• [POSTED BY : News Desk] PUBLISH DATE: ; 02 September, 2019 12:54 PM | Total Read Count 69
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गणेश चतुर्थी 2019

गणेश चतुर्थी को हर साल पूरे भारत में भगवान गणेश के जन्मदिन के उपलक्ष्य में हिन्दुओं द्वारा मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी का त्यौहार चातुर्मास में आता है। त्यौहार बहुत ही सार्वजनिक तरीके से मनाया जाता है। स्थानीय समुदाय सबसे प्रभावशाली गणेश प्रतिमा और प्रदर्शन करने के लिए एक-दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं। बहुत भीड़-भाड़ वाली सड़कों की अपेक्षा करें, जो भक्तों से भरी हों, और बहुत सारा संगीत। यह त्यौहार भारत के विभिन्न भागों में मनाया जाता है किन्तु महाराष्ट्र में बडी़ धूमधाम से मनाया जाता है। कई प्रमुख जगहों पर भगवान गणेश की बड़ी प्रतिमा स्थापित की जाती है। इस प्रतिमा का नो दिन तक पूजन किया जाता है। बड़ी संख्या में आस पास के लोग दर्शन करने पहुँचते है। नो दिन बाद गाजे बाजे से श्री गणेश प्रतिमा को किसी तालाब इत्यादि जल में विसर्जित किया जाता है।

गणेश चतुर्थी महोत्सव तिथियां

त्योहार अगस्त के अंत या सितंबर की शुरुआत में होता है, जो चंद्रमा के चक्र पर निर्भर करता है। यह भाद्रपद के हिंदू महीने में अमावस्या के बाद चौथे दिन पड़ता है। 2019 में, गणेश चतुर्थी सोमवार, 2 सितंबर को होती है। यह त्योहार 11 दिनों तक रहता है, जिसमें आखिरी दिन अनंत चतुर्दशी का दिन होता है, जो 12 सितंबर, 2019 को होता है।

गणेश चतुर्थी व्रत का महत्व

  • जीवन में सुख एवं शांति के लिए गणेश जी की पूजा की जाती हैं।
  • संतान प्राप्ति के लिए भी महिलायें गणेश चतुर्थी का व्रत करती हैं।
  • बच्चों एवम घर परिवार के सुख के लिए मातायें गणेश जी की उपासना करती हैं।
  • शादी जैसे कार्यों के लिए भी गणेश चतुर्थी का व्रत किया जाता हैं।
  • किसी भी पूजा के पूर्व गणेश जी का पूजन एवम आरती की जाती हैं। तब ही कोई भी पूजा सफल मानी जाती हैं।
  • गणेश चतुर्थी को संकटा चतुर्थी भी कहा जाता हैं। इसे करने से लोगो के संकट दूर होते हैं।

गणेश चतुर्थी कथा

एक बार महादेवजी स्नान करने के लिए भोगावती गए। उनके जाने के पश्चात पार्वती ने अपने तन के मैल से एक पुतला बनाया और उसका नाम 'गणेश' रखा। पार्वती ने उससे कहा- हे पुत्र! तुम एक मुगदल लेकर द्वार पर बैठ जाओ। मैं भीतर जाकर स्नान कर रही हूँ। जब तक मैं स्नान न कर लूं, तब तक तुम किसी भी पुरुष को भीतर मत आने देना। भोगावती में स्नान करने के बाद जब भगवान शिवजी आए तो गणेशजी ने उन्हें द्वार पर रोक लिया। इसे शिवजी ने अपना अपमान समझा और क्रोधित होकर उनका सिर धड़ से अलग करके भीतर चले गए। पार्वती ने उन्हें नाराज देखकर समझा कि भोजन में विलंब होने के कारण महादेवजी नाराज हैं। इसलिए उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर शिवजी को बुलाया। तब दूसरा थाल देखकर तनिक आश्चर्यचकित होकर शिवजी ने पूछा- यह दूसरा थाल किसके लिए हैं? पार्वती जी बोलीं- पुत्र गणेश के लिए हैं, जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है।यह सुनकर शिवजी और अधिक आश्चर्यचकित हुए। तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है? हाँ नाथ! क्या आपने उसे देखा नहीं? देखा तो था, किन्तु मैंने तो अपने रोके जाने पर उसे कोई उद्दण्ड बालक समझकर उसका सिर काट दिया। यह सुनकर पार्वती जी बहुत दुःखी हुईं। वे विलाप करने लगीं। तब पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया। पार्वती जी इस प्रकार पुत्र गणेश को पाकर बहुत प्रसन्न हुई। उन्होंने पति तथा पुत्र को प्रीतिपूर्वक भोजन कराकर बाद में स्वयं भोजन किया। यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुई थी। इसीलिए यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है।

गणेश स्थापना और जानें पूजा विधि

  • गणपति की स्थापना गणेश चतुर्थी के दिन मध्याह्न में की जाती है।
  • गणपति की स्थापना करने से पहले स्नानआदि कर साफ सुथरे कपड़े पहनें। इसके बाद अपने माथे पर तिलक लगाएं और पूर्व दिशा की ओर मुख कर आसन पर बैठ जाएं।
  • इसके बाद गणेश जी की प्रतिमा को किसी लकड़ी के पटरे या गेहूंए मूंगए ज्वार के ऊपर लाल वस्त्र बिछाकर स्थापित करें।
  • गणपति की प्रतिमा के दाएं। बाएं रिद्धि।सिद्धि के प्रतीक स्वरूप एक।एक सुपारी रखें।
  • इसके बाद गणेश जी के सामने बैठ कर दाएं; सीधेद्ध हाथ में अक्षत और गंगाजल लेकर संकल्प करने के लिए कहें कि हम गणपति को इतने दिनों तक अपने घर में स्थापित करके प्रतिदिन विधि विधान से पूजा करेंगे।
  • संकल्प में उतने दिनों का जिक्र करें, जितने दिन आप गणपति को अपने घर में विराजना चाहते हों। जैसे तीन, पांच, सात, नौ या 11 दिन।

पूजा विधि

  • भद्रपद की गणेश चतुर्थी में सर्वप्रथम पचांग में मुहूर्त देख कर गणेश जी की स्थापना की जाती हैं।
  • सबसे पहले एक ईशान कोण में स्वच्छ जगह पर रंगोली डाली जाती हैं, जिसे चौक पुरना कहते हैं।
  • उसके उपर पाटा अथवा चौकी रख कर उस पर लाल अथवा पीला कपड़ा बिछाते हैं।
  • उस कपड़े पर केले के पत्ते को रख कर उस पर मूर्ति की स्थापना की जाती हैं।
  • इसके साथ एक पान पर सवा रूपये रख पूजा की सुपारी रखी जाती हैं।
  • कलश भी रखा जाता हैं एक लोटे पर नारियल को रख कर उस लौटे के मुख कर लाल धागा बांधा जाता हैं। यह कलश पुरे दस दिन तक ऐसे ही रखा जाता हैं। दसवे दिन इस पर रखे नारियल को फोड़ कर प्रशाद खाया जाता हैं।
  • सबसे पहले कलश की पूजा की जाती हैं जिसमे जल, कुमकुम, चावल चढ़ा कर पुष्प अर्पित किये जाते हैं।
  • कलश के बाद गणेश देवता की पूजा की जाती हैं। उन्हें भी जल चढ़ाकर वस्त्र पहनाए जाते हैं फिर कुमकुम एवम चावल चढ़ाकर पुष्प समर्पित किये जाते हैं।
  • गणेश जी को मुख्य रूप से दूबा चढ़ायी जाती हैं।इसके बाद भोग लगाया जाता हैं। गणेश जी को मोदक प्रिय होते हैं।फिर सभी परिवार जनो के साथ आरती की जाती हैं। इसके बाद प्रशाद वितरित किया जाता हैं।

महोत्सव के अंत में गणेश प्रतिमाओं को पानी में क्यों डुबोया जाता है?

हिंदू अपने देवताओं की मूर्तियों, या मूर्तियों की पूजा करते हैं क्योंकि यह उन्हें प्रार्थना करने के लिए एक दृश्य रूप प्रदान करता है। वे यह भी मानते हैं कि ब्रह्मांड परिवर्तन की निरंतर स्थिति में है। रूप अंततः निराकार को दूर कर देता है। हालांकि, ऊर्जा अभी भी बनी हुई है। समुद्र में प्रतिमाओं का विसर्जन, या पानी के अन्य पिंड, और बाद में उनका विनाश इस विश्वास की याद दिलाता है।

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