• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 02 July, 2019 07:23 AM | Total Read Count 293
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अमेरिका से भारत का झंझट नहीं, पर...

ओसाका में नरेंद्र मोदी-डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात के बाद यह खबर मतलब वाली है कि भारत मिसाइल रक्षा प्रणाली एस-400 के अलावा रूस से एंटी टैंक मिसाइल भी खरीदेगा। इसका अर्थ है कि अमेरिकी विरोध से पार पा लिया गया है। अमेरिका और पश्चिमी योरोपीय देशों में भारत को कोई झंझट नहीं है। कमी अपनी है जो अमेरिका से भारतीय आईटी कर्मियों-छात्रों के वीजा, व्यापार और निवेश में अपने हित हम कायदे से साध नहीं पा रहे है। डोनाल्ड ट्रंप के तीन साल भारतीयों के लिए इस नाते नुकसानदायी रहे है कि वीजा, निर्यात, व्यापार में विशेष दर्जे में भारत घाटे में रहा। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ट्रंप प्रशासन में भारत की ल़ॉबिंग ढीली-ढाली है। पर हिसाब से अब जयशंकर के विदेश मंत्री बनने के बाद वह स्थिति खत्म होनी चाहिए। आखिर उन्हे विदेश सेवा की नौकरी करते वक्त भी अमेरिका मामलों में माहिर और अमेरिका से बेहतर रिश्तों का पक्षधर माना जाता था। 

बावजूद इसके डोनाल्ड ट्रंप की धंधेबाजी, अपनी सनक पर अमल का तथ्य अपनी जगह है। उसी के चलते पिछले तीन सालों के ट्रंप प्रशासन में भारत के नौजवानों का वर्क वीजा लेना मुश्किल हुआ। भारत की आईटी कंपनियों को परेशानी हुई। अमेरिका को बेचे जाने वाले भारतीय सामान पर वहा टैक्स बढ़ा। ट्रंप प्रशासन में भारतीय सरोकार के सभी अमेरिकी पहलूओं पर दिक्कते बढ़ी हैं। रूस और ईरान क्योंकि भारत के परंपरागत दोस्त और हथियार व कच्चे तेल के सप्लायर है तो इस पर भी ट्रंप प्रशासन ने बांहे मरोडी। भारत को लेन-देन बंद करने को कहा।

इसी मकसद में पिछले सप्ताह अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो की दिल्ली यात्रा थी। भारत इस समय शायद अकेला वह देश है जो ईरान से अभी भी बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीद रहा है। अमेरिका उसे बंद कराना चाहता है। इसकी कोशिश में आंक़डा गौरतलब है कि नवंबर 2018 से मई 2019 के बीच भारत ने रोजाना लगभग 1,84,000 बैरल तेल अमेरिका से खरीदा जबकि उससे पहले के पिछले साल की समान अवधि में आंकड़ा 40,000 बैरल प्रतिदिन था। जाहिर है ईरान की जगह अमेरिका तेल देगा, इसे मानते हुए भारत ने ईरान पर निर्भरता घटाई है। लेकिन ट्रंप प्रशासन ईरान से खरीद पूरी तरह खत्म कराना चाहता है। 

ऐसी ही जिद्द भारत को रूस से हथियार खरीदने नहीं देने की भी है। भारत ने एस-400 मिसाईल खरीद का रूस को आर्डर दिया तो भारत पर अमेरिका ने काटसा (Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act) की तलवार लटकाई। मतलब या तो भारत सौदा रद्दे करें नहीं तो अमेरिकी पाबंदी के लिए तैयार रहे। ईरान और रूस के दोनों मामलों में भारत ने ट्रंप प्रशासन को इस बात के लिए मनाने की बहुत कोशिश की है कि इन दोनों देशों से उसके पुराने संबंध है, मजबूरी है तो उसे समझते हुए वाशिंगटन भारत को रियायत दे। 

बहरहाल, अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो और विदेश मंत्री जयशंकर की बातचीत और ओसाका में मोदी-ट्रंप की  बातचीत से कुल मिला कर यह धारणा पुख्ता बनी है कि ट्रंप प्रशासन भारत के रूख की अनदेखी किए रखेगा। व्यापार के झंझट को ले कर भी दोनों नेताओं में यह सहमति हुई है कि दोनों देशों के वाणिज्य मंत्रालय मिल बैठ कर रास्ता निकालेगें। दोनों विदेश मंत्रियों की मुलाकात के बाद बयान सुनने को मिला था कि दोस्तों में मतभेद हुआ करता है। या यह कि भारत अपने हित, अपने पुराने रिश्तों की अनदेखी नहीं कर सकता। भारत की उर्जा जरूरत और चिंता से विदेश मंत्री पॉम्पियो अवगत हैं। पॉम्पियो ने यह कहते हुए हवा भरी कि इस समय सिर्फ दो ही नेता (ट्रंप और मोदी) ऐसे हैं, जो जरूरत पड़ने पर रिस्क लेने से नहीं डरते हैं। आज दुनिया का 60 प्रतिशत समुद्री व्यापार इंडो-पसिफिक से होकर गुजरता है। पिछले कुछ हफ्तों में ईरान ने जापान, नॉर्वे, सऊदी अरब और यूएई से आने वाले तेल के टैंकरों को निशाना बनाया। मतलब ईरान को ठोकना है। 

जो हो, अपन भारत-अमेरिका रिश्तों की मजबूती के तब से पैरोकार है जब सीआईए का हल्ला  हुआ करता था और देश की राजनीति उस पर थिरका करती थी। त्रासद यह है कि अमेरिका के साथ अपने को जोड़ देने के बावजूद भारत ट्रंप प्रशासन को यह समझाने मे फेल है कि भारतीय छात्रों, आईटीकर्मियों का अमेरिका को खुल कर स्वागत करना चाहिए। वह चीन के व्यापार और उसकी मनमानी पर अंकुश लगाएं तो कम से कम उसके साथ भारत को तो न रखें। 

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