• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 09 July, 2019 12:19 AM | Total Read Count 364
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बांग्ला संस्कृति में महिषासुर व रावण!

अपनी राय में ‘मां दुर्गा’ बनाम ‘जय श्रीराम' का मसला पेचीदा है। मगर आज के वक्त के लोकव्यवहार की कसौटी में सरल है। पेचीदा इसलिए क्योंकि यह हिंदुओं के डीएनए का यक्ष प्रश्न भी है। मतलब हम शक्तिवादी है या भक्तिवादी? हमें सृजन और संहारक का तत्वज्ञान भाता है या पालनकर्ता, समर्पण का भाव रूचता है? हम अवतार से कल्याण बूझते हैं या पुरुषार्थ से? योगी हैं या समर्पण के साथ भोगी? एकेश्वरवादी हैं या बहुदेववादी? इन स्थूल, मोटे सवालों का औसत हिंदू आस्थावान के लिए मतलब नहीं है। लेकिन जरा सोचें कि सहस्त्राब्दियों से हमारे धर्म-आध्यात्म में विचार, मनन के साथ संस्कृति और सभ्यता में जितने मतभेद, झगड़े, शास्त्रार्थ हुए और उनसे फिर हम लोगों का जो लोक धर्म व्यवहार बना उसने दिल-दिमाग के मनोविश्व को, अपने डीएनए को कैसे व कितना बदला होगा? क्या इस पर अपना कोई विचारक विचार करता है या यह मानें कि ऐसे विचार की जरूरत नहीं है? 

निःसंदेह मामला विकट है। एक मायने में विचार कर सकना संभव ही नहीं है। हिंदू धर्म-कर्म, संस्कृति-सभ्यता का पिटारा बिन पैंदे का इतना गहरा, उलझा और रहस्यमयी है कि उसमें डूबने की बजाय भला इसी में है कि देखते रहें! वक्त के प्रवाह में बहते रहें! 

बहरहाल, जैसा मैंने पहले लिखा ‘मां दुर्गा’ बनाम ‘जय श्रीराम' शैव बनाम वैष्णव विचार की दो धाराओं की लौकिक-इहलौकिक मान्यताओं में भेद, झगड़े व द्वंद है। शिव परिवार (शिव, पार्वती-दुर्गा, गणेश, हनुमान) की शैव उपासना और विष्णु परिवार (उनके विभिन्न अवतार राम, कृष्ण) की वैष्णव उपासना की मान्यताओं का भेद है।

सो, बेसिक सवाल है कि पश्चिम बंगाल की जिंदगी में ‘मां दुर्गा’ हैं और ‘जय श्रीराम' नहीं तो इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ है बंगाल के लोग शैव हैं। सौम्य और रौद्र, लय और प्रलय, कल्याण और संहार के अधिपति शिव और उनके परिवार की देवी दुर्गा की वहां अधिक आराधना है। क्या इसे विशिष्टता मानें? 

मुझे यह बात नहीं जंचती। इससे बंगाली हिंदू और उसकी संस्कृति की खूबी या उससे विशिष्ट भेद समझ नहीं आता है।  

भला क्यों? इसलिए क्योंकि केदारनाथ हो या रामेश्वरम्, उत्तर-पूर्व के कोलकाता के कालीघाट का काली मंदिर या कामाख्या मंदिर या गुजरात में अंबाजी या सोमनाथ मंदिर, पूरे देश में ही हिंदुओं की धार्मिक-सांस्कृतिक एकता और आराधना-उपासना मोटे तौर पर 12 शैव ज्योतिर्लिंग और दाक्षायनी-पार्वती-देवी दुर्गा के 51 शक्ति पीठों में बंधी हुई है। उस नाते भगवान विष्णु, उनके विभिन्न अवतारों (मत्स्य, राम, परसुराम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि आदि) के वैष्णव मत में भगवत, वासुदेव के जयश्री कृष्ण या जयश्री राम से उपासना का दायरा लौकिक व्यवहार में हमेशा छोटा रहा है। फिर भी जयश्री राम या जयश्री कृष्ण जितने उत्तर प्रदेश या उत्तर भारत में प्रचलित हैं उतने बंगाल और दक्षिण में भी हैं। मतलब काशी, केदारनाथ, देवघर के ज्योतिर्लिंग से ले कर विंध्यवासिनी. अंबाजी के शक्तिपीठ और नवरात्रि का महत्व बंगाल में भी उतना ही है, जितना उत्तर भारत के बाकी प्रदेशों में है। 

सो, महामना अमर्त्य सेन या भाजपा के राजनीतिबाज यदि बंगाल को देवी दुर्गा की पूजा वाला बताएं और भाजपा वाले यदि उसकी जगह जय श्रीराम की मार्केटिंग करें तो वह हिंदू मानस के धर्म-आध्यात्म, कर्म-कांड को जबरदस्ती पालों में बांधना है। 

अपने लिए पहेली वाली बात यह है कि बंगाल में मां दुर्गा की पूजा, महिषासुर याकि राक्षसी जीवों के संहार की उपासना, शक्ति की पूजा के मनोविश्व के बावजूद मध्यकाल या 19वीं सदी के बांग्ला पुनर्जागरण, सुधारों-स्वतंत्रता की चेतना के बीच भी जब बंगाल विभाजन जैसे राजनीतिक फैसले हुए तो हिंदू-बनाम मुस्लिम की ऐतिहासिक गुत्थी पर टैगोर और महर्षि अरविंद जैसे विचारकों के विचार करने के बावजूद बांग्ला मनोविश्व में वे विचार क्यों नहीं पैठे? उस पर लोक व्यवहार क्या हुआ? 

हकीकत है कि 19-20वीं सदी के हिंदू सुधारों में बांग्ला मनीषियों का बड़ा योगदान रहा है लेकिन बावजूद इसके हकीकत है कि जब बंगाल विभाजन, देश विभाजन की नौबत आई तो मुस्लिम लीग, सुहारवर्दी के डायरेक्ट एक्शन के आगे बांग्ला मानुष निरूत्तर था। वह समर्पण या नियतिवादी रूख लिए हुए था। भला क्यों? शक्ति उपासक, मां दुर्गा की पूजा करने वाला बांग्लाजन इतना भद्र कैसे हुआ जिसने सब कुछ बरदाश्त किया और बंगाल सांप्रदायिक हिंसा की नबंर एक प्रयोगशाला बना! 

बात सांप्रदायिक हो रही है लेकिन जान लें कि बंगाल पूरे देश का वह हिस्सा है, जहां सबसे पहले धर्म के आधार पर 1905 में बंग भंग का प्रयोग हुआ और फिर 1947 से पहले भी सर्वाधिक सांप्रदायिक हिंसा सुहारवर्दी के डायरेक्ट एक्शन में ही हुई थी। 

अब तात्कालिकता पर याकि आज के वक्त पर विचार हो। अपना मानना है कि आज शक्ति पूजा के बंगाल के घर-घर में जयश्री राम का नारा इसलिए हिट हुआ है या होगा क्योंकि वहां लोक व्यवहार में मुसलमान से जो अनुभव है वह अयोध्या का मंदिर-मस्जिद झगड़ा और जयश्री राम को अपने आप दिल-दिमाग में पैठा ले रहा है। अमर्त्य सेन का यह सोचना ठीक है कि 'जय श्रीराम' का इस्तेमाल 'लोगों को पीटने के बहाने' के तौर पर हो रहा है। और भले वे मानें कि बंगाली संस्कृति से (अपना मानना है कि ऐसा भेद करना भी फालतू है) 'जय श्रीराम' का लोक अभिवादन, आव्हान नहीं जुड़ा है लेकिन फिर जरा यह भी सोचें कि बंगाली राजनीति-संस्कृति से भाजपा कब जुड़ी रही? कभी कल्पना ही नहीं थी कि बंगाल में भाजपा का कमल खिलेगा। पर यदि वह खिला है तो यह मान लेना चाहिए कि वह आगे और वहां सर्वत्र इसलिए खिलेगा क्योंकि शक्ति पूजा में महिषासुर कथा बंगाल में ही सर्वाधिक प्रचलित है। लोक व्यवहार में जब अनुभव घाव बनाए हुए होता है तो महिषासुर और रावण में फर्क नहीं रह जाता। फिर भले भक्त शैव हो या वैष्णव। तभी अपना आग्रह है कि पहले वहा की जमीनी हकीकत को अमर्त्य सेन और सेकुलर महामना समझने की कोशिश करें। 

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