• [WRITTEN BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 10 September, 2019 08:58 AM | Total Read Count 319
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कूटनीति के मैदान-ए-जंग में भारत-पाक

भारत और पाकिस्तान आमने-सामने तन गए हैं। पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर से जब अनुच्छेद 370 को समाप्त करने का फैसला हुआ, दुनिया तब से गवाह है भारत की इच्छाशक्ति व कश्मीर घाटी में हालातों को नियंत्रित रखने के कठोर बंदोबस्तों की तो पाकिस्तान के स्यापे और गुस्से में धमकियां देने की। एक महीने के अनुभव के बाद फिलहाल भारत और पाकिस्तान दोनों कूटनीतिक मैदान में अपना नैरेटिव बनाने की जंग में उलझे हुए हैं। तभी सितंबर का महीना कूटनीतिक अखाड़े में भारत और पाकिस्तान के बीच जोर-आजमाइश का है। फिर अंत परिणाम अक्टूबर में दोनों देशों की सीमाओं पर सेनाओं के आमने-सामने खड़े होने का भी हो सकता है। हां, अगले बीस दिनों में तमाम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान हल्ला करने वाला है कि वह कश्मीरियों के लिए कुरबान होने जा रहा है। इससे कूटनीति के मैदान में दोनों देशों की जोर-आजमाइश में वैश्विक दर्शकों को सोचना है कि कौन सही है और कौन गलता? जम्मू-कश्मीर भारत का अंदरूनी मामला है या नहीं? भारत कश्मीर घाटी को संभालने, उसके रख-रखाव के लिए कुछ भी करे, उसे इसका हक है या नहीं? 

इसी बात पर सितंबर के महीने भारत और पाकिस्तान के राजदूत, कूटनीतिज्ञ, विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री सभी विभिन्न देशों को पटाने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। इसका अंत सितंबर के आखिर में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में प्रधानमंत्री मोदी और इमरान खान के भाषणों से होगा। उससे पहले संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार परिषद्, अमेरिकी कांग्रेस याकि संसद, यूरोपीय संसद की वे बैठकें भी होनी हैं, जिसमें पाकिस्तानी कूटनीति जम्मू-कश्मीर के मसले को चर्चा में लाने की कोशिश करेगी। पाकिस्तान और उसका प्रोपेगेंडा हर वैश्विक मंच और मीडिया में हल्ला बनवा रहा है कि कश्मीर में ज्यादती हो रही है और वह अपना धैर्य खो कर आर-पार की लड़ाई को मजबूर है। 

तभी भारत के विदेश मंत्रालय और प्रधानमंत्री-विदेश मंत्री की पहली प्राथमिकता है कि दुनिया की हर राजधानी में भारत को ले कर यह पोजिटिव इमेज बने कि जम्मू-कश्मीर सचमुच भारत का अंदरूनी मामला है और वहां भारत का फैसला पाकिस्तान की नापाक हरकतों, आंतकी उकसावे के चलते है। भारत की पाबंदियां हालात पर नियंत्रण के खातिर अस्थायी तौर पर हैं। 

अपुष्ट खबर है कि विदेश मंत्रालय ने 13-15 सितंबर को अपने राजदूतों की सालाना बैठक रद्द कर सभी को कहा है कि वे राजधानियों के अपने दूतावासों से वहां की सरकारों को भारत का पक्ष समझाएं। पाकिस्तान उन सरकारों में, वहां के मीडिया में कोई प्रोपेगेंडा करे तो उसका प्रतिवाद हो। विदेश मंत्री जयशंकर, प्रधानमंत्री और फिलहाल राष्ट्रपति कोविंद की भी तीन देशों की यात्रा में प्राथमिक फोकस पाकिस्तान की कूटनीति को काटना है। अनुच्छेद 370 की समाप्ति के तत्काल बाद विदेश मंत्री ने चीन जा कर बात की तो वहीं प्रधानमंत्री मोदी भी डोनाल्ड  ट्रंप और पुतिन से आमने-सामने की मुलाकात कर चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों या यूरोपीय संघ, इस्लामी देशों के संगठन आदि के सभी प्रभावी देशों से संपर्क हो रहा है। विदेश मंत्री जयशंकर यूरोपीय संघ के मुख्यालय ब्रसेल्स से ले कर हंगरी, पोलैंड और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों की यात्रा कर चुके है ताकि ये देश वैश्विक रायशुमारी में भारत के पक्ष को समझ कर अपनी राय बना सकें। 

संदेह नहीं कि वैश्विक राजधानियों और विश्व नेताओं, जनमत को प्रभावित करने वाला विश्व मीडिया कश्मीर घाटी में पाबंदियों को ले कर बेबाक खबरें दे रहा है, विश्लेषण कर रहा है। अपना मानना है कि भारत में मीडिया को, खबरों को सरकार ने मैनेज करने की जितनी कोशिशें की हुई है उसने वैश्विक मीडिया में आम राय बनवा दी है कि मोदी सरकार झूठ बोलती है। तभी सरकार के कहे पर, भारत के पक्ष पर उनका विश्वास नहीं है। ये अपने स्वतंत्र पत्रकारों, ग्राउंड रिपोर्टिंग से कश्मीर कवर कर रहे हैं। तभी यह आकलन चौंकाता नहीं है कि जम्मू कश्मीर की अंतरराष्ट्रीय कवरेज 80 प्रतिशत क्रिटिकल याकि भारत के प्रति आलोचनात्मक है। द न्यूयार्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट, द व़ॉल स्ट्रीट जरनल, इकोनोमिस्ट, बीबीसी, याकि न्यूयार्क, वाशिंगटन, लंदन जैसे वैश्विक शहरों में कश्मीर के हालातों पर भारत सरकार के कहे का महत्व नहीं है और कश्मीर घाटी में हालातों पर, मानवाधिकारों पर पाबंदियों की आलोचना बहुत मुखर है और बदनामी है। 

सो, संयुक्त राष्ट्र के न्यूयार्क मुख्यालय में सर्वाधिक पढ़ा जाने वाले न्यूयार्क टाइम्स या लंदन, बॉन, ब्रुसेल्स, पेरिस के मीडिया में, चैनलों में कश्मीर घाटी में गंभीर हालातों के चर्चे हैं तो जाहिर है वैश्विक कूटनीतिज्ञ भी इससे प्रभावित हो कर पाकिस्तान के प्रोपेगेंडा में बहेंगे। उस नाते भारत सरकार का, विदेश मंत्रालय के कूटनीतिज्ञों का, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का नई दिल्ली में विदेशी मीडिया के पत्रकारों से मिलना समझदारी है और यह कूटनीतिक अखाड़े की जरूरत का हिस्सा है।     

जाहिर है हर स्तर पर भारत और पाकिस्तान अपना नैरेटिव बनाने की होड़ में हैं। नई दिल्ली में यदि राजदूतों से ग्रुप में मिल कर उनको भारत का पक्ष समझाने की कोशिश है तो इस्लामाबाद में वहां की सरकार भी राजदूतों के बीच, विदेश मीडिया के प्रतिनिधियों के बीच लॉबिंग कर रही होगी। पाकिस्तान ने जैसे चीन की मदद से सुरक्षा परिषद् की बैठक बुलवा कर जम्मू कश्मीर के हालातों पर विचार कराया वैसे इस महीने जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सत्र में विचार मुमकिन है। तभी राष्ट्रपति कोविंद की स्विट्जरलैंड यात्रा का महत्व है। वहां की सरकार ने बताया हुआ है कि दोनों देशों के नेताओं की 13 सितंबर की बैठक के एजेंडे में कश्मीर के हालात और क्षेत्रीय स्थिति पर विचार संभव है। ऐसे ही अमेरिका की संसद की उपसमिति में दक्षिण एशिया में मानवाधिकारों की स्थिति पर बैठक होनी है। लंदन में भारतीय उच्चायुक्त को लेकर, उच्चायोग के बाहर यदि पाकिस्तानी पक्षधर हल्ला बोल जैसे एक्स्ट्रीम पर जा रहे हैं तो वह कुल मिला कर कूटनीति के जंग का हिस्सा है। इस सबका समापन मोटे तौर पर सितंबर के आखिरी सप्ताह में संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में पहले पाकिस्तान और फिर भारत के प्रधानमंत्री के भाषण से होना है। 

पर वह समापन याकि कूटनीति के जंग-ए-मैदान के दांवपेंच कहीं असली जंग का बिगुल न हो, यह लाख टके का सस्पेंस है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और उनके सेना प्रमुख के जैसे जो बयान आ रहे हैं उससे खटका है कि कहीं पूरी कूटनीति आमने-सामने के मुकाबले के लिए दुनिया को तैय़ार कराने के लिए तो नहीं!

 

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