• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 11 July, 2019 12:00 AM | Total Read Count 440
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हिंदू मन, चाहना और हूक

हिंदू की आत्मा, हिंदू का विचार शिव, कृष्ण और राम हैं। जैसा डॉ. राममनोहर लोहिया ने लिखा है कि ‘भारतीय आत्मा के इतिहास के लिए ये तीन नाम सबसे सच्चे हैं और पूरे कारवां में महानतम हैं..जैसे पत्थरों और धातुओं पर इतिहास लिखा मिलता है वैसे ही इनकी कहानियां लोगों के दिमागों पर अंकित हैं, जो मिटाई नहीं जा सकती।’ डा लोहिया के लेख का शीर्षक ‘राम, कृष्ण, शिव’ है। मतलब राम प्रथम! हिंदू की पूर्णता के तीन महान स्वप्न में डॉ. लोहिया ने राम को पहले लिया तो उसकी वजह अपने हिसाब से इतिहासजन्य अनुभव, इतिहास की ग्रंथियों में राम से निकला हिंदू राजनीतिक दर्शन है। हिंदू यदि राम नाम से मोक्ष बूझता है तो राम से इहलोक की राज्य व्यवस्था वाला रामराज्य भी चाहता है! जाहिर है राम की पूर्णता में गुंथी एक बात अल्टीमेट शासन व्यवस्था व राजनीतिक दर्शन है। मतलब राम से हम राज, शासन व्यवस्था बूझते हैं, न कि शिव या कृष्ण से। बकौल डॉ. लोहिया ‘धर्म और राजनीति, ईश्वर और राष्ट्र या कौम हर जमाने में और हर जगह मिल कर चलते हैं। हिंदुस्तान में यह अधिक होता है।’ 

अब ऐसा है तो पूरे भारत में, हिंदुओं में मानवीय जीवन जीते हुए मर्यादा व राज व्यवस्था के सर्वोच्च पुरूष, नायक, लीडर के रूप में राम हिंदू अवचेतन में एक और अकेले ही हैं। अयोध्या, अयोध्या के राजपरिवार, राजा दशरथ के बेटे राम और उनके रामराज्य की कथा हिंदू दिमाग का यदि इतिहास है न कि सम्राट अशोक व चंद्रगुप्त मौर्य की दास्ता तो जाहिर है हिंदू अवचेतन में राम स्थायी हैं। मार्क्सवादी जुमले में कहें तो हिंदू जन्मना ही राम की अफीम लिए होता है।   

अब इस मोड़ पर बहस है कि राम की हकीकत के बावजूद राम शब्द का दुरूपयोग गलत है। तब राम का फलां मतलब था अब फलां मतलब है। संघ और भाजपा ने ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की राजनीति में राम और रामराज्य को हाईजैक किया है। राम का अशोक सिंघल से ले कर रामानंद सागर सबने उपयोग किया। राम को भुनाते हुए उनका तरह-तरह से उपयोग हैं। साईबाबा को भी राम बतला दिया जा रहा है तो राम-रहीम का नाम गढ़ बाबा लोग भी अपनी मार्केटिंग कर रहे हैं।

पर ऐसा तो पहले भी होता रहा है! महात्मा गांधी ने भी राम और रामराज्य से अपनी राजनीति की। अपना गांधीवाद बनाया। पंडित मालवीय ने, स्वामी करपात्री ने भी राम के नाम पर राजनीति की। 19-20वीं सदी के कई देशी विचारकों ने राम और रामराज्य को समाजवादी, समतावादी, नारीवादी आदि बतला उन्हें आधुनिक वक्त के विचारों में ढाल अपनी डफली बजाई! लेकिन उस सब में हर्ज नहीं है। यह सब अनहोना या सत्यानाशी नहीं है। हर युग अपने वक्त के मुहावरों में अपने शाश्वत महानायक, महादेवता की नई व्याख्या लिए होता है। नया उपयोग लिए हुए होता है। उससे मूल नायक याकि राम मिटते नहीं हैं। वक्त, युग ने 33 करोड़ देवी-देवता बनाए लेकिन त्रिमूर्ति ब्रह्णा-विष्णु-महेश व शिव-कृष्ण-राम का आदि मूल तो नहीं मिटा। क्या यह सत्य नहीं? 

सो, गांधी के राम और हिंदुवादियों के जयश्री राम या कबीर के राम या तुलसीदास के राम से संकट वे लोग बूझते हैं, जो अपनी व्याख्या विशेष की जिद्द लिए हुए होते हैं। अपना मानना था, है और रहेगा कि दो हजार साल और खास कर गुलामी, लूटपाट के बारह सौ साल के जाग्रत इतिहास के अनुभव में हिंदू धर्म की ओर से प्रतिकार और विकल्प दोनों के रूप में दशरथपुत्र राम के मर्यादित, नियंत्रित, शालीन वीरता, वैधानिक अस्तित्व वाले नेतृत्व का जो राजनीतिक दर्शन बनता है वह अपनी स्थायी किवदंती या मॉडल है। तब यह चिंता फालतू है कि गांधी के ‘राम’ और नरेंद्र मोदी के ‘जयश्री राम’ में किससे क्या समझें। 

समझने वाली बात है कि आदि हिंदू के व हजार साल पहले के हिंदू मनोविश्व में अयोध्या (राम-रामराज्य) था तो मध्य काल के भक्ति युग के हिंदुओं के आगे तुलसी और कबीर भी राम की साझा भक्ति लिए हुए भी अलग-अलग व्याख्या करते हुए थे। फिर आधुनिक वक्त आया तो 19-20वीं सदी के गांधी और तमाम हिंदू राजनीतिबाजों ने भी राम और रामराज्य से राजनीतिक ऊर्जा बनवाई। वहीं स्थिति आज भी है। आजादी के बाद नेहरू-पंत के वक्त में अयोध्या में मूर्ति ऱखी जाने और राजीव गांधी के 1989 में अयोध्या क्षेत्र से चुनाव प्रचार शुरू करते हुए रामराज्य लाने की जो बात हुई या आडवाणी ने जो रथयात्रा निकाली और 21वीं सदी में आज जैसे ‘जयश्री राम’ है वह सब हिंदू की राजनीतिक दीनता से बाहर निकलने की अलग-अलग रूपों वाली आम, औसत सियासी चाहना है।  

राम का व्यापक अर्थ हो या संकीर्ण, कबीर अर्थ हो या तुलसी अर्थ, गांधी अर्थ हो या करपात्री अर्थ सबमें चाहना राज्येंद्रिय के विकास की है। इस्लाम और इस्लाम की आक्रामकता की चुनौती में बिखरे धर्म, टूटे मंदिरों और बिखरी हिंदू व्यवस्था की असहायता, दीनता में प्रतिकार और विकल्प में जब राम और रामराज्य अकेला हिंदू सियासी मॉडल है तो भिन्न व्याख्याओं, जरियों, जुमलों की चिंता फिजूल है। 

तभी अपना दो टूक पुराना तर्क है कि हिंदू अंतर्मन, अवचेतन, मनोविश्व को समझना चाहिए। 19-20वीं सदी की मार्क्सवादी, उदारवादी, पश्चिमी विचारधाराओं, जुमलों में हिंदू अंतर्मन को तौलते हुए उसे अपनी इच्छा अनुसार ढालने की कोशिश करना व्यर्थ है। सोचें, राम और रामराज्य पर गांधी से ले कर आजाद भारत के तमाम वामपंथी, प्रगतिशील इतिहासकार, लेखक कितनी तरह के उपायों, तरीको, व्याख्याओं से हिंदुओं को अपनी चाहना वाला सेकुलर, प्रगतिशील बनाने की कोशिश करते रहे। मतलब मनुष्य की आस्थाओं के डीएनए को मिटाने की कितनी तरह की वैचारिक कोशिश हुई लेकिन अंत नतीजा भारत और दुनिया के बाकी धर्मों में क्या है? 

भारत के संदर्भ में आज यह अकल्पनीय बात है कि बोलो जयश्री राम नहीं तो पिटाई होगी! यह एक्स्ट्रीम है पर अस्वभाविक नहीं। इसलिए क्योंकि यह नारा आस्था के बीच इतिहासजन्य ग्रंथी की हूक में निकला हुआ है। यहा जाने कि आस्था व हूक का फर्क है। पर आस्था व हूक साथ-साथ अंतर्मन में उपस्थित हो सकती है। शायद तभी शैव परिवार व शक्ति पूजक बंगाल में भी जयश्री राम का हुंकारा राजनीतिक परिणाम लिए हुए है। मतलब भारत की राजनीति में इस समय आस्था और हूक दोनों का मेल जबरदस्त है। इस हूंक से क्या कुछ बन सकता है? इस पर कल।  

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