• [WRITTEN BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 26 August, 2019 06:29 AM | Total Read Count 4235
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ट्रंप को नहीं चाहिए चीन!

डोनाल्डो ट्रंप वह कर दे रहे हैं जिसकी कल्पना संभव नहीं थी। वे भूमंडलीकरण के वैश्विक मॉल में अनियंत्रित सांड की तरह चीन की दुकान को तहस-नहस कर डाल रहे हैं। उस नाते डोनाल्ड ट्रंप के लिए तालियों का वक्त है। मगर आज याकि सोमवार के दिन संभव है कि वैश्विक शेयर बाजार और खुद अमेरिका के शेयर बाजार लुढ़के। डोनाल्ड ट्रंप ने चीन से खरीदे जाने वाले सामानों पर शुक्रवार को कस्टम ड्यूटी और बढ़ा दी। साथ में कहा कि अमेरिकी कंपनियों को चीन से अपने कारखाने हटा कर दूसरे देशों में ले जाने चाहिए या अमेरिका में ही उत्पादन करें। यही नहीं उन्होने यह भी कह दिया कि ‘हमें चीन नहीं चाहिए!’ फिर उन्होने अमेरिका के सेंट्रल बैंक याकि फेडरल बैंक के गर्वनर पॉवेल के साथ चीन के राष्ट्रपति शी का जिक्र करते हुए टिवट पर सवाल किया कि मेरा अकेला सवाल है कि कौन बड़ा दुश्मन पॉवेल या चेयरमैन शी? 

ध्यान रहे इससे पहले डोनाल्ड  ट्रंप ने राष्ट्रपति शी को कभी अपना दुश्मन नहीं बताया। उनके प्रति यह कहते हुए सद्भावना बताते रहे कि वे मेरे अच्छे दोस्त है। चीन ज्यादा कमाई करें यह चीनी नेता चाहेगा। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपतियों की गलती थी जो अमेरिकी बाजार में चीन को लुटने दिया। मुनाफा कमाने दिया। व्यापारिक तनाव भले बढ़े लेकिन शी दोस्त रहेंगे।

सो डोनाल्ड ट्रंप चीन के साथ व्यापारिक पंगेबाजी को निर्णायक मोड पर ले आए है। यह मामूली बात नहीं कि दुनिया का चौकीदार राष्ट्रपति, चौकीदार देश अमेरिका कहे कि उस नहीं चाहिए चीन। चीन से यदि पूरा व्यापार या रिश्ता ही खत्म होता हो तो हो जाए। उन्हे परवाह नहीं। तभी अमेरिकी कंपनियों को अपने कल-कारखाने चीन से हटाने का डोनाल्ड ट्रंप का टिवट बहुत गंभीर है। अमेरिका में कंपनियों की प्रतिक्रिया थी कि राष्र् पति कौन होता है यह बताने वाला की वह कहां कारखाना खोले या बंद करें। 

बहुतों ने सोचा यह ट्रंप का बड़बोलापन है। मगर अपनी बात को गंभीर बनाने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप ने शनिवार को फ्रांस में कहा कि अमेरिकी कंपनियों को मजबूर करने का उनके पास पॉवर है। इंटरनेशनल इमरजेंसी इकॉनोमिक पॉवर एक्ट ऑफ 1977 का हवाला देते हुए कहा कि इससे राष्ट्रपति अमेरिकी कंपनियों को देश विशेष छोड़ने का निर्देश दे सकता है। हिसाब से मवाली देशों से नाता न रखने के लिए अमेरिका का यह कानून है। मतलब अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान, सीरिया और उत्तर कोरिया जैसे देशों में अमेरिकी कंपनियों को काम नहीं करने को बाध्य कर सकता है। मगर इस कानून का उपयोग अमेरिका के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार चीन से ड्यूटी और टैरिफ के झगडे में इस्तेमाल हो, इसकी किसी ने कल्पना नहीं की हुई थी। 

फिर इस बात को डोनाल्ड ट्रंप ने किस अंदाज में बताया? तो जाने उनका यह टिवट- उन तमाम फैक न्यूज रिपोर्टरों के लिए जिन्हे यह पता ही नहीं कि चीन जैसों के लिए राष्ट्रपति के अधिकार क्या है? देखो इंटरनेशनल इमरजेंसी इकॉनोमिक पॉवर एक्ट ऑफ 1977 और समझ आया (“Case closed!”) मतलब डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के भीतर, वैश्विक जमात और चीन सबकों मैसेज दिया कि वे अधिकारों के अपने सिंग से दुकान को आगे कैसे और तबाह कर सकते हैं। 

तभी अमेरिका की एपल जैसी तमाम उन नामी कंपनियों की चिंता बढ़ गई होगी जिन्होने चीन में उत्पादन काऱखाने बनाए हुए है। यह भी ध्यान रहे कि चीन के खुद के रवैये और डोनाल्ड ट्रंप की रीति-नीति को समझ कर पहले ही कई अमेरिकी कंपनियां विएतनाम, दक्षिण पूर्व एसियाई देशों में अपना उत्पादन शिफ्ट कर चुकी है। 

अमेरिकी कंपनियां चीन में कारखाने रखें या न रखे, यह हल्ला चीन की जवाबी कार्रवाई पर ट्रंप के भड़कने से है। तीन साल के दबाव के बाद डोनाल्ड ट्रंप उम्मीद में थे कि चीन समर्पण कर देगा। वह सिलसिला खत्म होगा की अमेरिका ड्यूटी बढ़ा रहा है तो चीन भी जवाब में बढ़ाए। पर चीन ने हाल में जब अमेरिका से खरीदे जाने वाले 75 अरब डालर के सामानों (सोयाबीन, अमेरिका में बनी कारों, तेल) पर ड्यूटी बढ़ाई तो डोनाल्ड ट्रंप भड़के। तुरंत अमेरिका द्वारा खरीदे जाने वाले 250 अरब डालर पर ड्यूटी 25 प्रतिशत से 30 प्रतिशत की तो इसके अलावा 300 अरब डालर की खरीदी जाने वाली चीजों पर भी ड्यटी को दस प्रतिशत की बजाय 15 प्रतिशत करने का ऐलान किया। चीन एक सितंबर व 15 दिसंबर से अमेरिकी सामान पर ड्यूटी बढ़ा रहा है। 

बुनियादी बात है कि अमेरिका और ट्रंप को चीनी चीजों, सामान की जरूरत नहीं है। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि साल-दर-साल चीन पर अमेरिका की निर्भरता बढ़ती गई है। अमेरिका खरीदता रहा और चीन बेचता रहा और खरबों डालर के व्यापार असंतुलन ने अमेरिकी आर्थिकी को खोखला बनाया। अमेरिकी कंपनियों ने चीन में फैक्ट्रीयां लगाई। वहा रोजगार बनाए और अमेरिका खोखला होता गया। इसलिए वक्त है कि चीन से सामान खरीदना घटे और अमेरिका में फैक्ट्रीयां लगे। रोजगार बने। अमेरिकी तकनीक, कॉपीराइट, बौद्धिक संपदाओं की चोरी करके चीन ने अपने को वैश्विक फैक्ट्री में जैसे कनवर्ट किया है इसे खत्म तभी किया जा सकता है जब चीन की जरूरत रहे नहीं! 

कई मायनों में डोनाल्ड ट्रंप गलत नहीं हैं। मगर इससे वैश्विक व्यापार में तनाव, झगड़ा, मनमानी और बहुपक्षीय व्यापार समझौतो, उनसे बनी व्यवस्था बरबाद होगी ही। तभी रविवार को फ्रांस में जी-7 के नेताओं की बैठक हुई तो ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, जापान, इटली की तरफ से अमेरिका के ट्रंप को समझाने की कोशिश हुई कि यदि व्यापारी जंग चलती रही तो दुनिया मंदी के चपेटे में होगी। योरोपीय संघ से बाहर होने वाले ब्रिटेन को बोरिस ने ट्रंप से कहा कि इस टैरिफ जंग को रोके। तभी वैश्विक चिंता में ट्रंप के मुंब से जुमला निकल गया कि हां, वे भी दुबारा सोच रहे है।  

पर कुछ नहीं होना है। दुनिया कितनी ही दुबली और चिंता में हो। डोनाल्डं ट्रंप वहीं करेंगे जो चीन को ले कर सोचा हुआ है।  
सवाल है कि डोनाल्ड ट्रंप के वापिस चुनाव में उतरने का वक्त है तो चीन से पंगेबाजी बढ़ाते ही क्यों जा रहे हैं। खास कर तब जब ऐसी रपटे आने लगी हैं कि चीनी सामान के मंहगा होने से उलटे अमेरिकीयों को नुकसान है। दुकानों-मॉल में पहले चीनी सामान सस्ता था तो अब कस्टम ड्यूटी अधिक होने से वह मंहगा मिल रहा है। चीन का सामान तो बिक ही रहा है। चीन ने पिछले ही दिनों दावा किया था कि उसका व्यापार, उसकी आर्थिकी घटी नहीं बढ़ी है तो डोनाल्ड ट्रंप के लिए चुनाव में अमेरिकीयों के बीच जवाब देना मुश्किल होगा। 

अपना मानना है कि चीन झूठे आंक़ड़ों पर दुनिया के सामने आत्मविश्वासी बना हुआ है। डोनाल्ड ट्रंप अब जरूरत चुनावी एजेंडा है। अगले पूरे एक साल डोनाल्ड ट्रंप अपने चुनाव प्रचार में अमेरिकी राष्ट्रवाद को चीन की आर्थिक दादागिरी में गुथ कर हवा देंगे। वे चीन की आर्थिक गुलामी से अमेरिकी आर्थिकी को आजाद करा रहे है। जो अमेरिकी कंपनियां चीन में कारखाने लगाए हुए हंै, उससे धंधा चाहती हैं वे देशद्रोही हैं। मतलब 2016 वाला ट्रंप का इस्लामी आंतकवाद का एजेंडा अमेरिका में आजाद आउट है तो सीमा पार से आने वाले घुसपैठियों, आर्थिक राष्ट्रवाद, खुशहाली, रोजगार, विकास के एजेंडे पर ट्रंप का प्रचार चलेगा। वे चीन को मजा चखाते रहेंगे और वोट पकते जाएंगे। वे प्रचार, नैरेटिव में लोगों को उल्लू बनाने में माहिर हंै। तभी मानना है कि या तो चीन पूरी तरह सरेंडर कर ट्रंप के माफिक व्यापारिक समझैता करें या अमेरीका में हल्ला बनने दे कि अमेरिका को नही चाहिए चीन!

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