• [EDITED BY : Ashok Prabudh] PUBLISH DATE: ; 12 July, 2019 08:01 PM | Total Read Count 202
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देवशयनी एकादशी का महत्व

अशोक प्रवृद्धः आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। व्यक्ति को अपने चित, इंद्रियों, आहार और व्यवहार पर संयम रखने तथा अर्थ-काम से ऊपर उठकर मोक्ष प्राप्ति और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाली देवशयनी एकादशी को पद्मनाभा, देवउठनी एकादशी, विष्णु-शयनी एकादशी, आषाढ़ी एकादशी तथा हरिशयनी एकादशी भी कहा जाता है। पौराणिक मान्यतानुसार आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के इस दिन से भगवान विष्णु चार मास के लिए बलि के द्वार पर पाताल लोक में निवास करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को लौटते हैं।

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि से ही चौमासे का आरम्भ माना जाता है। इस दिन से भगवान विष्णु चार मास के लिए क्षीरसागर में शयन करते हैं। इसी कारण इस एकादशी को हरिशयनी एकादशी तथा कार्तिक शुक्ल एकादशी को प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं। आषाढ़ की इस एकादशी से देवदिवाली या कार्तिक एकादशी तक के समय को चातुर्मास कहा जाता है। इन चार महीनों में भगवान विष्णु के क्षीरसागर में शयन करने के कारण विवाह आदि संस्कार के कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता। धार्मिक दृष्टि से यह चार मास भगवान विष्णु का निद्रा काल माना जाता है।

इन दिनों में तपस्वी भ्रमण नहीं करते, वे एक ही स्थान पर रहकर तपस्या करते हैं, जिसे चातुर्मास व्रत के नाम से जाना जाता है । इन दिनों केवल ब्रज की यात्रा की जा सकती है, क्योंकि इन चार महीनों में भू-मण्डल अर्थात पृथ्वी के समस्त तीर्थ ब्रज में आकर निवास करते हैं। ब्रह्म वैवर्त पुराण में इस एकादशी का विशेष माहात्म्य अंकित करते हुए कहा गया है कि इस व्रत को करने से प्राणी की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, सभी पाप नष्ट होते हैं तथा भगवान हृषीकेश प्रसन्न होते हैं।

यूँ तो वर्ष के सभी एकादशियों को भगवान विष्णु की पूजा-आराधना की जाती है, परंतु आषाढ़ शुक्ल एकादशी की रात्रि से भगवान का शयन प्रारम्भ होने के कारण उनकी विशेष विधि-विधान से पूजा किये जाने का विधान है। इस दिन उपवास करके भगवान विष्णु की प्रतिमा को आसन पर आसीन कर उनका षोडशोपचार सहित पूजन कर उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म सुशोभित कर उन्हें पीताम्बर, पीत वस्त्रों व पीले दुपट्टे से सजाया जाता है। पंचामृत से स्नान करवाकर, तत्पश्चात् भगवान की धूप, दीप, पुष्प आदि से पूजा कर आरती उतारी जाती है। भगवान को पान (ताम्बूल), सुपारी (पुंगीफल) अर्पित करने के बाद निम्न मन्त्र द्वारा स्तुति की जाती है। सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जमत्सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्व चराचरम्।।

अर्थात- हे जगन्नाथजी! आपके निद्रित हो जाने पर संपूर्ण विश्व निद्रित हो जाता है और आपके जाग जाने पर संपूर्ण विश्व तथा चराचर भी जाग्रत हो जाते हैं। इस प्रकार प्रार्थना करके भगवान विष्णु का पूजन करने के पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं फलाहार में रहकर रात्रि में भगवद्भजन व स्तुति कर भगवान के मंदिर में ही स्वयं सोने से पूर्व भगवान को भी शयन करकर शयन करना चाहिए। इस दिन अनेक परिवारों में महिलाएं पारिवारिक परम्परानुसार देवों को सुलाती हैं।

इन चार महीनों के लिए अपनी रुचि अथवा अभीष्ट के अनुसार नित्य व्यवहार के पदार्थों का त्याग और ग्रहण करना चाहिए। मधुर स्वर के लिए गुड़ का, दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्रादि की प्राप्ति के लिए तेल का, शत्रुनाशादि के लिए कडुवे तेल का, सौभाग्य के लिए मीठे तेल का और स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगों का त्याग करना चाहिए। देह शुद्धि या सुंदरता के लिए परिमित प्रमाण के पंचगव्य का, वंश वृद्धि के लिए नियमित दूध का, कुरुक्षेत्रादि के समान फल मिलने के लिए बर्तन में भोजन करने के बजाय पत्र का तथा सर्वपापक्षयपूर्वक सकल पुण्य फल प्राप्त होने के लिए एकमुक्त, नक्तव्रत, अयाचित भोजन या सर्वथा उपवास करने का व्रत ग्रहण करना चाहिए।

साथ ही चातुर्मासीय व्रतों में कुछ वर्जनाएं भी हैं। जैसे-पलंग पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस, शहद तथा किसी अन्रू का दिया दही-भात आदि का भोजन करना। मूली, परवल एवं बैंगन आदि शाक खाना भी त्याग देना चाहिए। जो श्रद्धालु जन इस एकादशी को पूर्ण विधि-विधानपूर्वक भगवान का पूजन करते और व्रत रखते हैं, वे मोक्ष को प्राप्त करते हैं। कुछ पौराणिक ग्रन्थों में चातुर्मास्य व्रत का आरम्भ आषाढ़ पूर्णिमा अथवा उसके बाद वाले दिन से माना गया है। समस्त मनोकामना पूर्तिकर्ता व्रत हरिशयनी अर्थात देवशयनी एकादशी और उसके महात्म्य के सन्दर्भ में कई पौराणिक कथा प्रचलित है।

एक पौराणिक कथा के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर के द्वारा भगवान श्रीकृष्ण से आषाढ़ शुक्ल एकादशी के नाम, व्रत के करने की विधि तथा पूज्य देवता के सम्बन्ध में पूछे जाने पर श्रीकृष्ण ने कहा कि जिस कथा को ब्रह्माजी ने .नारदजी से कहा था वही कथा सुनाते हुए कहा कि देवशयनी या हरिशयनी एकादशी आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को मनाई जाती है। चूंकि एकादशी व्रत भगवान विष्णु की आराधना का व्रत है, इसलिए देवशयनी व देवउठनी एकादशियों का विशेष महत्व है। कलियुगी जीवों के उद्धार के लिए देवशयनी एकादशी का व्रत सब व्रतों में उत्तम है।

इस व्रत को करने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और जो मनुष्य इस व्रत को नहीं करते वे नरकगामी होते हैं।  इस एकादशी का नाम पद्मा है। कथानुसार प्राचीन काल में एक सत्यवादी व महान प्रतापी सूर्यवंशीय चक्रवर्ती महाराजा मान्धाता हुआ है, जो अपनी प्रजा का पुत्र की भांति पालन किया करता था। उसकी सारी प्रजा धन धान्य से परिपूर्ण व सुखी थी। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुख और आनन्द से रहती थी। उसके राज्य में कभी अकाल नहीं पड़ता था। लेकिन विधि की विडम्बना के अनुसार एक समय उस राजा के राज्य में तीन वर्ष तक वर्षा नहीं हुई और भयंकर अकाल पड़ गया। प्रजा अन्न की कमी के कारण अत्यंत दुखी हो गई।

इस दुर्भिक्ष से चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। धर्म पक्ष के यज्ञ, हवन पिण्डदान, कथा, व्रत आदि सब में कमी हो गई। अन्न के न होने से राज्य में यज्ञादि कार्य भी बंद हो गए। एक दिन प्रजा राजा के पास जाकर कहने लगी कि हे राजा! सारी प्रजा त्राहि-त्राहि पुकार रही है, क्योंकि समस्त विश्व की सृष्टि का कारण वर्षा है। और वर्षा के अभाव से सम्पूर्ण राज्य में सुखा के कारण अकाल पड़ गया है और अकाल से प्रजा तिल- तिल कर मर रही है। इसलिए कोई ऐसा उपाय किया जाये जिससे प्रजा का कष्ट दूर हो।

राजा मांधाता ने प्रजा की दुःख व संतप्ता को समझा और उन्हें समुचित सांत्वना दिया और फिर प्रजा की मांग को देख कष्ट को सहन न करने के कारण, इस कष्ट से मुक्ति पाने का कोई साधन करने के उद्देश्य से कुछ सेना साथ लेकर वन की तरफ चल दिया। वह अनेक ऋषियों के आश्रम में भ्रमण करता हुआ अंत में ब्रह्मा के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचा। वहां राजा ने घोड़े से उतरकर अंगिरा ऋषि को प्रणाम किया। मुनि ने आशीर्वाद देकर कुशलक्षेम के पश्चात राजा से आश्रम में आने का कारण पूछा। राजा ने हाथ जोड़कर विनीत भाव से कहा कि हे भगवन! सब प्रकार से धर्म पालन करने पर भी मेरे राज्य में अकाल पड़ गया है।

.इससे प्रजा अत्यंत दुखी है। शास्त्रों में कहा है कि राजा के पापों के प्रभाव से ही प्रजा को कष्ट होता है। जब मैं धर्मानुसार राज्य करता हूं तो मेरे राज्य में अकाल कैसे पड़ गया? इसके कारण का पता मुझको अभी तक नहीं चल सका। इसीलिए अब मैं आपके समक्ष इस संदेह की निवृत्ति हेतु आया हूं। कृपा कर मेरे इस संदेह को दूर कर प्रजा के कष्ट को दूर करने का कोई उपाय बताइए। इस पर ऋषि ने कहा यह सतयुग सब युगों में श्रेष्ठ व उत्तम है। इसमें धर्म के चारों चरण सम्मिलित हैं अर्थात इस युग में धर्म की सबसे अधिक उन्नति है और इसमें धर्म अपने चारों चरणों में व्याप्त रहता है।

लोग ब्रह्म की उपासना करते हैं और केवल ब्राह्मणों को ही वेद पढ़ने का अधिकार है। ब्राह्मण ही तपस्या करने का अधिकार रख सकते हैं, परंतु आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है। इसी दोष के कारण आपके राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। इसलिए यदि आप प्रजा का भला चाहते हो तो उस शूद्र का वध कर दो। जब तक उसकी जीवन लीला समाप्त नहीं होगी, तब तक यह दुर्भिक्ष शांत नहीं होगी। उस शूद्र तपस्वी को मारने से ही पाप की शांति होगी। इस पर राजा कहने लगा कि महाराज मैं उस निरपराध तपस्या करने वाले शूद्र को किस तरह मार सकता हूं।

आप इस इस दोष से छूटने का कोई दूसरा उपाय बताइए। तब ऋषि कहने लगे कि हे राजन! यदि तुम अन्य उपाय जानना चाहते हो तो सुनो। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पद्मा नाम की एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो। व्रत के प्रभाव से तुम्हारे राज्य में वर्षा होगी और प्रजा सुख प्राप्त करेगी क्योंकि इस एकादशी का व्रत सब सिद्धियों को देने वाला है और समस्त उपद्रवों को नाश करने वाला है। इस एकादशी का व्रत तुम प्रजा, सेवक तथा मंत्रियों सहित करो। मुनि के इस वचन को सुनकर राजा अपने नगर को वापस आया और उसने विधिपूर्वक पद्मा एकादशी का व्रत किया।

उस व्रत के प्रभाव से वर्षा हुई और प्रजा को सुख पहुंचा। अत: इस मास की एकादशी का व्रत सब मनुष्यों को करना चाहिए। यह व्रत इस लोक में भोग और परलोक में मुक्ति को देने वाला है। इस कथा को पढ़ने और सुनने से मनुष्य के समस्त पाप नाश को प्राप्त हो जाते हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी से सम्बन्धित एक मृदुमान्य नामक राक्षस की कथा भी प्रचलित है। मृदुमान्य राक्षस ने भगवान शंकर की उपासना कर उनसे किसी के हाथों भी मृत्यु नहीं आने का वरदान प्राप्त कर लिया था।

वरदान पाकर मृदुमान्य ने सभी देवताओं को जीतने का निश्चय कर किया। तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक गुफ़ा में छिप कर बैठ गए। मृदुमान्य राक्षस उन्हें ढूँढने की कोशिश में लगा रहा। लेकिन वे तीनों उसके हाथ नहीं आ पाए। तीन दिन बाद इन तीन भगवानों की घूँटी हुई साँस से एक देवी उत्पन्न हुई, वही यह एकादशी है जिसने बाद में मृदुमान्य का वध किया। एक अन्य कहानी के अनुसार एक राजा के राज्य में एकादशी के दिन प्रजा, नौकर-चाकर से लेकर पशुओं तक को आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन अन्न नहीं दिया जाता था।

एक दिन दूसरे राज्य का एक व्यक्ति राजा के पास आया और नौकरी देने के लिए कहने लगा। राजा ने हर महीने की हर एकादशी के व्रत की शर्त रखवाते हुए उसे नौकरी पर रख लिया। एकादशी के दिन जब उसे फलाहार दिया गया तो वह व्यक्ति गिड़गिड़ाने लगा कि महाराज! मेरा इससे पेट नहीं भरेगा, मुझे और अन्न चाहिए। राजा ने उसे शर्त की याद दिला दी पर वह नहीं माना। राजाने उसे आटा दाल चावल दे दिए। भोजन पकाने पर उस व्यक्ति ने भगवान को बुलाया –आओ भगवन! भोजन तैयार है भोजन ग्रहण कर लो। भगवान पीताम्बर धारण किए चतुर्भुज रूप में आ पहुँचे तथा प्रेम से उसके साथ भोजन किया। पंद्रह दिन बाद अगली एकादशी को वह राजा से फिर कहने लगा कि महाराज, मुझे दुगुना अन्नादि सामग्री चाहिए। भगवान भी साथ खाना खाते हैं तो मैं भूखा ही रह जाता हूँ।

राजा को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ और वह उसके साथ गया और पेड़ के पीछे छिपकर बैठ गया और देखने लगा। भोजन बनने के बाद वह व्यक्ति भगवान को बुलाता रहा लेकिन भगवान नहीं आए तो अंत में उसने कहा– हे भगवान यदि आप नहीं आए तो मैं नदी में कूदकर प्राण त्याग दूँगा। भगवान नहीं आए तब वह प्राण त्यागने के उद्देश्य से नदी की तरफ बढ़ा। प्राण त्यागने का दृढ़ इरादा देख भगवान प्रकट हुए और साथ बैठकर भोजन करने लगे। खा -पीकर वे उसे अपने विमान में बिठाकर अपने धाम ले गए। यह देख राजा ने सोचा कि व्रत–उपवास से तब तक कोई फायदा नहीं होता, जब तक मन शुद्ध न हो। इससे राजा को ज्ञान प्राप्त हुआ और वह भी अब तन- मन से व्रत–उपवास आदि करने लगा और अंत में स्वर्ग को प्राप्त हुआ।

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