• [POSTED BY : News Desk] PUBLISH DATE: ; 08 September, 2019 02:53 PM | Total Read Count 31
  • Tweet
विष योग कैसे बनता है।

शनि-चंद्र के कारण बनता है विष योग

कुंडली में चंद्र और शनि एक साथ होते हैं तो विष योग बनता है। यदि चंद्र पर शनि की नजर पड़ रही है, तब भी विष योग का असर रहता है। यह योग अशुभ फल प्रदान करने वाला है। कुंडली के जिस भाव में विष योग बनता है, उससे संबंधित अशुभ फल व्यक्ति को मिलते हैं। इस योग से व्यक्ति का मन अधिकतर दुखी रहता है और वह अकेलापन महसूस करता है।

माता का कारक है चंद्र:-चंद्र माता का कारक ग्रह है, इसीलिए इसकी स्थिति से माता के जुड़ी बातें मालूम हो सकती हैं। विष योग होने से व्यक्ति को माता के स्वास्थ्य के कारण परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इस योग से माता के सुख में कमी आती है। माता और संतान के विचार अलग-अलग होते हैं। इस योग का असर माता की आयु पर भी हो सकता है।

शनि-चंद्र के विष योग के कारण वैवाहिक जीवन में आती हैं परेशानियां-

जब विष योग सप्तम भाव में हो तो व्यक्ति के जीवन में बहुत अधिक मानसिक तनाव बना रहता है। विवाह होने में बाधाएं आती हैं। विवाह हो जाता है तो जीवन साथी से मतभेद रहते हैं। विचार अलग-अलग होने से वाद-विवाद की स्थिति भी बनती है।   सप्तम भाव स्त्री की कुंडली में विष योग होने से पहला विवाह देर से होकर टूटता है, और वह दूसरा विवाह करती है। पुरूष की कुंडली में यह युति विवाह में अधिक विलंब करती है। पत्नी अधिक उम्र की या विधवा होती है। संतान प्राप्ति में बाधा आती है। दांपत्य जीवन में कटुता और विवाद के कारण वैवाहिक सुख नहीं मिलता। साझेदारी के व्यवसाय में घाटा होता है। ससुराल की ओर से कोई सहायता नहीं मिलती। अष्टम भाव दीर्घकालीन शारीरिक कष्ट और गुप्त रोग होते हैं। टांग में चोट अथवा कष्ट होता है। जीवन में कोई विशेष सफलता नहीं मिलती। उम्र लंबी रहती है। अंत समय कष्टकारी होता है। नवम भाव भाग्योदय में रूकावट आती है। कार्यों में विलंब से सफलता मिलती है। यात्रा में हानि होती है। ईश्वर में आस्था कम होती है। कमर व पैर में कष्ट रहता है। जीवन अस्थिर रहता है। भाई-बहन से संबंध अच्छे नहीं रहते। दशम भाव पिता से संबंध अच्छे नहीं रहते। नौकरी में परेशानी तथा व्यवसाय में घाटा होता है। पैतृक संपत्ति मिलने में कठिनाई आती है। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं रहती। वैवाहिक जीवन भी सुखी नहीं रहता। एकादश भाव बुरे दोस्तों का साथ रहता है। किसी भी कार्य में लाभ नहीं मिलता। 1 संतान से सुख नहीं मिलता। जातक का अंतिम समय बुरा गुजरता है। बलवान शनि सुखकारक होता है। द्वादश स्थान जातक निराश रहता है। उसकी बीमारियों के इलाज में अधिक समय लगता है। जातक व्यसनी बनकर धन का नाश करता है। अपने कष्टों के कारण वह कई बार आत्महत्या तक करने की सोचता है। महर्षि पराशर ने दो ग्रहों की एक राशि में युति को सबसे कम बलवान माना है। सबसे बलवान योग ग्रहों के राशि परिवर्तन से बनता है तथा दूसरे नंबर पर ग्रहों का दृष्टि योग होता है।  इनके राशि परिवर्तन अथवा परस्पर दृष्टि संबंध होने पर ‘विष योग’संबंधी प्रबल प्रभाव जातक को प्राप्त होते हैं। इसके अतिरिक्त शनि की तीसरी, सातवीं या दसवीं दृष्टि जिस स्थान पर हो और वहां जन्मकुंडली में चंद्रमा स्थित होने पर ‘विष योग’के समान ही फल जातक को प्राप्त होते हैं।  शनि-चंद्र के विष योग से बचने के उपाय - प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव का अभिषेक करें और धतूरे का फल चढ़ाएं फल चढ़ाते वक्त भगवान से आराधना करते हुए कहा कि जिस तरह पूरे संसार का विष आपने अपने कंठ में धारण कर लिया था मैं अपने जीवन में ग्रहों के कारण आए विष को आपको अर्पित करता हूं।  पूर्णमासी के दिन भगवान शिव शंकर के मंदिर में रूद्राभिषेक करवाने से भी विष योग का प्रभाव कम हो सकता है।.    शनि मंदिर में गुड़, गुड़ से बनी रेवड़ी, तिल के लड्डू आदि का प्रसाद चढ़ाने के पश्चात इसे वितरीत करें, गाय, कुत्ते व कौओं को भी प्रसाद डालें। यह भी विष योग के विषाक्त प्रभावों को कम करने का कारगर उपाय माना जाता है. 

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

Categories