• [WRITTEN BY : Ashok Prabudh] PUBLISH DATE: ; 13 August, 2019 01:36 PM | Total Read Count 197
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देवाधिदेव महादेव शिव का त्रिशूल

अशोक ‘प्रवृद्ध’

देवाधिदेव महादेव शिव के अस्त्रों में महाविनाशक अस्त्र पाशुपतास्त्र और त्रिशूल प्रमुख है। भारतीय पुरातन ग्रन्थों के अनुसार पाशुपतास्त्र एक अस्त्र का नाम है जो अत्यन्त विध्वंसक है और जिसके प्रहार से बचना अत्यन्त कठिन है। यह अस्त्र शिव, काली और आदि परा शक्ति का हथियार है, जिसे मन, आँख, शब्द से या धनुष से छोड़ा जा सकता है। इस अस्त्र को अपने से कम बली या कम योद्धा पर नहीं छोड़ा जाना चाहिये। पाशुपातास्त्र सम्पूर्ण सृष्टि का विनाश कर सकता है। यह पशुपतिनाथ का अस्त्र है, जिसे उन्होंने ब्रह्माण्ड की सृष्टि से पहले ही घोर तप करके आदि परा शक्ति से प्राप्त किया था। यह ब्रह्मास्त्र द्वारा रोका जा सकता है किन्तु यह विष्णु के किसी अस्त्र को नहीं रोक सकता।

पुरातन ग्रन्थों के अध्ययन से इस सत्य का भी सत्यापन होता है कि पाशुपतास्त्र भगवान शिव का अस्त्र है, जिसे शिव से प्राप्त कर अश्वमेध यज्ञ के समय श्रीराम ने शिव पर ही छोड़ दिया था, और अर्जुन ने महाभारत युद्ध से पहले शिव से प्राप्त किया था।  त्रिशूल के बाद यह सबसे शक्तिशाली शस्त्र है जिसके प्रहार से सारी सृष्टि नष्ट हो सकती है। अर्जुन ने यह अस्त्र का उपयोग इसी कारण नहीं किया था। केवल शिव के अस्त्र या विष्णु का सुदर्शन चक्र ही इसे निष्प्रभाव कर सकते हैं।

पुराणों के अनुसार त्रिशूल के अतिरिक्त, शिव के पास चार शूल वाला एक और परम शक्तिशाली अस्त्र हैं, जिसे पाशुपतास्त्र कहा गया है। मान्यता हैं कि शिव पाशुपतास्त्र से दैत्यों का संहार करते हैं तथा युग के अंत में इससे सृष्टि का विनाश करेंगे । पाशुपतास्त्र एक प्रकार का ब्रह्मशिर अस्त्र हैं ।वस्तुतः ब्रह्मशिर अस्त्र एक प्रकार का ब्रह्मास्त्र है। सभी ब्रह्मास्त्र ब्रह्मा द्वारा निर्मित अति शक्तिशाली और संहारक अस्त्र हैं। ब्रह्मशिर अस्त्र साधारण ब्रह्मास्त्र से चार गुना शक्तिशाली हैं। साधारण ब्रह्मास्त्र की तुलना आधुनिक परमाणु बम तथा ब्रह्मशिर अस्त्र की तुलना हाइड्रोजन बम से की जा सकती हैं। ब्रह्मशिर अस्त्र के सिरे पर ब्रह्मा के चार मुख दिखाई पड़ते हैं, अतः दिखने में यह एक चतुर्शूल भाला अथवा एक तीर हैं। इसे चार प्रकार से चलाया जा सकता हैं- संकल्प से , दृष्टि से , वाणी से और कमान से। शिव के पाशुपतास्त्र (ब्रह्मशिर) में चार शूल हैं।

इतिहासकारों के अनुसार चतुर्शूल शिव की सवारी नंदी बैल के पैर के निशान और शिव के हथियार त्रिशूल का मिश्रण है। 

पाशुपतास्त्र का मेघनाद ने रामायण कालीन राम- रावण युद्ध में इस्तेमाल किया था। मेघनाद अकेले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ब्रह्मदंड अस्त्र, नारायणास्त्र और पाशुपतास्त्र पर विजय प्राप्त की थी।

पुरातन भारतीय शास्त्रों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि पाशुपतास्त्र जब इस्तेमाल किया जाता था तो अपने आस-पास की सभी चीजों को मिटा देता था। जब इसे चलाया जाता था तो कई दैत्य, शैतान, आत्माएं आ जाती थीं और इसे और शक्तिशाली कर देती थीं। इसकी तुलना आज के समय के बायोलॉजिकल बम से की जा सकती है, जिसे एक बार चलाया जाए तो कई वायरस फैल जाते हैं और टारगेट एरिया में मौजूद सभी चीजों को तबाह कर देते हैं। प्लेग, इबोला जैसी वायरस जनित अनेक तरह की बीमारियां फैल जाती हैं। 

पाशुपतास्त्र को भगवान शिव, माता शक्ति और काली ये तीनों देवतायें मन, आंखे, शब्द, या फिर तीर से आवाहित कर सकते हैं । भगवान शिव इसका उपयोग दुनिया के अंत में सब कुछ नष्ट करने के लिए करते हैं। शिव का यह अस्र ब्रम्हास्त्र और ब्रम्हाशिर अस्त्र से भी ज्यादा विध्वंसकारी हैं । शिव स्वयं महाकाल हैं, उनमें इतनी शक्ति व्याप्त है कि कोई उन्हें हरा नहीं सकता। विश्व का सबसे शक्तिशाली अस्त्र पाशुपतास्त्र भी उन्ही के पास है। पशुपति शब्द का अर्थ होता है शिव या वह जो सभी जीवितों का भगवान है।  पाशुपतास्त्र के सामने कोई भी जीवित या मृत चीज टिक नहीं सकती, यहाँ तक ये ब्रह्मा के बनाये अस्त्र ब्रम्हास्र और ब्रम्हाशिर को निगल सकता है। पुराणों के अनुसार  आवाहित अथवा चलाये गये पाशुपतास्र का वर्णन एक पैर, बड़े दात 1000 सिर, 1000 धड़ और 1000 हाथ, 1000 आंखे और 1000 जिह्वाओं के साथ अग्नि की वर्षा करता है। यह अस्त्र तीनों लोकों को एक साथ नष्ट कर सकता था।  

वाल्मीकि रामायण के अनुसार अश्वमेध यज्ञ के समय राजा वीरमनी की रक्षा के लिए आये शिव को श्रीराम द्वारा चलाये गये पाशुपतास्त्र को अपने हृदय में सहना पड़ा था। पाशुपतास्त्र सीधा शिव के हृदय स्थल में समा गया था। महाभारत युद्ध से पहले अर्जुन ने भगवान शिव से इस प्राप्त किया था, शिव ने किरात अवतार लेकर पहले अर्जुन की परीक्षा ली थी, और इसके बाद ही पशुपतास्र अर्जुन को दिया था। पाशुपतास्र देते समय शिव ने अर्जुन से कहा था यह  अस्त्र किसी भी मनुष्य, देवता, देवताओ के राजा, यम, यक्षों के राजा, वरुण किसी के भी पास नहीं है। महाभारत युद्ध के समय कर्ण के साथ भी पाशुपतास्त्र का उल्लेख है । 

इस अस्त्र को योद्धा किसी कम ताकतवर दुश्मन पर चलाये तो यह तीनों लोकों की चल-अचल सभी चीजो को नष्ट कर देगा। महाभारत काल में अर्जुन अकेला मनुष्य था जिसे पाशुपतास्त्र मालूम था। महाभारत में एक और अस्त्र पाशुपत का उल्लेख आता है, जो भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण को पता था, जो भगवान् शिव से सम्बंधित था। शिव पाशुपतास्त्र को आँखों, दिल या शब्दों से भी आवाहित कर सकते थे, परन्तु उन्होंने जो पाशुपतास्त्र अर्जुन को दिया था, वह पाशुपतास्त्र दिव्य तीर और धनुष के रूप में दिया था। कुछ विद्वानों के अनुसार अर्जुन ने इस अस्त्र से जयद्रथ का वध किया था। परन्तु इसके बारे मे विद्वानो मे मतभेद है।  कुछ विद्वान मानते हे कि उस समय सिर्फ इसका उल्लेख किया गया था। उस समय भगवान श्रीकृष्ण ने यह अवश्य कहा था कि अगर तुम्हें पाशुपतास्त्र स्मरण है तो तुम जयद्रथ का निश्चित ही वध करोगे। 

पर इसका उपयोग करने का स्पष्ट उल्लेख महाभारत में नहीं मिलता, और कई विद्वानों के अनुसार जिस अस्त्र का उपयोग अर्जुन ने किया था, वो पाशुपतास्र से बिलकुल मेल नहीं खाता। ऐसा भी कहा जाता है कि रामायण युद्ध के समय रावणपुत्र मेघनाद ने इस अस्त्र का उपयोग लक्ष्मण पर किया था, पर वाल्मीकि रामायण के सांगोपांग अध्ययन से किये हुये अस्त्र का वर्णन रुद्रास्त्र और महेश्वरास्त्र के वर्णन से मेल खाता है।  इसके साथ ही श्रीराम के पास भी पाशुपतास्त्र था। जब ऋषि वशिष्ट और शुक्राचार्य के मध्य युद्ध हुआ था तब शुक्राचार्य द्वारा चलाये पाशुपतास्त्र ने रूशी वशिष्ट के ब्रम्हास्त्र और ब्रम्हाशिर अस्त्र सहित सभी अस्त्रों को नष्ट कर दिया था, और आखिर में वशिष्ट को ब्रम्ह्दंड का उपयोग करना पड़ा था। महाभारत तथा भारवि की काव्यग्रंथ कीरातार्जुनीयम् की कथा में पाण्डु पुत्र अर्जुन और किरात वेशधारी शिव के मध्य लड़ाई की कथा अंकित है, जिसमे किरात वेशधारी शिव को लड़ाई के पश्चात पाशुपतास्त्र देने की बात आई है । भारवि ने तो महाभारत वनपर्व के पाँच अध्यायों से पांडवों के वनवास के समय अमोघ अस्त्र के लिए अर्जुन द्वारा की गई शिव की घोर तपस्या के फलस्वरूप पाशुपतास्त्र प्राप्त करने के प्रसंग को उठाकर उसे अठारह सर्गों के इस महाकाव्य का रूप दे दिया है । 

कथा के अनुसार वनवास के समय भविष्य के युद्ध के लिए पांडवों को शक्ति-संवर्धन करने की व्यास की सलाह पर उनके बताए गए उपाय के अनुसार अर्जुन शस्त्रास्त्र के लिए अपने औरस पिता इंद्र को तप से प्रसन्न करने के लिए एक यक्ष के मार्गदर्शन में हिमालय-स्थित इन्द्रकील पर्वत की ओर चल पड़ते हैं। तपस्या के फलस्वरूप इंद्र अपने वास्तविक रूप में प्रकट होकर अर्जुन को मनोरथ-पूर्ति के लिए शिव की तपस्या करने की सलाह देते हैं। अर्जुन फिर से घोर, निराहार तपस्या में लीन हो जाते हैं। अर्जुन इंद्रकील के लिए एक अजनबी तपस्वी है, और उसके वेश को देख उसे मुनिधर्म-विरोधी समझकर वहाँ के अन्य तपस्वी आतंकितहो शंकर के पास निवेदन के लिये पहुँच जाते हैं।

उसी क्रम में शिव किरातों की स्थानीय जनजाति के सेनापति का वेश धारणकर किरातवेशधारी अपने गणों की सेना लेकर अर्जुन के पास पहुँच जाते हैं। तभी मूक नामक एक दानव अर्जुन की तपस्या को देवताओं का कार्य समझकर, विशाल शूकर का शरीर धारणकर, उसको मारने के लिए झपटता है। शिव और अर्जुन दोनों द्वारा एक साथ चलाए गए एक-जैसे बाण से उस सूअर की इहलीला समाप्त हो जाती है। शिव का बाण तो उसके शरीर को बेधता हुआ धरती में धँस जाता है और अर्जुन जब अपना बाण उसके शरीर से निकालने जाते हैं तो शिव अपने एक गण को भेजकर विवाद खड़ा करा देते हैं। परिणामतः दोनों के बीच युद्ध आरम्भ हो जाता है। अर्जुन गणों की सेना को तो बाण-वर्षा से भागने को मजबूर कर देते हैं पर शिव के साथ हुए युद्ध में परास्त हो जाते हैं। पराजय से हताश अर्जुन किरात-सेनापति के वेश में शिव को पहचानकर समर्पण कर देते हैं, जिससे प्रसन्न होकर शिव प्रकट होते हैं और पाशुपतास्त्र प्रदान कर उसका प्रशिक्षण देते हैं। 

पाशुपतास्त्र के नाम से एक स्तोत्र भी उपलब्ध है। यह स्तोत्र अग्नि पुराण के 322 वें अध्याय में अंकित है। ऐसी मान्यता है कि यह पाशुपतास्त्र स्तोत्र जीवन के हर क्षेत्र में विजय दिलवाता है । इस पाशुपतास्त्र स्तोत्र का मात्र एक बार जप करने पर ही मनुष्य समस्त विघ्नों का नाश कर सकता है। सौ बार जप करने पर समस्त उत्पातों को नष्ट कर सकता है तथा युद्ध आदि में विजय प्राप्त कर सकता है। इस मंत्र का घी और गुग्गल से हवन करने से मनुष्य असाध्य कार्यों को पूर्ण कर सकता है । यह अत्यन्त प्रभावशाली व शीघ्र फलदायी प्रयोग है। यदि मनुष्य इस स्तोत्र का पाठ करता है तो अवश्य लाभ मिलता है । शनिदेव शिव भक्त भी हैं और शिव के शिष्य भी हैं। शनि के गुरु शिव होने के कारण इस अमोघ प्रयोग का प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। यदि किसी साधारण व्यक्ति के भी गुरु की कोई आवभगत करें तो वह कितना प्रसन्न होता है। फिर शनिदेव अपने गुरु की उपासना से क्यों नहीं प्रसन्न होंगे? इस स्तोत्र के पाठ से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और शिव की प्रसन्नता से शनिदेव खुश होकर संबंधित व्यक्ति को अनुकूल फल प्रदान करते हैं।

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