [EDITED BY : Ashok Prabudh] PUBLISH DATE: ; 08 July, 2019 07:57 PM | Total Read Count 146
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बाधानाशक तथा वैवस्वत सूर्य सप्तमी व्रत

अशोक ‘प्रवृद्ध’ः सूर्य और चन्द्र आकाश में दिखने वाले प्रत्यक्ष देव माने जाते हैं। अन्य देवता अदृश्य रूप से पृथ्वी और स्वर्ग में विचरण करते हैं, परंतु सूर्य को प्रतिदिन प्रत्यक्ष व साक्षात देखा जा सकता है। इस पृथ्वी पर सूर्य जीवन का सबसे बड़ा कारण है। आकाश में दिखने वाले प्रत्यक्ष ईश्वर भगवान सूर्य को प्राचीन काल से ही कई सभ्यताओं तथा धर्मों में पूजनीय, वंदनीय व देवता माना जाता रहा है। इसकी शक्ति और प्रताप के गुणों से वेद, पुराण, उपनिषद, ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक आदि धर्मग्रंथ भरे पड़े हैं। 

वैदिक मतानुसार सूर्य का अर्थ ईश्वर है। वेद में, संस्कृत भाषा में एवं अन्य भाषाओं में एक शब्द के एक से अधिक अर्थ होते हैं। वेदों में ईश्वर को सूर्य, अग्नि, इन्द्र, विष्णु आदि कई नामों से वर्णित किया गया है। वैदिक मतानुसार इन्द्र, वरुण, सूर्य आदि देवता वाचक शब्द सभी परोक्ष के द्योतक हैं, दृश्य के पीछे अदृश्य, सान्त के पीछे अनन्त, अपरा के पीछे परा, दिव्य, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान् के द्योतक हैं । इस बात की पुष्टि वेद के अन्तः साक्ष्य से भी सिद्ध होती है। यजुर्वेद 7-42 का कथन है-

 सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च । अर्थात- सूर्य इस चेतन जगत् एवं जंगम (स्थावर) जगत् की आत्मा है। सूर्य तो स्वयं जड़ है और इस समस्त स्थावर जगत् का एक तुच्छ भाग है। वह जड़ एवं चेतन जगत की आत्मा (चेतन सत्ता) कैसे हो सकता है? नक्षत्र विज्ञान बतलाता है कि सूर्य हमारी आकाश गंगा का एक सामान्य तारा है, जिसमें अरबों तारे हैं। इतना ही नहीं, सारे ब्रह्माण्ड में अरबों ऐसी और इससे भी कई गुना बड़ी आकाश गंगाएँ हैं। इतने विशाल ब्रह्माण्ड की आत्मा एक अधना-सा सूर्य नहीं हो सकता। इससे सुस्पष्ट हो जाता है कि यहाँ सूर्य का अर्थ ईश्वर है। इसके अतिरिक्त हमारे धर्म ग्रन्थों में यह भी कहा गया है कि वे सूर्य, तारे, अग्नि आदि सभी उसी ईश्वर के प्रकाश से प्रकाशित होते हैं – 

तस्यभासा सर्वमिदं विभाति। - कठोपनिषद् 2-2-15

अर्थात्ा्-उस ईश्वर के प्रकाश से यह सब कुछ प्रकाशित हो रहा है। ईश्वर ही ब्रह्माण्ड की आत्मा है, केवल वेद ही नहीं कहता, अन्य सभी धर्म भी ऐसा ही मानते हैं, बड़े-बड़े दार्शनिक एवं वैज्ञानिक भी ऐसा ही मानते हैं। यथा, सूफी शायरों ने कहा है-  हक जाने जहान अस्त व जहान जुमला बदन। – सूफी शायर ईश्वर विश्व की आत्मा है और यह समस्त विश्व उसका शरीर। एलेक्जेंडर पोप ने कहा है-

यह ब्रह्माण्ड एक विशाल पूर्ण-कृति है। प्रकृति जिसका शरीर है और ईश्वर आत्मा। उल्लेखनीय है कि सूर्य शब्द के लाक्षणिक-अर्थ ईश्वर न लेकर रुढ़ि-अर्थ-तारा ले लिया गया है, इसलिए यह भ्रम की स्थिति पैदा हुई है। सूर्य को एक प्राकृतिक शक्ति के रूप में देवता कहा गया है। उल्लेखनीय है कि देव या देवता वह है जो देता है या चमकता है। प्रकृति पदार्थ जो हमें लाभ पहुंचाते हैं या चमकते हैं देवता कहलाते हैं। वे केवल उस ईश्वर की शक्तियों को परिलक्षित करते हैं। तभी वेद में कहा गया है- 

अस्मिन्ा् सर्वेः देवाः एकवृत्तो भवन्ति । अर्थात- सभी देवता (प्राकृतिक शक्तियाँ) उसी ईश्वर में समा जाते हैं।  कुरान शरीफ में भी कहा गया है हे परवर दिगार। ये सूरज, चाँद, सितारे हमारे लिये (तुहारी खिलकत के लिए) तुहारे हुक्म में काम कर रहे हैं। कुदरत की इन निशानियों को देख कर, तुहारी ताकत, हिकमत और कारीगरी का अन्दाजा लगा सकते हैं।

यही यजुर्वेद 33-31 में कहा है - देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्यम्। अर्थात् सूर्य, चन्द्र आदि मानो परमदेव की पताकाएँ (केतवः अर्थात झण्डे, पताका) हैं उसके यश को संसार में फैलाती है और विश्व के लोगों को सूर्य के समान प्रकाशवान् ईश्वर को दर्शाती हैं। यहाँ भी सूर्य का अर्थ ईश्वर है। इसलिए नित्यप्रति ही सूर्य से हमें प्रार्थना करनी चाहिए - 

 हे परमपिता। हमें शक्ति दो कि हम सूर्य और चाँद की भांति निरन्तर अपने कर्त्तव्य एवं परोपकार के कल्याणकारी मार्ग पर चलते रहें। लोक मान्यतानुसार वैवस्वत सूर्यदेव का ही एक नाम है और इसका महत्व रथ सप्तमी के समान है। पौराणिक मान्यतानुसार सप्तमी सूर्य की तिथि है इसलिये अगर वैवस्वत सप्तमी को सूर्यदेव की उपासना किया जाये तो जीवन में अचानक आने वाली सारी मुश्किलें पल भर में समाप्त हो जाती हैं । सूर्य मंत्रों से मंगल ही मंगल हैं और भगवान सूर्य के कई मंत्र हैं लेकिन सूर्यदेव के बीज मंत्र - ऊं ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः को अधिक चमत्कारी माना गया है।

अगर वैवस्वत सप्तमी को सूर्य के बीज मंत्र का जाप किया जाये तो सारी समस्याओं से जल्दी मु्क्ति पाया जा सकता है। लोक मान्यतानुसार अशुभ सूर्य को शुभ बनाने के लिये आपको प्रतिदिन सूर्यदेव को जल का अर्घ्य देना चाहिये। इसके लिए सबसे पहले सूर्यदेव को लाल मिर्च के 6 दाने डालकर जल का अर्घ्य देना चाहिए ।फिर जाप आरंभ करने से पहले, तांबे के बर्तन में शुद्ध जल, लाल चंदन, लाल फूल, गंगाजल, गुड़ डालकर, तांबे के बर्तन को आम के पल्लव और नारियल से ढंक देना चाहिए । इसके बाद सूर्य के बीज मंत्र ऊं ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः का 11 माला जाप करना चाहिए ।

सूर्य के बीज मंत्र के जाप से मनुष्य की सारी मनोकामनायें जल्दी ही पूरी हो जाती हैं । मान्यता है कि अगर प्रत्यक्ष देव सूर्य देव जन्म कुंडली में शुभ स्थान पर न हों, तो जीवन में कई प्रकार की समस्यायें आने लगती हैं। अगर आपके जीवन में अचानक कोई बाधा आ जाती हो या फिर कदम कदम पर असफलता का सामना करना पड़ रहा हो तो समझ लीजिये तो ऐसा सूर्यदेव के अशुभ होने के लक्षण हैं। सूर्य की रोग शमन शक्ति का उल्लेख वेदों, पुराणों और योगशास्त्र आदि में विस्तार से किया गया है।

आरोग्यकारक शरीर को प्राप्त करने के लिए अथवा शरीर को निरोग रखने के लिए सूर्य सप्तमी अथवा भानु सप्तमी के दिन सूर्य की उपासना के अनेकानेक कृत्य कई प्रयोजनों एवं प्रकारों से किए जाते हैं । इस कारण आषाढ़ शुक्ल सप्तमी को विवस्वत सूर्य सप्तमी कहते हैं । इस दिन जो भी व्यक्ति सूर्यदेव की उपासना करता है, वह सदा निरोगी रहता है । माघ शुक्ल पक्ष की सप्तमी को अर्क, अचला सप्तमी, सूर्यरथ सप्तमी, आरोग्य सप्तमी और भानु सप्तमी आदि के विभिन्न नामों से जाना जाता है।

आषाढ़ व माघ मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी के दिन प्रात: सूर्योदय से पूर्व किसी पवित्र नदी अथवा जलाशय में स्नान करके सूर्य को दीपदान करना उत्तम फलदायी माना गया है। प्रात:काल किसी अन्य के जलाशय में स्नान करने से पूर्व स्नान किया जाए तो यह बड़ा ही पुण्यदायी होता है।

वैवस्वत सूर्य से सम्बन्धित कथा मत्स्यपुराण सहित कई पौराणिक ग्रन्थों में प्राप्य हैं। मत्स्य पुराण में उल्ले‍ख है कि सत्यव्रत नामक राजा एक दिन कृतमाला नदी में जल से तर्पण कर रहे थे कि उसी समय उनकी अंजुलि में एक छोटी सी मछली आ गई। सत्यव्रत ने मछली को नदी में डाल दिया तो मछली ने कहा कि इस जल में बड़े जीव-जंतु मुझे खा जाएंगे। यह सुनकर राजा ने मछली को फिर जल से निकाल लिया और अपने कमंडल में रख लिया और आश्रम ले आए। रात भर में ही वह मछली बढ़ गई।

तब राजा ने उसे बड़े मटके में डाल दिया। मटके में भी वह बढ़ गई तो उसे तालाब में डाल दिया। जब वहां भी वह बढने लगी तब अंत में सत्यव्रत ने जान लिया कि यह कोई मामूली मछली नहीं है, जरूर इसमें कुछ बात है, तब उन्होंने उसे ले जाकर समुद्र में डाल दिया। समुद्र में डालते समय मछली ने कहा कि समुद्र में मगर रहते हैं मुझे वहां मत छोड़िए, लेकिन राजा ने हाथ जोड़कर कहा कि आप मुझे कोई मामूली मछली नहीं जान पड़ती है। आपका आकार तो अप्रत्याशित तेजी से बढ़ रहा है। आप अपना परिचय दें कि आप कौन हैं?

तब मछली रूप में भगवान विष्णु ने प्रकट होकर कहा कि आज से सातवें दिन प्रलय के कारण पृथ्वी समुद्र में डूब जाएगी, तब मेरी प्रेरणा से तुम एक बहुत बड़ी नौका बनाओ और जब प्रलय शुरू हो तो तुम सप्त ऋषियों सहित सभी प्राणियों को लेकर उस नौका में बैठ जाना तथा सभी अनाज उसी में रख लेना। अन्य छोटे-बड़े बीज भी रख लेना। नाव पर बैठकर लहराते महासागर में विचरण करना। प्रचंड आंधी के कारण नौका डगमगा जाएगी, तब मैं इसी रूप में आ जाऊंगा।

तब वासुकि नाग द्वारा उस नाव को मेरे सींग में बांध लेना। जब तक ब्रह्मा की रात रहेगी, मैं नाव समुद्र में खींचता रहूंगा। उस समय जो तुम प्रश्न करोगे मैं उत्तर दूंगा। इतना कह मछली गायब हो गई। राजा तपस्या करने लगे। मछली का बताया हुआ समय आ गया। वर्षा होने लगी। समुद्र उमड़ने लगा। तभी राजा ऋषियों, अन्न, बीजों को लेकर नौका में बैठ गए। और फिर भगवानरूपी वही मछली दिखाई दी। उसके सींग में नाव बांध दी गई और मछली से पृथ्वी और जीवों को बचाने की स्तुति करने लगे।

मछलीरूपी विष्णु ने उसे आत्मतत्व का उपदेश दिया। मछलीरूपी विष्णु ने अंत में नौका को हिमालय की चोटी से बांध दिया। नाव में ही बैठे- बैठे प्रलय का अंत हो गया। यही सत्यव्रत वर्तमान में महाकल्प में विवस्वान या वैवस्वत (सूर्य) के पुत्र श्राद्धदेव के नाम से विख्यात हुए, वही वैवस्वत मनु के नाम से भी जाने गए।

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