• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 06 August, 2019 07:03 AM | Total Read Count 804
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अमित शाह का लम्हा और भारत

पहली बात, अमित शाह सच्चे नेता प्रमाणित हुए। यह वाक्य वह सच्चाई लिए हुए है, जिसकी भारत राष्ट्र-राज्य को सर्वाधिक जरूरत है। आप जिस विचार, जिस साधना, जिस लक्ष्य में जीवन जीते हैं उसमें मौका मिलते ही जो अपने आपको झोंकता है वहीं सच्चा होता है। सरदार पटेल को मौका मिला तो राजे-रजवाड़ों के घर-घर जा कर भारत राष्ट्र-राज्य की शक्ल बनाई। नतीजतन वे भारत के इतिहास पुरूष बने। यों प्रधानमंत्री तब नेहरू थे बावजूद इसके आजाद भारत के चेतन-अवचेतन इतिहास में सरदार पटेल लोक स्मृति में अमिट बने तो इसलिए क्योंकि सचमुच उनके संकल्प में भारत का आकार बना। संकल्प से सिद्धि का वैसा ही इतिहास पांच अगस्त 2019 को अमित शाह के नाम लिख गया है। भारत राष्ट्र-राज्य अमित शाह को अब कभी नहीं भूलेगा। 

हां, सोमवार को अमित शाह हिंदू राजनीतिक दर्शन, सावरकर और संघ-भाजपा के वैचारिक अनुष्ठान, उसकी सरकारों के प्रयोगों व इतिहास में अटल बिहारी वाजपेयी, नरेंद्र मोदी से भी ऊंचे प्रामाणिक राष्ट्रवादी बने हैं। यों आज के दिन मोदी व शाह की लाइनें खींचना ठीक नहीं है बावजूद यह हकीकत भला कोई कैसे भूलेगा कि मई 2014 में दो विधान, दो निशान को खत्म कराने वाले जनादेश के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का व्यवहार वहीं था जो पंडित नेहरू का था। उन्होंने शपथ के दिन ही नवाज शरीफ को बुला कर गले लगाया। कश्मीरियत, इंसानियत की बातें की और देवालय की जगह शौचालय के एजेंडे में सरकार को झोंका। 

वह स्थिति मई 2019 के जनादेश के बाद बदली तो वजह क्या अमित शाह नहीं हैं? सरकार में गृह मंत्री के मौके से अमित शाह ने अपने आपको जिस स्पष्टता से जैसे झोंका है क्या इससे फिर प्रमाणित नहीं है कि अमित शाह विचार और संकल्प में सच्चे हैं? अमित शाह की इच्छाशक्ति से ही जम्मू-कश्मीर अनुच्छेद 370 के अलगाव से बाहर निकल रहा है।

दूसरी बात, अनुच्छेद 370 की समाप्ति भारत का वह फैसला, वह लम्हा, वह वक्त, वह मोड़ है, जिससे देश-दुनिया को मैसेज है कि भारत राष्ट्र-राज्य में अब एक देश, दो संविधान वाली एप्रोच खत्म। बहुत हुआ वह लिव-इन रिलेशन, जिसमें भावनाओं की कद्र करने, विश्वास में लेने या चिंता में जीने की कोशिश में वे समझौते, वे पत्थर खाते जाते रहे, जिनकी किसी भी दूसरे नेशन-स्टेट में कल्पना संभव नहीं।   

उस नाते आज का लम्हा भारत राष्ट्र-राज्य में नई शुरुआत है। सवाल है यह मोड़ हमें कहां ले जाएगा? इसके परिणाम में लम्हों ने खता की, सदियों ने सज़ा पाई वाले नतीजे होंगे या दो कौमों के रिश्ते य़थार्थ के रसायनों से सह-अस्तित्व की मजबूरी के अभ्यस्त बनेंगे, इसका जवाब वक्त देगा। अमित शाह ने कश्मीर समस्या, इतिहास की हिंदू बनाम मुस्लिम ग्रंथि की अपनी समझ में जो फैसला किया है वह रिश्तों का धुंधला पुनर्निर्धारण है। 72 साल पुरानी एप्रोच सिरे से खारिज है। जम्मू-कश्मीर को वह नया रूप मिलेगा, जिसका असर अखिल भारतीय होगा, कौमों पर होगा तो देश की व्यवस्था, संघीय व्यवस्था आदि पर भी होगा। 

तीसरी बात, अमित शाह ने लोकसभा में बहस का जवाब जिस स्पष्टता, जिस आशावाद से दिया है उससे लगता है कि उन्होंने आगे का रोडमैप बना रखा है। अनुच्छेद 370 से कश्मीर क्यों उलटे आंतक, पिछड़ेपन, भ्रष्टाचार की खाई में गिरा, इस थीसिस की बातें यों पुरानी हैं लेकिन यह अमित शाह और हम सबको पता है कि जम्मू-कश्मीर उस झंडे के झगड़े का नाम है, जिसमें लोगों के जीने की बदहाली का कोई मतलब नहीं है। झंडे का जो जुनून लिए हुए हैं वे इतिहास के हजार साल पुराने बहीखाते में जीते हैं। उन्हें यदि 72 साल के नेहरूवादी तरीके से नहीं समझा सके तो अमित शाह के बीजेपी तरीके से तो समझ सकना संभव ही नहीं है। अपनी पुरानी थीसिस है कि दक्षिण एशिया के चेतन-अवचेतन-उपचेतन की ग्रंथि में हिंदू बनाम मुस्लिम ऱिश्ते जैसे थे वैसे हैं और आगे भी रहेंगे। मतलब नियति के सुपुर्द हैं हम सब। 

सो, चौथी बात, अनुच्छेद 370 के खात्मे से, जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन से 72 साल से चली आ रही ग्रंथियां खत्म नहीं होने वाली हैं। उलटे वे भयावह हो सकती हैं। ध्यान रखे भारत का पिछले सौ सालों का यह इतिहास है कि हिंदू-मुस्लिम रिश्तों के बहीखाते में हमने जितने उपाय किए उसमें हमें निरंतर ढाक के तीन पात वाला अनुभव हुआ। सोचें, 20वीं सदी में हम हिंदुओं ने कितनी तरह की कैसी-कैसी कोशिशें की, जिससे मुसलमानों में भरोसा बने, वे संतुष्ट हों और धर्मांधता को आधुनिक समझदारी के पंख मिलें। इसमें सर्वाधिक पापड़ तिलक, गांधी, नेहरू याकि कांग्रेस ने ही बेले। 1916 में कांग्रेस ने केंद्रीय-प्रांतीय असेंबली में मुसलमानों के लिए अलग सीट आरक्षित करने का समझौता किया या मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट और जिन्ना की चौदह सूत्री मांगों के बीच समझौते की कोशिश भी कांग्रेस ने की। मतलब कांग्रेस ने आजादी से पहले पाकिस्तान नहीं बनने देने की कोशिश में मुस्लिम आशंकाओं को हमदर्दी से समझते हुए सह-अस्तित्व, लिव-इन रिलेशन बनाने की जितनी कोशिश हो सकती थी वह हिंदुओं की तरफ से की। 

कांग्रेस तब वैसे ही हिंदू प्रतिनिधि राष्ट्रवादी पार्टी थी जैसी आज भाजपा है। (इसका अर्थ यह नहीं कि गौपूजक-सनातनधर्मी तिलक, आश्रमी संत गांधी, खांटी राष्ट्रवादी पटेल और विलायती बौद्धिकता प्राप्त नेहरू के आगे मोदी-शाह तुलनीय हैं।) तब के उन सब हिंदुओं ने मुसलमान की आंशकाओं को समझ कर उन्हें आश्वस्त करना चाहा। वह हर संभव कोशिश हुई, जिससे आधुनिक युग में मध्यकाल रिपीट न हो। देश बंटे नहीं। लेकिन मुसलमान नहीं माने। तभी धर्म के आधार पर देश बंटवारा हुआ। मुसलमान को पाकिस्तान मिला तो हिंदुओं को हिंदुस्तान। 

पर फिर बेताल पचीसी वाला हस्र! पाकिस्तान इतिहास की घनीभूत, पूंजीभूत धर्मांधता का इस्लामी किला बना। उसने बनते ही इस्लाम का झंड़ा कबाइलियों को दे कर उन्हें जम्मू-कश्मीर के हिंदू राजा पर कब्जा करने को दौड़ाया। ढाक का वैसा तीन-पात उन गांधी-नेहरू याकि कांग्रेस याकि हिंदुओं के लिए सदमा था, जिन्होंने धर्म आधाऱित दो देशों के सिद्धांत को मानते हुए भी पीछे हट कर धर्मनिरपेक्षता, सेकुलरवाद को इसलिए अपनाया क्योंकि भारत में रह गए मुसलमानों के साथ लिव-इन रिलेशन बनाना था। नेहरू ने कश्मीर के शेख अब्दुल्ला को मनाया। उनका भ्रम था या यह समझ थी कि हम हिंदुओं को लिव-इन रिलेशनशिप में रहना आता है। मां भारती वह भूमि है जो ब्लॉटिंग कागज की तरह मुस्लिम समस्या की बूंदों को कभी न कभी सोख लेगी। 

तभी आजादी के बाद गांधी ने पाकिस्तान, भारत के मुसलमानों के साथ लिव-इन रिलेशन की जिद में कई अनशन किए। 1950 में नेहरू-लियाकत समझौता, नेहरू का 370 का टोटका अपनाना, 1966 का ताशकंद समझौता, 1972 का शिमला समझौता, इंदिरा गांधी-शेख अब्दुल्ला करार, आगरा में वाजपेयी-मुर्शरफ बातचीत सबमें हिंदू लीडरशीप की चाहना, समझ, बुद्धि का एकमेव लक्ष्य था, जैसे भी हो सह-अस्तित्व, सहजीवन, लिव-इन रिलेशन में रिश्ते बने और घुलेमिले। नेहरू ने अपने आइडिया ऑफ इंडिया में अनुच्छेद 370 पर जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ लिव-इन रिलेशन इस उम्मीद में बनाया कि घाटी के अलगाववादी बदलेंगे। वे विलयवादी होंगे। भारत मां का जयकारा लगाएंगे। कश्मीर घाटी के मुसलमानों की भावनाएं शेष भारत के साथ सुर मिलाने लगेंगी। नतीजतन पिछले 72 साल भारत राष्ट्र-राज्य के धारा 370, 35ए जैसे टोटकों में गुजरे।  

वे टोटके अमित शाह ने मिटा दिए। मतलब नेहरूवादी नुस्खा खत्म और भाजपाई नुस्खा प्रारंभ। हिसाब से इस पर न कश्मीर घाटी के मुसलमानों, अलगाववादियों को आपत्ति होनी चाहिए और न भारत के मुसलमानों को या राजनीतिक दलों को। पंडित नेहरू को अपने आइड़िया के लिव इन रिलेशन में अनुच्छेद 370, 35ए की रियायत देने का अधिकार था तो अमित शाह को उन रियायतों को वापिस लेने का अधिकार है। घाटी के मुसलमानों ने रियायतों के बावजूद जब समझदारी नहीं दिखाई, अपनी भावनाओं को मुख्य धारा में नहीं मिलाया, अब्दुल्ला-मेहबूबा मुफ्ती ने अपने को अलग, खास मान कर 370 और 35ए से ही लिव इन रिलेशन में दादागिरी थोपी तो उन टोटकों के खत्म होने का वक्त आना ही था।

तभी सोमवार को राज्यसभा में राजनीतिक दल अनुच्छेद 370 के खत्म होने पर वैसा स्यापा करते नहीं दिखे, जैसी आंशका थी। कांग्रेस की भी आपत्ति जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित दो केंद्र शासित प्रदेश में बांटने पर ज्यादा थी। 

जो हो, लम्हा अमित शाह का! वक्त अमित शाह का। डुगडुगी अमित शाह की। यों राज्यसभा में कुछ वक्ताओं ने उन्हें चेताया कि भयावह बलंडर है। इस लम्हें को याद कर पश्चाताप करेंगे।

मैं नहीं मानता। क्योंकि भारत के इतिहासजन्य बही खाते (हिंदू-मुस्लिम) के कौम, राष्ट्रवादी झंझावतों में नफे-नुकसान की एंट्रियां नहीं होती हैं। यह तो वह बेताल पचीसी है, जिसमें 370 लाओ या हटाओ, पाकिस्तान बनाओ या तोड़ो नियति में प्रेतों का बार-बार लौटना ही है। 

 

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