• [EDITED BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 07 August, 2019 06:14 AM | Total Read Count 689
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अनुच्छेद 370 हटाना क्या हत्या?

क्या‍ अनुच्छेद 370 हटाने का पांच अगस्त 2019 का फैसला भारतीय लोकतंत्र के खूनी और धोखेबाज होने की दास्तां है? ऐसा कुछ नेताओं और विद्धानजनों का सोचना है। यह भी दलील है कि इससे कश्मीर का भारतीयकरण नहीं होगा उलटे भारत का कश्मीरीकरण होगा। भारत के लोकतंत्र ने कश्मीरियों के साथ धोखाधड़ी की, संविधान की व्यवस्थाओं का गुंडई अंदाज में दुरूपयोग हुआ और कश्मीर को काट कर बांट दिया। 

पहली दलील लोकतंत्र हुआ खूनी! यों भारत में लोकतंत्र निश्चित ही स्वस्थ नहीं है। अपनी दलील थी और है कि लोकतंत्र के नाम पर भारत वह देश है, जहां संविधान और कानून का कैसे भी उपयोग संभव है। चेक-बैलेंस दिखावे के हैं और उन पर चूजे दिल के लोग बैठे होते हैं तो कानून, संविधान से कुछ भी संभव है। अमित शाह ने ठाना तो पांच मिनट में अनुच्छेद 370 खत्म करने का रास्ता निकल गया। आगे वैधानिकता का ठप्पा भी लगता जाएगा। ऐसे इंदिरा गांधी भी करती थीं। नेहरू भी करते थे। मतलब अमेरिका, ब्रिटेन जैसा कोई मामला नहीं कि वहां राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री संविधान से कुछ करें और उसे खुर्दबीन से जांचा नहीं जाए! वहां लोकतंत्र में सब बंधे व व्यवस्थित होते हैं, जबकि भारत में लाठी से संविधान चलता है।

बावजूद इसके अमेरिका और ब्रिटेन का लोकतंत्र भी नेशन-स्टेट, राष्ट्र-राज्य, राष्ट्रीयता के मामले में वहीं दास्तां लिए हुए है, जैसा अभी अनुच्छेद 370 पर अपने कुछ सुधीजन रोना रो रहे हैं। इन्हें सोचना और बताना चाहिए कि दुनिया में किस लोकतंत्र का इतिहास खून और धोखे का नेपथ्य लिए हुए नहीं है? पूछ सकते है सभी की दास्तां भला ऐसी कैसे है? इसलिए कि अखंडता है तभी राष्ट्र-राज्य है। अमेरिका और ब्रिटेन लोकतंत्र के अनुकरणीय, भव्य प्रतिमान हैं लेकिन अमेरिकी लोकतंत्र भी खून, भयावह गृह युद्व और धोखों से सीचा हुआ है तो ब्रिटेन उत्तरी आयरलैंड, स्कॉटलैंड में दमन, धोखे से लेकर सात सौ साल के गृह युद्ध की खूनी दास्तां लिए हुए है। 

क्या इससे यह रोना बनेगा कि अमेरिका और ब्रिटेन के लोकतंत्र खून व धोखे में रंगे हुए? नहीं, कतई नहीं। राष्ट्र-राज्य की सीमा बनना, सीमाओं से राष्ट्रीयता बनाना वह अनुभव, वह प्रोसेस है, जिसे साम, दाम, दंड, भेद सभी से साधना होता है। फिर दुनिया के तमाम देशों और भारत में एक गहरा बुनियादी फर्क है। हम हिंदू-मुस्लिम ग्रंथि का हजार साला इतिहास लिए हुए हैं। अमेरिका, ब्रिटेन या दुनिया का कोई भी दूसरा लोकतांत्रिक देश हिंदू बनाम मुस्लिम की वैसी ग्रंथि लिए हुए नहीं है, जैसे भारत लिए हुए है। कोई बताए कि दुनिया का ऐसा कौन सा दूसरा इलाका, ऐसे पड़ोसी दो देश हैं, जहां धर्म के सिद्धांत के आधार पर राजी खुशी दो राष्ट्र बने और बनते ही वापस हजार साल पुराने झगड़े के द्वंद में बार-बार युद्ध, लड़ाई का सिलसिला बना! 

सचमुच दुनिया में ऐसा कोई बंटवारा, कोई इलाका नहीं है जो दक्षिण एशिया जैसी तासीर, धर्म, संस्कृति, राष्ट्रीयता के संकट व द्वंद लिए हुए है। तभी न हिंदुस्तान सहज है और न पाकिस्तान। न हिंदू का जीना सहज है और न मुसलमान का! 

छोड़ें आज के परिप्रेक्ष्य याकि मोदी-शाह के वक्त को और विचारें 70-100 साल पहले के गांधी-नेहरू-जिन्ना के वक्त पर। उस समय तमाम नेता विदेश में पढ़े हुए (जिन्ना, लियाकत अली मुस्लिम नेताओं का एलिट वर्ग भी गजब था तो गांधी-नेहरू-पटेल-सावरकर की शिक्षा-दीक्षा भी आधुनिक-विलायती अनुभव लिए हुए थी) बहुत समझदार थे। सहिष्णुता, विविधता, लोकतांत्रिकता के साझा जुमलों, साझा चुल्हों, साझा कविता में इन सब महामनाओं ने अपने साझा राष्ट्र-राज्य की कथा बनानी चाही। लेकिन क्या नतीजा था? भयावह खून खराबा, एक-दूसरे को धोखा और अंत में विभाजन! क्यों? अपना तर्क है कि ये नेता दोषी नहीं थे, बल्कि हजार साल के झगड़े की इतिहास हकीकत के आगे लाचार, मजबूर और नियति में बंधे हुए थे। 

तभी भारत की समस्या, उपमहाद्वीप की समस्या हजार साला वे रिश्ते हैं, जिन्हें इतिहास के कड़ाव में उबलते ही रहना है। उसके नीचे की चिरंतन आग की लकड़ियों को न गांधी, नेहरू बूझा सके और न जिन्ना तो सभ्यताओं के संघर्ष की आज की हवा में तो बूझ सकना संभव ही नहीं है। इतिहास के कड़ाव से ही कश्मीर की समस्या है। तभी कश्मीर को ले कर किसी और राज्य से तुलना या संघीय व्यवस्था के खांचे पर विचार नहीं होना चाहिए। कुछ सुधी लोग सोचते हैं कि कश्मीर में तो जोर जबरदस्ती हुई जबकि नगालैंड, मिजोरम में भारत राष्ट्र-राज्य ने विशेषाधिकार, अनुच्छेद 370 जैसी उदारता बरपाई हुई है। इसलिए कि नगा, मिजो लोग ऐसी किसी ग्रंथि में नहीं थे और न हैं कि हम कभी उनके राजा रहे या हम क्यों उनकी दासता मानें? वह हिंदू-मुस्लिम की इतिहासजन्य ग्रंथी से निरपेक्ष है। नगालैंड को विशेष रियायतें हैं तो नगा यह कसम खाए हुए भी नहीं हैं कि हमें धर्म युद्व लड़ना है। उत्तर-पूर्व में पहचान अनुसार उपराष्ट्रीयता के जरूर आग्रह हैं लेकिन उसमें हजार साल के हिंदू और मुस्लिम काल खंड की लड़ाई वाली जटिलताओं का मनोविश्व लिए हुए नहीं हैं।  

जबकि जम्मू-कश्मीर का सत्व-तत्व क्या है? 1947 के विभाजन के बाद इतिहास की लड़ाई का अगला मुकाम। जो सोचते हैं कि भारत राष्ट्र-राज्य, उसका लोकतंत्र खूनी और धोखेबाज है वे जरा दिल पर हाथ रख कर सोचें कि भारत ने, हम हिंदुओं ने, गांधी-नेहरू-पटेल-कांग्रेस ने मुसलमान का भरोसा बनाने, उन्हें खुश रखने, उन्हें मनाने की कोशिश में क्या कमी रखी? गांधी-नेहरू ने दिल कड़ा कर भारत का विभाजन माना। धर्म के आधार पर दो राष्ट्र के सिद्धांत को मान मुसलमान के लिए पाकिस्तान माना। तब सभी ने, दुनिया ने भी सोचा यह अंतिम विभाजन। इसके बाद झगड़ा खत्म। लेकिन ज्योंहि एक विभाजन हुआ तुरंत कराची में जिन्ना, जम्मू-कश्मीर में शेख अब्दुल्ला, जूनागढ़, भोपाल का नवाब या हैदराबाद के निजाम ने मिशन बना डाला कि आजाद भारत वापिस ऑपरेशन टेबल पर लेटे और सर्जरी माने। हिसाब से तब हिंदू नेताओं की गलती थी, नासमझी थी जो विभाजन के तुरंत बाद उठी विभाजक प्रवृतियों का मतलब नहीं बूझा। बावजूद इसके नेहरू-पटेल ने यह समझदारी तो दिखाई कि1947 का विभाजन अंतिम विभाजन मानते हुए फैसला किया कि जूनागढ़, हैदराबाद, श्रीनगर में सेना भेज कर कब्जा बनाओ!

और भारत की जिद्द यही है कि विभाजन अंतिम और उसके साथ जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। उसे हम चाहे जैसे रखें। उसे अनुच्छेद 370 से संभाले या उसे हटाकर। क्या वह आजाद भारत की खूनी, धोखे वाली दास्तां है? नहीं। हकीकत है कि भारत याकि हिंदुओं ने कभी धोखा नहीं दिया। न नेहरू ने, न इंदिरा गांधी ने और न पांच अगस्त को मोदी-शाह ने। भारत राष्ट्र-राज्य ने वहीं किया जो लोकतांत्रिक देशों के इतिहास में अमेरिका, ब्रिटेन याकि राष्ट्र-राज्य की अवधारणा में कौम, नेतृत्व को अपनी अखंडता में करना चाहिए। पंडित नेहरू भले नेता थे तो उनकी भली एप्रोच थी। इंदिरा गांधी अपने अनुभव में नेहरू काल में राष्ट्र-राज्य के साथ हुए धोखों, कमजोरियों की जानकार थी तो उन्होंने कुछ निर्ममता, कुछ बहादुरी से सिक्किम को मिलाया और बांग्लादेश बनाया! उन्होंने भी अपने वक्त में शेख अब्दुल्ला की कमर तोड़ समझौते के लिए उन्हें मजबूर करने के साथ जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे में से उसके कई प्रतीक खत्म करवाए। याद करें इंदिरा गांधी ने उन राजे-रजवाड़ों के प्रिवीपर्स भी खत्म किए, जिनके विलय से भारत की सीमाएं बनी थीं। कई जानकारों ने उस वक्त कहा कि यह भारत के लोकतंत्र, संविधान के साथ धोखा है। 

क्या धोखा मानेंगे? नहीं। इसलिए कि राष्ट्र-राज्य की गढ़ाई और विकास जटिल फैसलों के अलग-अलग कालखंड लिए होती है। ब्रिटेन कभी ऐसे सोचता ही नहीं है कि उसने आयरलैंड, स्कॉटिश इलाके में जोर जबरदस्ती, रक्तपात किया तो उसका लोकतंत्र पश्चातापी बना रहे! 

ऐसे सोचने वाले कमजोर दिल के, चूजे दिल वाले होते हैं! और हम हिंदू बुनियादी तौर पर चूजे दिल वाले ही हैं। हजार साल की गुलामी में हम या तो अजर-अमर संस्कृति से विश्व गुरू होने का मुगालता पाले रहते हैं या चूजों की तरह घबराए रहते हैं कि यह क्या! इसके ठिक विपरित अमेरिका और ब्रिटेन जैसे लोकतांत्रिक प्रतिमानों में है। इन्होंने देश की राष्ट्रीयता और अखंडता जैसे मामलों में कभी कोई समझौता नहीं किया। न ही इन्होंने देश के नागरिकों को मेमना या चूजे दिल वाला बनाया। चूजे बनवाने वाले डर, खौफ की व्यवस्थाओं वाला उनका संविधान नहीं है। न वहा संविधान से अनुच्छेद 370 जैसा टोटका चलता है और न किसी अनुच्छेद को चोरी छुपे, पांच मिनट में मिटा दिया जाता है।  

दरअसल हम हिंदुओं की राष्ट्र-राज्य वाली संसारिकता में या तो समझौतापरस्ती पैठाई गई है या भय और खौफ। जबकि लोकतंत्र और संविधान जिंदादिली से निखरता है तो नेतृत्व बेखौफी और मर्द फैसलों से बनता है। लेकिन दुर्भाग्य जो ऐसे संस्कारों से अपना आचार-विचार-संविधान खाली है। तभी आज कंपकंपाएं चेहरे अपने आप पर कोड़े मार कह रहे हैं कि सिर कट गया! दिल टूट गए और अनुच्छेद 370 हटाना हत्या है!  

 

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