• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 31 July, 2019 06:01 AM | Total Read Count 444
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पर हम वे मेमने....

क्या गजब लाइन है कि लगे रहो, लगे रहो तब तक जब मेमने, शेर नहीं हो जाते! सवाल है भेड़े और मेमने क्या बन सकते हैं शेर? कल रिडले स्कॉट की 2010 की रॉबिनहुड फिल्म देखते हुए जब वाक्य सुना कि तब तक लगे रहो, उठते रहो, उठते रहो जब तक मेमने शेर नहीं हो जाते! (Rise and rise again until lambs become lions) तो कई मायनों में यह मानव के इतिहास का, सभ्यताओं के विकास का ब्रह्म वाक्य समझ आया! इंसान अपनी आदि मानव (बंदर, चिंपाजी आदि) की तमाम अवस्थाओं, धारणाओं की मेमने की अवस्था से शेर बना है तो सतत बुद्धि के इस मंथन के चलते कि हमें स्वंयभू शेर और राजा बनना है। इसी रॉबिनहुड फिल्म में एक और सीन में ब्रिटेन के राजा से रॉबिनहुड का यह सार संबोधन है कि तुम अपने आपको भगवान का अवतार मानते हो लेकिन हम हैं तभी तुम राजा हो। तुम अपने महल के राजा तो हम अपने घर के राजा। मतलब लोग यदि स्वयंभू अधिकार संपन्न हुए तभी राजा होने की वैधानिकता है। 

राजा याकि शेर के आगे सबके शेर होने का यह मामला पिछले दो हजार सालों में पश्चिमी जिंदादिली के संघर्ष की वह दास्तां है, जिसमें एक इतिहास फ्रांसीसी क्रांति का है तो अमेरिका में हर व्यक्ति को शेर बनवाने वाले लोकतंत्र का भी है। सचमुच सभ्य-विकसित लोकतंत्रों याकि ब्रिटेन, यूरोपीय देशों की यह बुनावट दो टूक है, जिसमें व्यक्ति और व्यक्ति की स्वतंत्रता इस सोच से है कि इसके बिना इंसान, इंसान नहीं, बल्कि मेमना है। 

हम हिंदुओं बनाम बाकी कौमों-सभ्यताओं-धर्मों का यह फर्क है कि उनके पीछे दो हजार साल इसी विचार के संर्घष में खपे हैं कि मेमने जब तक शेर नहीं बन जाते तब तक लगे रहो, उठते रहो, उठते रहो, जबकि हिंदुओं के पिछले दो हजार साल इस मेमनावादी मासूमियत में गुजरे हैं कि जैसे रामजी रखेंगे वैसे रह लेंगे। हमारे भाग्य और हमारी नियति में यदि यहीं लिखा है तो उसी के संतोष में जीना है या जब-जब संकट है तब-तब अवतार है!

निश्चित ही पश्चिमी सभ्यताओं, मध्य एशिया के सभ्यतागत उर्वर भूभाग (यहूदी-मसोपोटोमिया क्षेत्र) में वे सभी अतिवादी प्रयोग हुए, जिनमें मेमना जैसा जीवन भी संभव नहीं था। भारत के हम लोग और हिंदू समाज छुआछूत, जाति व्यवस्था जैसी बातों पर सोच लिए हुए हैं कि हम विश्व की सर्वाधिक क्रूर, शोषित व्यवस्था में जीये जबकि हकीकत उलटी है। दासों की मंडी, दास-गुलामों के बनाए पिरामिड मिस्र में हैं तो ग्रीक-रोम सभ्यता के खंड़हर भी दास-गुलामों की दास्तां बताते हैं। 

बहरहाल, यह भटकना हुआ। पते की बात है कि पिछले दो हजार सालों में पश्चिमी सभ्यता में इंसान संर्घष से उठते-उठते शेर बना है, जबकि हम दो हजार साल पहले बहुत आगे थे। वेद रचे हुए थे, प्रकृति-ज्ञान-बुद्धि के यज्ञ लिए हुए थे लेकिन उसकी मासूमियत में, उसके गुमान में हमें एक ऐसा श्राप मिला, जिससे नियतिवादी, भाग्यवादी बन हमने अपने को भेड़ों के बाड़े में बांध लिया। कोऊ नृप हो हमें का हानी याकि अवतार और गड़ेरियों के हांके जाने में, उसकी लाठी में अपनी सुरक्षा-चैन की जो प्रवृति-निवृति हमारे डीएनए में बनी है उसने मेरा यह यक्ष प्रश्न बनाया है कि मेमने को क्या पता भी होता है कि मेमना होना क्या है और शेर बनने की स्वतंत्रता का क्या अर्थ? 

हां, हिंदू दुनिया का वह जीव है, जिसे भान नहीं है कि जीवन को शेर की तरह जीने का क्या सुख, क्या मतलब है! कैसे दुनिया के विकसित देशों के लोग शेर वाली स्वतंत्रता लिए हुए जीवन जीते हैं? हिंदू के डीएनए में मेमने बनाम शेर के फर्क का बोध ही नहीं है। वह अपने अवतार, अपने राजा, अपने हाकिम, अपने तंत्र, अपने बाड़े, अपने अफसरों, हाकिमों की सर्वज्ञता से उस सुख-चैन में रहता है जो हकीकत में मेमने, भेड़ों की प्रकृति है। हममें उठ, उठ कर शेर बनने की जिद्द ही नहीं है। भला इन भेड़ों को क्या पता कि अमेरिका में, ब्रिटेन में, फ्रांस में नागरिक कैसे शेर होते हैं और गड़रिए कैसे उनके गुलाम व सेवक! राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री (भले डोनाल्ड ट्रंप या बॉरिस ज़ॉनसन हों) वहां शेर नहीं हैं जनता वहां शेर है। वाशिंगटन के एक सामान्य जांचकर्ता-वकील प्रोसिक्यूटर मुलर ने ट्रंप की नींद उड़ाए रखी और उसके खिलाफ राष्ट्रपति होने के कारण मुकदमा चलाने में असमर्थता जाहिर करने के बावजूद यह खम ठोक कहा कि राष्ट्रपति न रहने के बाद उनकी रिपोर्ट के आधार पर ट्रंप के खिलाफ मुकद्दमा संभव है! मतलब राष्ट्रपति के पद, अधिकार का सम्मान है तो उसके खिलाफ विधायिका, अदालत, मीडिया, नागरिक सभी शेर की तरह पीछे भी पड़े हुए हैं। अमेरिका के गोरे भले ट्रंप से अपनी सुरक्षा और सुख-चैन मानते हों लेकिन वे उनके भगवान नहीं हैं। गड़रिए नहीं हैं। गोरों ने ही याकि ट्रंप की टीम के लोगों ने भी ट्रंप को छोड़ा है और उन्हें मूर्ख और तानाशाह बताने वाली शूरवीरता दिखाई है। 

इसलिए क्योंकि वह शेरों का समाज है। ट्रंप शेर हैं तो मीडिया शेर है, न्यायपालिका शेर है, कांग्रेस-संसद शेर है। गवर्नर, उद्योगपति, अफसर, समाजसेवी, बुद्धिजीवी सब शेर हैं। 

ठीक विपरीत मेमनों, भेड़ के समाज की दशा पर गौर करें। गौर करें भेड़ों के बाड़े में विधायिका, न्यायपालिका, मीडिया, अफसर, उद्योगपतियों, एनजीओ, समाजसेवियों आदि सभी वर्गों पर। कहां है शेर वाली निडरता? कहां है शेर दिल बौद्धिक विमर्श और कहां है वह जिंदादिली जिससे जवाबदेही बनती है तो लोकतंत्र भी खिलता है!

हां, मेरे दिमाग का विचार मंथन 23 मई 2019 के उस जनादेश और उसके बाद व्याप्त सुरक्षा-संतोष के उस मनोविश्व पर केंद्रित है, जिसमें इस सवाल के जवाब में तर्क ही नहीं हैं कि हिंदुओं का ऐसा व्यवहार कैसे? निश्चित ही यथा प्रजा तथा राजा और तथा राजा यथा प्रजा के तात्कालिक पहलू अपनी जगह हैं। मगर सनातनी और डीएनएगत एंगल तो यहीं समझ आ रहा है कि मेमने और भेड़ें कतई शेर नहीं बन सकतीं। हम दुनिया के वे मेमने है जिनके दिमाग में हजार साल की गुलामी से शेर होने का मतलब ही मिटा हुआ है। मेमने और ऊपर से गुलामी के हजार साल! तब भला शेर की खाल कितनी ही ओढ़ ले मेमनों को शौषण में ही जीना है। आज ही एक ताजा मिसाल कॉफी डे का ब्रांड बनाने वाले उद्योगपति का आत्महत्या नोट है! 

और हां, यह भी समझ नहीं है कि मेमने कभी गड़रियों और सेना-पुलिस के रक्षा कवच जैसे प्रबंधों के बावजूद दीर्घकाल में सुरक्षित नहीं रहे। मेमना भेड़ की मौत ही मरता है। मेमने यदि पश्चिम में शेर बने और उनका भविष्य बना तो इसलिए क्योंकि बाड़े, गड़रियों और उनकी लाठी के खौफ से बाहर निकलने का लगातार संर्घष याकि विद्रोही तेवर के साथ मेमने उठते-बढ़ते तब तक रहें जब तक वे शेर नहीं हो गए। 

पर उससे पहले का यक्ष प्रश्न यह है कि कैसे अहसास हो मेमनों को कि शेर बनना है। कैसे उनमें शेर होने की जरूरत बने? तभी यह बहुत बाद की बात है कि मेमने उठते रहे, उठते रहे तब तक, जब शेर नहीं हो जाते! फिलहाल तो हम वे मेमने है जिनमें शेर बनने का ख्याल, मतलब ही नहीं है। 

 

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