• [WRITTEN BY : Hari Shankar Vyas] PUBLISH DATE: ; 06 September, 2019 07:06 AM | Total Read Count 535
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एक महीने बाद जम्मू कश्मीर

ठीक एक महीने पहले, पांच अगस्त को अनुच्छेद 370 के ज्यादातर प्रावधान खत्म हुए। सो, सवाल है कि महीने बाद जम्मू कश्मीर का मसला आज कैसी, क्या भाप लिए हुए है? जवाब में कश्मीर घाटी, शेष भारत और दुनिया तीनों को ले कर अलग-अलग विश्लेषण बनेगा। मोटे तौर पर भारत राष्ट्र राज्य की इच्छा शक्ति का जो प्रदर्शन हुआ है उससे औसत हिंदू खुश है। सुकून में है और यह आत्मविश्वास बना है कि इतिहास की हिंदू मुस्लिम ग्रंथि से खम ठोक भिड़ेंगे। ऐसा संतोष जम्मू कश्मीर की गैर मुस्लिम आबादी व शेष भारत के उन हिंदुओं में गहरे पैठा है जो नरेंद्र मोदी-अमित शाह के आगे के एजेंडे पर टकटकी लगाए हुए हैं। इसके बाद कश्मीर घाटी के भीतर के हालातों पर विचार जरूरी है। वहां पूरा महीना पाबंदियों में गुजरा। सुरक्षा बलों की दबिश में घाटी क्योंकि सांस ले रही है तो मुस्लिम आबादी याकि 70-80 लाख लोगों के मनोभाव को बूझना मुश्किल नहीं है। अगस्त का महीना जैसा गुजरा है वैसे ही सितंबर का महीना भी गुजरेगा। आखिर इस महीने संयुक्त राष्ट्र में नरेंद्र मोदी और इमरान खान दोनों कश्मीर घाटी के हालातों के हवाले वैश्विक बिरादरी के आगे अपने-अपने तर्क रखेंगे। अपनी-अपनी बात कहेंगे। 

तब तक (सितंबर अंत तक) जम्मू-कश्मीर की नई प्रशासनिक व्यवस्था के कुछ बंदोबस्त बन चुके होंगे। उस नाते पांच अगस्त 2019 को राज्यसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने जो ऐलान किया था उसका जमीनी स्तर पर अमल आगे बढ़ रहा है। लोग इस हकीकत में जीने लगे हैं कि अनुच्छेद 370 खत्म हो गया है। जम्मू कश्मीर के नाम से शेष भारत में आम नागरिक जो धारणा लिए हुए था, शेष भारत से उसका जैसा कटा होना या विशिष्ट दर्जे से विशिष्टता का जो बोझ था वह खत्म है। भारत राष्ट्र राज्य की एकता, अखंडता के मामले में जम्मू कश्मीर को ले कर जो चिंताएं थीं वो खत्म हैं। सो, एक स्तर पर जीत का, संतोष का, गर्व का यह भाव है कि, जिसे असंभव माना जा रहा था वह कितनी आसानी व सुगमता से संपन्न हुआ। श्रीनगर में सब कुछ नियंत्रण में है और वहां तिरंगा लहरा रहा है। 

यह तस्वीर का एक पहलू है। सवाल है क्या श्रीनगर की जेल में बंद कश्मीरी नेताओं और घाटी की 70-80 लाख मुस्लिम आबादी भी ऐसे ही मनोभाव में जी रही है? नहीं, कतई नहीं। इनका महीने भर जो जीवन रहा और बंद जेल या ओपन जेल या घरों में घुटे जीवन में जैसा जो विचार व अनुभव हुआ है उससे निश्चित ही गुस्सा, बैचेनी होगी। वहा के दिल-दिमाग में सुलगी चिंगारियों की न अनदेखी होनी चाहिए और ऩ उन्हें हल्के में लिया जाना चाहिए। 

कश्मीर घाटी के हालात और वहां के मनोभाव से देश के भीतर और सीमा पार कैसा असर हो रहा होगा, इसे समझा जाना भी जरूरी है। पाकिस्तान जैसे भड़का है, वह प्रतिनिधि बात है। गनीमत है जो पाकिस्तान का भड़कना भी नियंत्रण में है। वजह वैश्विक पैमाने पर इस्लामी तेवरों के खिलाफ गुस्सा है। इससे जहां मुस्लिम देशों का इस्लामी भाईचारा बिखरा हुआ है तो इस्लाम के नाम के आह्वानों का भी फिलहाल मतलब नहीं है। तभी दुनिया के कई देशों में माना गया कि अनुच्छेद 370 खत्म होना भारत का अंदरूनी मामला है और कश्मीर के उग्रवादियों को यदि भारत राष्ट्र राज्य ठिकाने लगा रहा है तो ठीक ही है। 

इसलिए एक-दो महीने भारत पाबंदियों व सख्ती के साथ कश्मीर घाटी में स्थिति नियंत्रण में रखे तो वैश्विक चिल्लपों नहीं होगी। मोटे तौर पर इसी सोच में प्रतिक्रिया होगी कि जो होना है सो हो गया अब कुछ नहीं हो सकता। मतलब दुनिया जम्मू कश्मीर के मसले को भूले। इमरान खान और पाकिस्तान कितना ही शोर मचाएं उससे भारत पर वैश्विक दबाव नहीं बनेगा। 

उस नाते एक महीना जैसा गुजरा है वैसे एक-दो महीने और गुजर जाएं तो जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन का रोडमैप और उसकी हकीकत घाटी के लोगों में भी बतौर नियति पैठने लगेगी। लेकिन भारत की आजादी और भारत-पाकिस्तान रिश्तों की हकीकत के इस तथ्य को भी हमेशा नोट रखें कि जम्मू कश्मीर का मसला पाकिस्तान का बनवाया हुआ था और है। सन् 1947 में या पाकिस्तान के कबाईली हमले के वक्त तक जम्मू कश्मीर के मुसलमान अलगाववादी उग्रता लिए हुए नहीं थे। जो कुछ हुआ है वह सब पाकिस्तान के चलते, पाकिस्तान की इस्लामी लड़ाई के झंडे के चलते है। पाकिस्तान से हवा थी तो जम्मू कश्मीर में समस्या बनी। इसलिए अनुच्छेद 370 लगाना या हटाना समस्या की कोर जड़ नहीं है। जड़ पाकिस्तान है, जिसके चलते घाटी में आजादी का हल्ला हुआ।

वह पाकिस्तान आज चैन में नहीं है उलटे अब आर-पार की एटमी लड़ाई वाली बातें कर रहा है। अनुच्छेद 370 को हटाए जाने पर वह अलग तरह का नैरेटिव बना रहा है। पूरा पाकिस्तान जिहादी अंदाज में उलजुलूल बयान दे रहा है। पाकिस्तान ने जंग का माहौल बनाते हुए वैश्विक स्तर पर इस्लामी झंडे को उठा कर लड़ाई की जो बातें की है तो उससे उसको यदि नुकसान है तो भारत के लिए चिंता की बात इसलिए है क्योंकि घाटी में ज्योंहि पाबंदियां हटेंगी लोग सड़क पर उतर सकते हैं। पाकिस्तान यदि करो-मरो के मोड वाला हल्ला बना रहा है तो उसकी गूंज भारत के भीतर उन तमाम लोगों के बीच भी चुपचाप पसरेगी जो ज्यादती की बातों से भड़कने या सुलगने के तत्व लिए हुए हैं। 

तभी एक मायने में अनुच्छेद 370 का खात्मा जम्मू कश्मीर की समस्या और भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में नया अध्याय है। अब है दोनों तरफ की इच्छाशक्ति की परीक्षा का असली वक्त। भारत के लिए गुजरा एक महीना संतोषदायी है। लेकिन सामान्य जीवन को बाड़े में, ओपन जेल में महीनों बांधे नहीं रखा जा सकता है। और वैसा यदि रहा तो पाकिस्तान और दुनिया के लिए मानवाधिकारों का बहाना, मसला विकट बनता जाएगा। उस नाते पांच अक्टूबर की अगली तारीख यह सवाल लिए हुए हो सकती है कि भारत राष्ट्र राज्य की इच्छाशक्ति के साथ सूझबूझ और रोडमैप है या नहीं? 

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